ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध फिर भड़क गया है। अमेरिका ने ईरान के एक सैन्य ठिकाने पर हमला किया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने जवाबी कर्रावाई करते हुए दावा किया है कि उसने एक अमेरिकी एयरबेस पर हमला किया है। वहीं, दूसरी ओर इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान पर हमला किया है। इन ताजों हमले के बाद पिछले कुछ दिनों से ईरान युद्ध खत्म होने और शांति स्थापित होने की उम्मीद धूमिल हो गई है। खाड़ी में युद्ध की आग फिर से भड़कने से कच्चे तेल की कीमत में करीब 4% की तेजी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर के प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। ईरान युद्ध एक बार फिर शुरू होना पूरी दुनिया समेत भारत के लिए बहुत ही बुरी खबर है।
मार्केट के जानकारों का कहना है कि अगर यह युद्ध फिर विकराल रूप लेता है तो कच्चे तेल की कीमत में रिकॉर्ड तेजी देखने को मिल सकती है। वैश्विक ऊर्जा अनुसंधान फर्म वुड मैकेंजी द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के लंबे समय तक बंद रहने की स्थिति में, कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। कच्चे तेल में उछाल से रुपये में गिरावट बढ़ेगी जो आयात बिल बढ़ाने का काम करेगा। कुल मिलाकर यह संकट भारतीयों पर महंगाई का बम फोड़ेगा। आइए समझते हैं कि युद्ध की शुरुआत से कैसे हमारे और देश के बजट की सेहत बिगड़ेगी।
महंगा कच्चा तेल बढ़ाएगा बोझ
जेफरीज के अनुसार, अगर जुलाई के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें $90 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत पर ₹1.25 खरब से ₹1.50 खरब का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। इस दबाव को संभालने के लिए, केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 27 में गैर-रक्षा पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी को बजट में तय 10% (साल-दर-साल) से घटाकर लगभग 0%-2% (साल-दर-साल) तक धीमा करना पड़ सकता है। यहाँ बताया गया है कि सरकार की वित्तीय गणनाओं पर किस चीज़ से दबाव पड़ रहा है और इस बोझ को कम करने के लिए सरकार क्या कदम उठा सकती है। ब्रेंट क्रूड, जिसकी कीमतें फरवरी से लगातार बढ़ रही हैं, अगर जुलाई के बाद भी $90 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो भारत पर ₹75,000 करोड़ से ₹90,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ डाल सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर चली जाती हैं, और राज्यों तथा सरकारी तेल खुदरा विक्रेताओं द्वारा उठाए जाने वाले हिस्से को भी इसमें जोड़ लिया जाए, तो कुल मिलाकर यह बोझ बढ़कर ₹1.25 ट्रिलियन से ₹1.5 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है।
इस बार कमजोर मानसून का भी संकट
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जून-सितंबर 2026 के मानसून सीजन के दौरान सामान्य से 8% कम बारिश होने का अनुमान लगाया है।अल नीनो के कारण इस बार मानसून कमजोर रहने की आशंका है। कमजोर मानसून से अन्न की पैदावार और ग्रामीण रोजगार पर बुरा असर हो सकता है। यह बेरोजगारी बढ़ाने के साथ महंगाई बढ़ाने में योगदान दे सकता है।
शेयर बाजार में कल गिरावट के संकेत
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में नए सिरे से तनाव बढ़ने के बाद Gift Nifty futures में लगभग 2% की गिरावट आई है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय शेयर बाजारों में शुक्रवार, 29 मई को बड़ी गिरावट के साथ खुल सकते हैं। बकरी ईद के चलते आज दलाल स्ट्रीट बंद है। बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और एशियाई बाजारों में कमजोरी ने दुनिया भर में निवेशकों के भरोसे को काफी चोट पहुंचाई है। इसका खामियाजा भारतीय निवेशकों पर भी हुआ है। निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है।
होर्मुज नाकेबंदी से हालात और खराब हुए
होर्मुज जलडमरूमध्य अब फिर्स ईरान की नाकेबंदी का सामना नहीं कर रहा है। यह एक ही समय में दो नाकेबंदियों का सामना कर रहा है - एक ईरान की अगुवाई में और दूसरी अमेरिका की अगुवाई में। इन दोनों के बीच फंसी कमर्शियल शिपिंग के लिए, दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक के सबसे बड़े समुद्री संकट की सबसे बड़ी ऑपरेशनल दुविधा बन गया है। खाड़ी में फंसे जहाजों के लिए इंतजार करना महंगा पड़ता है। रोजाना का खर्च रुकता नहीं है। क्रू की तनख्वाह, कर्ज़, रखरखाव और बीमा का खर्च तब भी बढ़ता रहता है। इसका असर कच्चे तेल की कीमत पर हो रहा है। कच्चा तेल लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। वहीं, फरवरी तक कच्चा तेल 60 से 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था।
घर से लेकर ऑफिस तक महंगाई की मार
अगर ईरान संकट गहराता है तो यह तय है कि कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ेगी। इसका असर रुपये पर होगा। डॉलर के मुकाबले रुपया और टूट सकता है। इस संकट को पाटने के लिए सरकार को पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और एलपीजी की कीमत में बढ़ोतरी करनी होगी। रुपया टूटने से आयातित सामान महंगे होंगे। यानी चौतरफा महंगाई का बोझ बढ़ेगा। इसका असर घर से लेकर ऑफिस तक होगा। खाने—पीने से लेकर ऑफिस जाना महंगा हो जाएगा। यह मंथली बजट का बोझ बढ़ाएगा।
ईएमआई का बोझ बढ़ सकता है
आम आदमी जो होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन लेकर बैठा है, उसपर आने वाले दिनों में ईएमआई का बोझ बढ़ सकता है। महंगाई बढ़ने पर आरबीआई ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इससे ब्याज महंगे होंगे जो ईएमआई का बोझ बढ़ाने का काम करेगा। इससे होम, कार या पर्सनल लोन की ईएमआई चुकाने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे।
आम आदमी क्या करें?
- फिजूल खर्च कम करें।
- ईंधन बचाने वाले विकल्प अपनाएं।
- सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें।
- निवेश और EMI की बेहतर प्लानिंग करें।
ईंधन संकट
कंपनियों पर भी बढ़ेगा दबाव
महंगे ईंधन का असर उद्योगों और कंपनियों पर भी पड़ता है। फैक्ट्री चलाने, सामान ट्रांसपोर्ट करने और बिजली उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। इससे कंपनियां या तो कीमतें बढ़ाती हैं या फिर लागत कम करने के लिए कर्मचारियों पर दबाव डालती हैं। कई सेक्टर जैसे एविएशन, लॉजिस्टिक्स, पेंट, प्लास्टिक और केमिकल इंडस्ट्री सीधे तौर पर तेल की कीमतों पर निर्भर हैं। अगर तेल लगातार महंगा रहा तो इन सेक्टरों में लागत बढ़ेगी और इसका असर शेयर बाजार तक में दिखाई दे सकता है।
सरकार के सामने क्या चुनौती?
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रण में रखने की होगी। अगर तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो सरकार को टैक्स घटाने या तेल कंपनियों को राहत देने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।लेकिन इससे सरकारी राजस्व पर असर पड़ता है। दूसरी तरफ अगर कीमतें नहीं घटाई गईं तो जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। यही वजह है कि सरकार को आर्थिक संतुलन बनाना पड़ता है।
