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Explained: गरीबी पर बड़ी जीत, लेकिन जंग अभी बाकी! बेरोजगारी और AI की चुनौती से कैसे निपटेगा भारत?

India’s Poverty Success Story Explained: विश्व बैंक के मुताबिक, भारत में 2011 से 2023 के बीच 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। हालांकि, रोजगार, आय में असमानता और AI से जुड़ी चुनौतियां अब भी बरकरार हैं।

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गरीबी पर ऐतिहासिक जीत, लेकिन चुनौतियां बरकरार! (तस्वीर-AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Nov 1, 2026, 16:01 IST
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India’s Poverty Success Story Explained : भारत में गरीबी कम करने के मामले में पिछले एक दशक के दौरान बड़ी कामयाबी मिली है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 से 2023 के बीच देश में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। इस दौरान अत्यधिक गरीबी की दर 27.1 प्रतिशत से घटकर महज 2.6 प्रतिशत रह गई। यह बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के लिहाज से काफी अहम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व बैंक की इस रिपोर्ट का स्वागत किया है। उन्होंने गरीबी में आई इस गिरावट को देश में बढ़ते अवसरों और बदलती आर्थिक स्थिति का संकेत बताया। प्रधानमंत्री के मुताबिक, गरीबी हटाना उनकी सरकार के लिए केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक लक्ष्य रहा है। हालांकि गरीबी में कमी के इन आंकड़ों के बीच कुछ बड़े सवाल भी खड़े होते हैं। क्या गरीबी घटने का मतलब यह है कि देश के हर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई है? क्या युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक रोजगार मिल रहा है? क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल से रोजगार के नए अवसर बनेंगे या नौकरियों पर दबाव बढ़ेगा? इन सवालों को समझना जरूरी है, क्योंकि गरीबी कम करना और लोगों को लंबे समय तक बेहतर जीवन देना, दोनों अलग-अलग चुनौतियां हैं।

विश्व बैंक की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

विश्व बैंक ने 30 अक्टूबर 2026 को 'इंडिया पॉवर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ: अक्टूबर 2026' नाम से रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया है कि भारत ने पिछले एक दशक में गरीबी कम करने के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां गरीबी में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट में गरीबी को मापने के लिए दो प्रमुख पैमानों का इस्तेमाल किया गया है। पहला है निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए गरीबी की सीमा, जो प्रतिदिन 4.20 डॉलर तय की गई है। दूसरा पैमाना अत्यधिक गरीबी का है, जिसकी सीमा प्रतिदिन 3 डॉलर है। ये आंकड़े 2021 की क्रय शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर तैयार किए गए हैं। विश्व बैंक के मुताबिक, 2011 में भारत की 57.7 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन 4.20 डॉलर से कम पर गुजारा कर रही थी। 2023 में यह आंकड़ा घटकर 16.1 प्रतिशत रह गया। इसका मतलब है कि इस अवधि में करीब 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी सीमा से बाहर आए। वहीं अत्यधिक गरीबी की दर भी 2011 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में 2.6 प्रतिशत पर पहुंच गई। यानी पहले जहां हर 4 में से एक से ज्यादा व्यक्ति अत्यधिक गरीबी की स्थिति में था, वहीं अब यह संख्या करीब 38 लोगों में 1 रह गई है।

गरीबी घटने के पीछे क्या रहे प्रमुख कारण?

