अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध जल्द खत्म होने की संभावना धूमिल हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आज राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में साफ किया है कि वह ईरान पर आने वाले हफ्तों में सैन्य कार्रवाई और तेज करेंगे। यानी अमेरिका आने वाले दिनों में ईरान पर जमीनी हमला सहित उसके एनर्जी ठिकानों पर हमला कर सकता है। ट्रंप इसके संकेत पहले दे चुके हैं। अगर अमेरिका ऐसा करता है तो दुनिया में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है। ईरान भी पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा है। ईरान ने साफ किया है कि वह अमेरिका के हमले का मुंहतोड़ जवाब देगा। अमेरिका-ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध नहीं थमने से साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर तकरार बढ़ने वाला है।
ईरान पहले ही इस रूट से समुद्री मालवाहक जहाजों की आवाजाही पर रोक लगा रखा है। इससे पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल और गैस का संकट बढ़ गया है। कई देशों में पहिया थमने की स्थिति पैदा हो गई है। वहीं, दूसरी ओर क्रूड ऑयल के दाम में आज फिर बड़ा उछाल आ गया है। ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंंच गया है। ये तमाम परिस्थितियां भारत के लिए भी अच्छे नहीं है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है।
होर्मुज रूट बंद होने से भारत में तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। हालांकि, भारत ने समय रहते प्लान B तैयार कर बड़े संकट को टाल दिया है। इससे दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत अच्छी स्थिति में है। आपको बता दें कि भारत में तेल और गैस की सप्लाई हॉर्मुज के अलावा 3 और समुद्री मार्गों से हो रही है। आइए जानते हैं कि वो कौन से रूट हैं और कैसे इससे भारत की ऊर्जा जरूरत पूरी होगी।
हॉर्मुज का विकल्प: ये 3 समुद्री मार्ग
1. लाल सागर और स्वेज नहर रूट
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यह मार्ग भारत के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि भारत अब रूस से भारी मात्रा में तेल खरीद रहा है।
रूसी तेल 'नोवोरोस्सिएस्क' (काला सागर) या बाल्टिक सागर से चलकर स्वेज नहर और लाल सागर के माध्यम से भारत पहुंचता है। रूसी कच्चे तेल का भारत तक का सफर काला सागर के नोवोरोसिस्क टर्मिनल से शुरू होता है। टैंकर यहाँ से लोड होकर तुर्की जलडमरूमध्य पार करते हुए भूमध्य सागर में प्रवेश करते हैं। इसके बाद, स्वेज नहर और लाल सागर के संकरे रास्तों से होते हुए जहाज अरब सागर और फिर भारतीय तटों तक पहुँचते हैं। लगभग 4200 नॉटिकल मील की यह चुनौतीपूर्ण समुद्री यात्रा 15 से 20 दिनों में पूरी होती है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य रूट
यह लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित एक संकरा रास्ता है जो स्वेज नहर के माध्यम से आने वाले जहाजों को अरब सागर से जोड़ता है। 1869 में स्वेज नहर के खुलने के बाद, यह जलडमरूमध्य रातों-रात वैश्विक व्यापार की धुरी बन गया। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी (अरब सागर) से जोड़ता है और यूरोप से एशिया के बीच के समुद्री सफर को हजारों किलोमीटर कम कर देता है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण यह रास्ता 'आंसुओं का द्वार' भी कहलाता है, क्योंकि यहां से गुजरना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। अफ्रीका और यूरोप से आने वाला तेल इसी रास्ते से होकर भारत आता है।
3. अफ्रीका और अमेरिका रूट
भारत अब नाइजीरिया, अंगोला और अमेरिका (USA) से भी कच्चे तेल खरीद रहा है। पश्चिमी अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) से टैंकर केप ऑफ गुड होप के रास्ते आते हैं, जबकि अमेरिका से तेल अटलांटिक और हिंद महासागर पार कर भारत पहुंचता है। इन सभी मार्गों से आने वाला तेल जामनगर, वाडिनार, मुंबई, कोच्चि, पारादीप और विशाखापत्तनम जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर उतारा जाता है, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतें लगातार पूरी हो रही है।
Strait of Hormuz crisis
हॉर्मुज के महत्व को नकारा नहीं जा सकता
भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई में फारस की खाड़ी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य सबसे अहम समुद्री मार्ग है। देश के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। इराक, सऊदी अरब और UAE जैसे प्रमुख सप्लायर देशों से निकलने वाले टैंकर हॉर्मुज पार कर अरब सागर के जरिए जामनगर, वाडिनार और मुंबई जैसे पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक पहुंचते हैं।
40 देशों से कच्चे तेल आयात कर रहा भारत
भारत अब लगभग 40 देशों से कच्चे तेल का आयात करता है। इसके चलते कच्चे तेल के आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अब होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर के मार्गों से आता है, जबकि पहले यह लगभग 55 प्रतिशत था। वहीं, भारत अपनी एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है और इन आयातों में से लगभग 90 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होता है, जो युद्ध के कारण प्रभावित हुआ है।
