ईरान संकट और होर्मुज ब्लॉकेज ने भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को समय रहते डायवर्सिफायड करने और रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) जैसे वैकल्पिक ईंधनों को मिशन मोड में अपनाने का स्पष्ट संदेश दे दिया है। भारत सरकार ने भी समय की मांग को देखते हुए इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है। कच्चे तेल के आयात में कमी लाने के लिए पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग (मिश्रण) समेत कोल गैसीफिकेशन, सोलर एनर्जी और विंड एनर्जी पर जोर लगा रही है। भारत का लक्ष्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम कर स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की ओर बढ़ना है। देश ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है और 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने की योजना बनाई है।
सरकार के क्लीन एनर्जी के लक्ष्य को पूरा करने में RIPV (Road Integrated Photovoltaics) टेक्नोलॉजी बड़ी मदद कर सकती हैं एक्सपर्ट के अनुसार, अगर यह तकनीक सफल होती है तो भारत अपने हजारों किलोमीटर लंबे हाईवे और रेलवे नेटवर्क को 'क्लीन एनर्जी' के पावर हाउस के तौर पर तब्दील कर सकता है। आइए समझते हैं कि क्या है यह तकनीक और इसके सफल होने से भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कैसे आत्मनिर्भर बन सकता है?
क्या है RIPV तकनीक?
RIPV टेक्नोलॉजी, फोटोवोल्टिक असर के जरिए सूरज की रोशनी को सीधे बिजली में बदलती है। इसमें PV सेल में मौजूद सेमीकंडक्टर मटीरियल सूरज की रोशनी से फोटॉन (ऊर्जा के कण) को सोखते हैं और इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं, जिससे बिजली का प्रवाह पैदा होता है। RIPV तकनीक में सौर पैनलों को नेशनल हाईवे और रेलवे ट्रैक के किनारों इंस्टॉल कर सोलर एनर्जी पैदा की जाती है। इसके लिए अलग से जमीन अधिग्रहण करने की जरूरत नहीं होगी।
दुनिया के कई देशों में शुरू हुआ इस्तेमाल
कई यूरोपीय देश ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में सोलर PV सिस्टम को शामिल करने के तरीकों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, नीदरलैंड में A50 मोटरवे के किनारे एक सोलर नॉइज बैरियर लगाया गया है, जो लगभग 40-60 घरों को ग्रीन बिजली सप्लाई कर सकता है। जर्मनी की गार्ज़वीलर ओपन-पिट लिग्नाइट खदान के पास मोटरवे के किनारे भी सोलर सिस्टम लगाए जा रहे हैं। इटली भी PV गार्डरेल का पायलट प्रोजेक्ट चला रहा है, जिसमें हाईवे सुरक्षा बैरियर में सोलर पैनल लगाए जाते हैं। रेलवे से जुड़े इस्तेमाल के लिए, पश्चिमी स्विट्ज़रलैंड में बट्स के पास रेलवे लाइन के ट्रैक के बीच सोलर पैनल लगाए गए हैं।
भारत के लिए यह टेक्नोलॉजी क्यों जरूरी?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय रेलवे के सिविल इंजीनियरिंग पोर्टल के डेटा के अनुसार, भारत में 1.4 लाख किलोमीटर से ज्यादा नेशनल हाईवे और 99,000 किलोमीटर रेलवे ट्रैक हैं। ये नेटवर्क देश के लॉजिस्टिक्स और माल ढुलाई की रीढ़ हैं। जैसे-जैसे माल ढुलाई बढ़ेगी और ट्रांसपोर्ट सिस्टम ज्यादा इलेक्ट्रिक होंगे, इस सेक्टर में बिजली की मांग भी बढ़ेगी। भारत के क्लीन एनर्जी और सस्टेनेबिलिटी लक्ष्यों को देखते हुए, इस मांग को रिन्यूएबल एनर्जी स्रोतों से पूरा करना होगा। हालांकि, सिर्फ पारंपरिक रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम पर निर्भर रहना हमेशा व्यावहारिक या किफायती नहीं हो सकता, खासकर उन इलाकों में जहां जमीन कम है।
ऐसे हालात में RIPV यहां एक समाधान हो सकता है। हाल के आकलन बताते हैं कि भारत में RIPV की काफी संभावना है। इंडो-जर्मन सोलर पार्टनरशिप के तहत की गई एक राष्ट्रीय स्तर की स्टडी में 150 GW से ज्यादा RIPV क्षमता का अनुमान लगाया गया है, जिसमें रेलवे कॉरिडोर का हिस्सा लगभग 79 GW और हाईवे का हिस्सा लगभग 75 GW है। इस क्षमता का थोड़ा सा हिस्सा भी इस्तेमाल करने से भारत के रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार और ट्रांसपोर्ट डीकार्बोनाइज़ेशन लक्ष्यों में अहम योगदान मिल सकता है।
भारत का नया ऊर्जा पथ
जमीन अधिग्रहण की जरूरत नहीं
इस टेक्नोलॉजी की सबसे अच्छी बात यह है कि इसके लिए जमीन अधिकग्रहण की जरूरत नहीं होगी। भारत जैसे सघन अबादी वाले देश में जमीन अधिग्रहण करना बड़ी चुनौती है। पैदावार वाले खेती के अधिग्रहण से खाद्दान्न संकट पैदा हो सकता है। इसके अलावा RIPV ट्रांसमिशन में होने वाले नुकसान को कम करने में भी मदद कर सकता है। RIPV सिस्टम को EV चार्जिंग स्टेशनों के साथ या उनके पास लगाया जा सकता है, जिससे इन स्टेशनों को स्थानीय स्तर पर बनी रिन्यूएबल एनर्जी से बिजली मिल सकेगी।
भारत में मेट्रो और रेलवे रूट पर शुरू
दुनिया भर में चल रही इस पहल को आगे बढ़ाते हुए, भारत ने दिल्ली मेट्रो के ओखला विहार स्टेशन के वायाडक्ट पर अपना पहला वर्टिकल सोलर प्लांट (50 kWp) लगाया है। इसमें बाइफेशियल पैनल का इस्तेमाल किया गया है, जो दोनों तरफ से बिजली बनाते हैं।
नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन और इंडियन रेलवे ने क्रमशः नमो भारत नेटवर्क और वाराणसी में बनारस लोकोमोटिव वर्क्स के लिए "सोलर-ऑन-ट्रैक" सिस्टम का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। NHAI की योजना दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के ऊंचे हिस्सों पर सोलर पैनल लगाने और इस मॉडल को नेशनल हाईवे पर भी लागू करने की है।
RIPV अपनाने में क्या हैं चुनौतियां?
भारत में RIPV को लागू करने में मुख्य रुकावटें तकनीकी नहीं हैं। असल में, मुख्य चुनौतियां संस्थागत, रेगुलेटरी और वित्तीय हैं। लागत भी एक अहम मुद्दा है। RIPV सिस्टम पारंपरिक सोलर PV के मुकाबले ज्यादा महंगे हो सकते हैं क्योंकि इन्हें लगाने के लिए अक्सर अतिरिक्त स्ट्रक्चर की जरूरत होती है।
भले ही ये प्रोजेक्ट अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इनसे पता चलता है कि RIPV सिस्टम को भारतीय परिस्थितियों में लगाया और चलाया जा सकता है। इससे बड़े पैमाने पर इसे अपनाने और भविष्य में इसके विस्तार के लिए इस कॉन्सेप्ट को सही साबित करने में मदद मिलती है।