भारत में गरीबी कम होने के पीछे कई कारण रहे हैं। इनमें आर्थिक विकास, रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी, सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और बुनियादी सुविधाओं तक लोगों की पहुंच शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने गरीब परिवारों को राशन, आवास, रसोई गैस, बिजली, शौचालय और बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाओं के माध्यम से जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने में मदद मिली। वहीं, जनधन योजना ने बड़ी संख्या में लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में सड़क, बिजली, पेयजल और इंटरनेट जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इससे लोगों की जिंदगी आसान हुई है और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोतरी और गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों ने भी गरीबी कम करने में भूमिका निभाई है। हालांकि, किसी एक योजना को इस पूरी गिरावट का अकेला कारण मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे कई वर्षों में हुए आर्थिक और सामाजिक बदलावों का योगदान है।

रोजगार के अवसर बढ़े, लेकिन नौकरी की गुणवत्ता बड़ी चिंता

गरीबी कम होने के पीछे रोजगार में बढ़ोतरी भी एक महत्वपूर्ण कारण रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया कि महज 6 वर्षों में रोजगार के अवसरों में 13.4 करोड़ की वृद्धि हुई। यह इसी अवधि में कामकाजी उम्र की आबादी में हुई बढ़ोतरी से करीब दोगुनी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2023 के बीच भारत में रोजगार करने वाले लोगों की संख्या में करीब 13.4 करोड़ का इजाफा हुआ। इसमें ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी का बड़ा योगदान रहा। पहले जिन महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी कम थी, उनमें से कई अब खेती, छोटे कारोबार और दूसरी गतिविधियों के जरिए कमाई कर रही हैं। लेकिन रोजगार के आंकड़े बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि सभी लोगों को अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी भी मिल रही है। असली चुनौती रोजगार की गुणवत्ता को लेकर है। कई लोग ऐसे कामों में लगे हैं, जहां कमाई सीमित है और नौकरी की स्थिरता भी नहीं है।

विश्व बैंक ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि रोजगार बढ़ने के बावजूद लोगों की महंगाई को ध्यान में रखकर देखी जाने वाली वास्तविक कमाई में खास सुधार नहीं हुआ है। इसका मतलब है कि लोगों के पास काम तो है, लेकिन उनकी कमाई पहले की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं बढ़ी है। युवाओं के लिए यह चुनौती और बड़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में युवाओं की बेरोजगारी दर 14.6 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में बढ़कर 15.9 फीसदी हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों की युवा महिलाओं पर इसका ज्यादा असर देखने को मिला है। ऐसे में भारत के सामने सिर्फ रोजगार की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि अच्छी तनख्वाह और सुरक्षित भविष्य वाले रोजगार तैयार करने की भी चुनौती है।

गरीबी कम हुई, फिर भी असमानता क्यों बनी हुई है?

किसी देश में गरीबी कम होने का मतलब यह नहीं है कि वहां आर्थिक असमानता भी पूरी तरह खत्म हो गई है। भारत में भी यही स्थिति देखने को मिलती है। एक तरफ बड़ी संख्या में लोग गरीबी से बाहर आए हैं, वहीं दूसरी तरफ समाज के अलग-अलग वर्गों की कमाई में बड़ा अंतर बना हुआ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में देश के सबसे ज्यादा कमाई करने वाले 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत कमाई सबसे कम कमाई करने वाले 10 प्रतिशत श्रमिकों की तुलना में करीब 13 गुना थी। यह अंतर बताता है कि आर्थिक विकास का फायदा सभी लोगों तक एक समान तरीके से नहीं पहुंच रहा है। इसका एक उदाहरण यह है कि किसी बड़े शहर में काम करने वाले व्यक्ति की आमदनी और किसी छोटे गांव में काम करने वाले मजदूर की आमदनी में काफी अंतर हो सकता है। इसी तरह, स्थायी नौकरी करने वाले व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अक्सर दिहाड़ी मजदूर या छोटे किसान से बेहतर होती है। प्रधानमंत्री ने असमानता में कमी आने की बात भी कही है। उन्होंने गिनी सूचकांक का हवाला देते हुए बताया कि इसमें सुधार हुआ है। गिनी सूचकांक एक ऐसा पैमाना है, जिससे पता चलता है कि किसी देश में कमाई का बंटवारा कितना समान या असमान है। इसका स्कोर जितना कम होता है, आय का वितरण उतना ही समान माना जाता है। इसलिए गरीबी घटने के साथ यह देखना भी जरूरी है कि गरीब और अमीर के बीच कमाई का अंतर कितना कम हो रहा है।

