अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी मामला देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में करोड़ों रामभक्तों की आस्था को झकझोर कर रख दिया है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में कानून का शिकंजा कसता जा रहा है।मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है। पुलिस और एसआईटी की संयुक्त कार्रवाई में अब तक आठ आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। साजिश की तह तक जाने लिए सरकार ने एसआईटी की समय-सीमा को 15 जुलाई तक बढ़ा दिया है।
हालांकि, धार्मिक स्थलों में वित्तीय हेराफेरी का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई नामी मंदिरों में चंदा चोरी के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसी घटनाएं न केवल मंदिर प्रबंधन की साख को बट्टा लगाती हैं, बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास को भी आहत करती हैं। इस गंभीर मामले पर टाइम्स नाउ नवभारत देश के जाने-माने वरिष्ठ चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) और ऑडिट एक्सपर्ट्स संगीत गुप्ता और मुकेश कुमार झा से खास बातचीत की कि आखिर मंदिरों में 'चंदा चोरी' के लूपहोल्स कहां होते हैं और इसे कैसे रोका जा सकता है? आइए जानते हैं कि दोनों CA ने मंदिरों में चढ़ावे की पारदर्शिता बढ़ाने और चंदा चोरी रोकने के लिए क्या रोडमैप सुझाया है।
नकद चढ़ावा: चंदा चोरी करना सबसे आसान
मंदिर के चढ़ावे में बड़ा भाग कैश का होता है। भक्त की श्रद्धा कैश चढ़ाने में ज्यादा होती है। इस लगाव के कारण ही लोग कैश में दान देना ज्यादा पसंद करते हैं। हालांकि, कैश में मिले चंदे के पैसे का हिसाब रखना बहुत ही मुश्किल होता है। इसे उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए, आपके परिवार से कोई बच्चा मंदिर जाकर दानपात्र में 10 रुपये का सिक्का डालता है, बेटी 5-5 रुपये के तीन सिक्के डाल देती है और माता-पिता अपनी मर्जी या मन्नत के हिसाब से कुछ नोट डाल देते हैं। यहां मजे की बात यह है कि दानपात्र में पैसे डालने के बाद खुद परिवार के मुखिया को भी यह ठीक-ठीक नहीं पता होता कि उसके परिवार ने कुल कितना नकद दान किया। जब डोनर को ही नहीं पता, तो किसी भी बाहरी व्यक्ति या अधिकारी के लिए यह जानना असंभव है कि उस दानपात्र में कुल कितना कैश आया, क्योंकि नकद पैसों पर किसी का नाम नहीं लिखा होता। यही वो जगह है जहां 'चंदा चोरी' होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।
डिजिटल चंदा: गड़बड़ी की गुंजाइश 'जीरो'
ऑडिट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, चंदा चोरी रोकने का सबसे सरल और आसान तरीका डिजिटल चंदा है। UPI, क्यूआर कोड, बैंक चेक और ऑनलाइन से प्राप्त दान की रकम में गड़बड़ी की गुंजाइश बिल्कुल नहीं होती है। इसलिए आज देश के तमाम छोटे-बड़े मंदिर, गुरुद्वारे और चर्च ऑनलाइन माध्यमों (जैसे UPI, क्यूआर कोड, बैंक चेक और डायरेक्ट ट्रांसफर) को प्राथमिकता दे रहे हैं। जब कोई श्रद्धालु ऑनलाइन माध्यम से चंदा देता है, तो ऑडिट की भाषा में वहां हेराफेरी का जोखिम पूरी तरह खत्म हो जाती है।
बैंक स्टेटमेंट निकालकर सीधे ट्रस्ट की रसीद बुक से उसका मिलान कर लिया जाता है, जिससे 50 पैसे का भी हिसाब पूरी तरह पारदर्शी रहता है। इसलिए चंदे चोरी रोकने के लिए ऑनलाइन या डिजिटल मेडियम सबसे बेस्ट हैं।
मंदिरों में चंदा चोरी रोकने के 8 बड़े उपाय
जब हमने पूछा कि मंदिरों में मिले चंदा की चोरी को कैसे रोका जा सकता है, तो ऑडिट एक्सपर्ट्स ने 'इंटरनल कंट्रोल' (आंतरिक नियंत्रण) का एक ऐसा फॉर्मूला बताया जो देश के बड़े कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स और नामी रेस्टोरेंट चेन्स (जैसे हल्दीराम या बीकानेरवाला) में भी कैश मैनेजमेंट के लिए इस्तेमाल होता है। आइए उसे समझते हैं—