गरीबी पर ऐतिहासिक जीत, लेकिन चुनौतियां बरकरार! (तस्वीर-AI)

गरीबी पर ऐतिहासिक जीत, लेकिन चुनौतियां बरकरार! (तस्वीर-AI)

गांवों और कुछ राज्यों में गरीबी अब भी बड़ी समस्या

भारत में गरीबी हर राज्य और हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों ने गरीबी कम करने में अच्छी प्रगति की है, जबकि कुछ राज्यों में अब भी बड़ी संख्या में लोग आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की गरीब आबादी का करीब 57 प्रतिशत हिस्सा उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले क्षेत्र में रहता है। इस क्षेत्र में कई ऐसे जिले और ग्रामीण इलाके हैं, जहां लोगों के पास रोजगार के सीमित अवसर हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल प्रशिक्षण और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती पर निर्भरता भी एक बड़ी चुनौती है। खेती से होने वाली कमाई मौसम, फसल की कीमत और उत्पादन पर निर्भर करती है। ऐसे में किसान परिवारों के लिए सालभर नियमित आमदनी बनाए रखना आसान नहीं होता। शहरों में भी गरीबी का एक अलग रूप देखने को मिलता है। यहां बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। उन्हें नियमित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ हमेशा नहीं मिल पाता। इसलिए गरीबी को स्थायी रूप से कम करने के लिए गांवों और शहरों, दोनों जगह बेहतर रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे।

AI से बढ़ेंगे अवसर या खत्म होंगी नौकरियां?

भारत के सामने आने वाली सबसे बड़ी नई चुनौतियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI भी शामिल है। AI ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से कंप्यूटर और मशीनें इंसानों की तरह कुछ काम सीख सकती हैं, जानकारी समझ सकती हैं और फैसले लेने में मदद कर सकती हैं। आज बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, आईटी, ग्राहक सेवा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे कई क्षेत्रों में AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इससे काम करने की गति बढ़ सकती है और कंपनियों की लागत कम हो सकती है। लेकिन इसके साथ ही कुछ पारंपरिक नौकरियों पर दबाव भी बढ़ सकता है। उदाहरण के तौर पर पहले किसी कंपनी में ग्राहकों के सवालों का जवाब देने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की जरूरत होती थी। अब AI आधारित चैटबॉट कई सामान्य सवालों का जवाब खुद दे सकते हैं। इसी तरह डेटा एंट्री, सामान्य कंटेंट तैयार करने और कुछ शुरुआती स्तर के तकनीकी कामों में भी AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि AI सभी नौकरियां खत्म कर देगा। बल्कि आने वाले समय में काम करने का तरीका बदल सकता है। जिन लोगों के पास नई तकनीक का ज्ञान और उसके इस्तेमाल की क्षमता होगी, उनके लिए बेहतर अवसर बन सकते हैं। वहीं, जो लोग पुराने कौशल पर निर्भर रहेंगे, उनके सामने नौकरी और कमाई से जुड़ी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की एक अन्य रिपोर्ट 'इंडिया एंड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: सीजिंग द डेवलपमेंट ऑपर्च्युनिटी' में भी भारत के लिए AI को बड़ा अवसर बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास तकनीकी रूप से प्रशिक्षित युवाओं, मजबूत IT क्षेत्र और डिजिटल सुविधाओं का फायदा उठाने की क्षमता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में निजी क्षेत्र का AI निवेश 2024 के 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 4.1 अरब डॉलर हो गया। हालांकि, AI का रोजगार पर लंबे समय में क्या असर होगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसलिए भारत को युवाओं को नई तकनीक के हिसाब से प्रशिक्षित करना होगा। स्कूलों, कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों में डिजिटल शिक्षा, डेटा साइंस, कोडिंग और AI से जुड़ी जानकारी को बढ़ावा देना जरूरी होगा। इससे तकनीकी बदलाव के कारण पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना किया जा सकेगा।