1. जॉइंट कमिटी रूल: मंदिर या ट्रस्ट का कोई भी दानपात्र कभी भी कोई अकेला व्यक्ति नहीं खोले। इसके लिए कम से कम 3, 5 या इससे ज्यादा लोगों की एक संयुक्त कमिटी बनाई जाए, जिनकी सामूहिक मौजूदगी में ही दानपात्र का ताला खोला जाए।
2. ऑन-स्पॉट सिग्नेचर: दानपात्र खोलने की प्रक्रिया शुरू होने से पहले, वहां उपस्थित सभी कमिटी मेंबर्स के बाकायदा रजिस्टर पर हस्ताक्षर (साइन) लिए जाए, जो इस बात की गवाह हों कि प्रक्रिया सबके सामने निष्पक्ष हुई है।
3. बंडलिंग और काउंटिंग मशीन का इस्तेमाल: मशीनों और कैमरों के सामने नोटों की गिनती की जाए और बंडल बनाए जाए, ताकि किसी भी तरह की मानवीय चूक या चालाकी की गुंजाइश न रहे।
4. तत्काल बैंक ट्रांसफर: गिनती पूरी होते ही उस पूरी रकम का लेखा-जोखा तैयार कर उसे अगले ही दिन या उसी वक्त सीधे बैंक में जमा करा दिया जाता है।
5. सेंट्रल कंट्रोल रूम: मंदिर परिसर की सभी दान पेटियों को एक तय समय पर सीधे एक सुरक्षित 'कंट्रोल रूम' में लाया जाना चाहिए।
6. सख्त चेकिंग: कंट्रोल रूम के अंदर जाने और बाहर आने वाले हर व्यक्ति की मेटल डिटेक्टर और शारीरिक चेकिंग होनी चाहिए, ताकि कोई एक रुपया भी अंदर से बाहर न ला सके।
7. सामूहिक गिनती और सीसीटीवी: पूरी काउंटिंग प्रक्रिया सीसीटीवी कैमरों की चौबीसों घंटे निगरानी में होनी चाहिए।
8. इंटरनल ऑडिट: आमतौर पर लोग सोचते हैं कि साल में एक बार होने वाला वैधानिक ऑडिट (Statutory Audit) काफी है, लेकिन एक्सपर्ट ने इसके उलट 'इंटरनल ऑडिट' को सबसे जरूरी हथियार बताया है। राम मंदिर जैसे बड़े ट्रस्टों को किसी प्रतिष्ठित सीएफर्म (CA Firm) को स्थायी तौर पर इंटरनल ऑडिटर नियुक्त करना चाहिए। इससे पल—पल की निगरानी हो पाएगी और चोरी की संभावना खत्म हो जाएगी।
मंदिर के खर्चों की ट्रैकिंग भी जरूरी
एक्सपर्ट के अनुसार, चंदे की निगरानी के साथ-साथ ट्रस्ट के खर्चों जैसे प्रसाद समाग्री की खरीद, टेंडर प्रक्रिया, और कर्मचारियों की सैलरी की भी सख्त ट्रैकिंग होनी चाहिए।
कहां होती है गड़बड़ी?
कई बार ट्रस्टों में कागजों पर तो 50 कर्मचारियों के नाम दर्ज होते हैं, लेकिन असल में केवल 25 लोग ही काम कर रहे होते हैं। इस स्थिति में बाकी 25 'बोगस' (फर्जी) कर्मचारियों का पैसा सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
क्या है इसका समाधान?
अटेंडेंस रजिस्टर और साइन: कर्मचारियों के आने-जाने का रिकॉर्ड रखने के लिए एक प्रामाणिक अटेंडेंस रजिस्टर होना चाहिए, जिस पर उनके हस्ताक्षर हों। मैनुअल रजिस्टर में भी हेराफेरी की गुंजाइश होती है। इसलिए एक्सपर्ट के अनुसार, धार्मिक ट्रस्टों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लगाना सबसे बेहतरीन और फुलप्रूफ तरीका है।
Ram Mandir donation row.
फुटकर खर्च पर नियंत्रण
मंदिरों के रोजाना के प्रबंधन में कई छोटे-मोटे खर्च (जैसे बिजली-पानी का बिल, पेटी कैश या फुटकर खर्च) शामिल होते हैं। बिल और वाउचर: सरकारी विभागों या कंपनियों को जाने वाले बड़े भुगतानों (जैसे बिजली-पानी) के बिल होते हैं, इसलिए वहां दिक्कत नहीं होती. लेकिन फुटकर खर्चों के लिए सख्त वाउचर सिस्टम और कंट्रोल होना जरूरी है।
कोटेशन और टेंडर प्रक्रिया
अगर मंदिर के लिए कोई बड़ी खरीदारी (जैसे बर्तन, अनाज या निर्माण सामग्री) हो रही है, तो ट्रस्ट को किसी एक पसंदीदा वेंडर को काम देने के बजाय 3 से 5 अलग-अलग पार्टियों से कोटेशन मंगाने चाहिए। ऐसा न करने पर अनाप-शनाप रेट पर बिल बनाकर पैसा निकालने का खेल चलता रहता है।