सिर्फ कमाई नहीं, शिक्षा और स्वास्थ्य भी गरीबी के पैमाने

गरीबी को केवल इस आधार पर नहीं मापा जा सकता कि कोई व्यक्ति प्रतिदिन कितना पैसा कमाता है। कई बार किसी परिवार की कमाई गरीबी की तय सीमा से ऊपर होती है, लेकिन उसके पास अच्छे इलाज, शिक्षा, साफ पानी और रहने के लिए बेहतर घर जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। इसी वजह से गरीबी मापने के लिए बहुआयामी गरीबी सूचकांक यानी मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स (MPI) का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसमें किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर से जुड़ी सुविधाओं को भी देखा जाता है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (OPHI) के बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार भारत में गरीबी की दर 2005-06 में 53.8 प्रतिशत थी, जो 2019-21 में घटकर 16.4 प्रतिशत रह गई। वहीं, विश्व बैंक के अपने बहुआयामी गरीबी माप के अनुसार 2022-23 में यह दर 15.5 प्रतिशत थी। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में केवल कमाई के स्तर पर ही नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी सुविधाओं के मामले में भी सुधार हुआ है। हालांकि, देश के सभी लोगों तक बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना अब भी एक बड़ी चुनौती है।

2028 तक और घट सकती है गरीबी, लेकिन रफ्तार होगी धीमी

विश्व बैंक का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भी भारत में गरीबी कम होने का सिलसिला जारी रहेगा। हालांकि, इसकी रफ्तार पहले के मुकाबले धीमी हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिदिन 4.20 डॉलर की गरीबी सीमा के आधार पर भारत में गरीबी की दर 2026 में अनुमानित 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। इस गिरावट के पीछे लोगों की खपत में बढ़ोतरी, रोजगार के अवसरों का विस्तार और सरकारी सहायता योजनाओं की भूमिका अहम रहने की उम्मीद है। खासतौर पर महिलाओं की रोजगार में बढ़ती भागीदारी से परिवारों की आमदनी को सहारा मिल सकता है। हालांकि, ये अनुमान हैं और आने वाले समय में आर्थिक हालात, रोजगार के आंकड़ों और लोगों की कमाई के आधार पर इनमें बदलाव हो सकता है।

आगे भारत के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?

भारत ने गरीबी कम करने के मामले में निश्चित रूप से बड़ी प्रगति की है, लेकिन इस कामयाबी को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं होगा। देश की आबादी में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में उनके लिए पर्याप्त रोजगार पैदा करना सबसे जरूरी है। इसके अलावा, रोजगार की गुणवत्ता सुधारना, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना, किसानों की आमदनी मजबूत करना और छोटे कारोबारों को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। AI जैसी नई तकनीक के दौर में युवाओं को नए कौशल सिखाने पर भी ध्यान देना होगा। सरकार के सामने एक और बड़ी चुनौती यह है कि आर्थिक विकास का फायदा देश के हर वर्ग और हर क्षेत्र तक पहुंचे। केवल बड़े शहरों और विकसित राज्यों में विकास होने से गरीबी की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। पिछड़े राज्यों और ग्रामीण इलाकों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और रोजगार की बेहतर सुविधाएं पहुंचानी होंगी।

कुल मिलाकर, विश्व बैंक की रिपोर्ट भारत के लिए एक सकारात्मक तस्वीर पेश करती है। 49.6 करोड़ लोगों का गरीबी से बाहर आना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन असली सफलता तब होगी, जब लोगों को केवल गरीबी से बाहर ही नहीं निकाला जाएगा, बल्कि उन्हें स्थायी रोजगार, बेहतर कमाई और सम्मानजनक जीवन भी मिलेगा। गरीबी कम करने के बाद अब भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती आर्थिक अवसरों को सबके लिए समान रूप से उपलब्ध कराना है।

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