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होर्मुज बिना खुलवाए लौटी ट्रंप की सेना , तो खाड़ी में अमेरिका के दोस्तों का क्या होगा प्लान बी?

अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर परमाणु हथियारों के नाम पर हमला शुरू किया। लेकिन, अब यह युद्ध ऑयल-गैस सहित कई अहम कमोडिटीज के ग्लोबल सप्लाई संकट में बदल गया है। अब युद्ध का नतीजा ईरान की परमाणु क्षमता की जगह होर्मुज पर नियंत्रण से तय होगा। ऐसे में अगर अमेरिका होर्मुज पर नियंत्रण के बिना इस युद्ध से बाहर जाता है, तो इसके क्या नतीजे हो सकते हैं।

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अमेरिका जाने से और गहरा सकता है होर्मुज संकट
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Apr 3, 2026, 13:01 IST

Hormuz Strait crisis: पश्चिम एशिया में तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा संकट का केंद्र बन चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार इस मुद्दे पर अपना स्टैंड बदल रहे हैं। यहां तक कि होर्मुज संकट को हल किए बिना ही अमेरिका के पीछे हटने की बात भी कह चुके हैं। ऐसे में उन देशों के लिए हालात चिंताजनक हो गए हैं, जिन्हें अमेरिका का सहयोगी माना जाता है। क्योंकि, ईरान का साफ कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट इंटरनेशनल वाटर में नहीं है। यह ओमान और ईरान के बीच का मामला है और दोनों देश ही तय करेंगे कि होर्मुज का इस्तेमाल कैसे और कौन करेगा।

क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?

होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन है। वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब 20% इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है। खाड़ी के तेल उत्पादक देश जैसे सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत अपनी सप्लाई इसी रास्ते से दुनिया तक पहुंचाते हैं। अगर यह मार्ग बाधित होता है, तो इसका असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। यह सीधे महंगाई, करेंसी, और वैश्विक बाजारों की स्थिरता को हिला देता है। यही वजह है कि होर्मुज पर नियंत्रण या अवरोध, एक वैश्विक रणनीतिक मुद्दा बन गया है।

पैरामीटरअनुमानित डेटामहत्व
वैश्विक तेल सप्लाई~20% (लगभग 2 करोड़ बैरल/दिन)ग्लोबल क्रूड सप्लाई की हर 5वीं बैरल यहां से गुजरती है
LNG ट्रांजिट~20-25% ग्लोबल LNGखासकर कतर से एशिया के लिए गैस सप्लाई अहम
मुख्य निर्यातक देशसऊदी अरब, इराक, UAE, कतर, ईरानखाड़ी क्षेत्र की निर्भरता
प्रमुख आयातकचीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरियाएशिया सबसे ज्यादा प्रभावित
स्ट्रेट की चौड़ाई~33 किमी (नैरोएस्ट पॉइंट)चोक पॉइंट रिस्क
शिपिंग लेन~3 किमी प्रति दिशाटकराव और ब्लॉकेज का खतरा
वैकल्पिक रूटबहुत सीमितसप्लाई शॉक का जोखिम
असरकच्चा तेल $100 प्रति बैरल पारग्लोबल महंगाई बढ़ने का खतरा

युद्ध खत्म, जिम्मेदारी खत्म?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रेप लगातार यह कह रहे हैं कि होर्मुज के वे देश मिलकर खोलें, जो इसका इस्तेमाल करते हैं। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमेरिका अगले दो से तीन हफ्तों में ईरान से जुड़े इस संघर्ष से बाहर निकल सकता है। क्योंकि अमेरिका का मुख्य लक्ष्य, यानी ईरान को परमाणु हथियार से रोकना, हासिल हो चुका है। ट्रंप के इस बयान ने सहयोगी देशों में चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि, अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी बाकी देशों पर आ जाएगी। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका को इस स्ट्रेट की सुरक्षा में आगे शामिल रहने की जरूरत नहीं है।

क्या है प्लान B?

अमेरिका के रुख को देखते हुए 40 से ज्यादा सहयोगी देशों ने एक वर्चुअल बैठक की। इसमें यूरोप, एशिया, मिडिल ईस्ट, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के देश शामिल थे। इस बैठक का मकसद था, अमेरिका के बिना होर्मुज को फिर से खोलने की रणनीति बनाना। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों ने इस पहल का नेतृत्व किया। चर्चा में यह साफ हुआ कि अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो यह देश खुद आगे आकर समुद्री मार्ग को सुरक्षित करने की कोशिश करेंगे। यह बैठक सिर्फ रणनीति नहीं, बल्कि अमेरिका पर दबाव बनाने का भी एक संकेत थी कि वह बिना समाधान के इस संकट से बाहर न निकले।

सैन्य विकल्प पर चर्चा

इस मामले में सहयोगी देशों के सैन्य योजनाकार भी जल्द ही एक बैठक करने वाले हैं, जिसमें यह तय किया जाएगा कि नौसेना को कैसे तैनात किया जाए। इसमें माइन हटाने, जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने और समुद्री निगरानी जैसे कदम शामिल हैं। हालांकि, एक अहम बात सामने आई है। ज्यादातर देश सैन्य बल के जरिए स्ट्रेट खोलने के पक्ष में नहीं हैं। उनका मानना है कि बिना ईरान की सहमति के यह संभव नहीं है। ऐसे में सैन्य कार्रवाई सीमित और जोखिम भरी हो सकती है।

होर्मुज संकट के समाधान में जुटे 40 देश

होर्मुज संकट के समाधान में जुटे 40 देश

कूटनीति बनाम टकराव

इस पूरे संकट में ईरान की भूमिका सबसे अहम है। अगर ईरान सहमत नहीं होता, तो कोई भी सैन्य या आर्थिक रणनीति टिकाऊ नहीं होगी। इसलिए संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को शामिल करने की बात भी जोर पकड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और संभावित प्रतिबंधों की भी चर्चा की है। लेकिन साथ ही यह भी साफ है कि बातचीत ही इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है। ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि वह अमेरिका पर भरोसा नहीं करता और किसी भी टकराव के लिए तैयार है।

एशिया की ऊर्जा सुरक्षा दांव पर

भारत और चीन जैसे देशों को लेकर ईरान ने साफ कर दिया है कि ऐसे फ्रेंडली देशों के शिपमिंट होर्मुज में पूरी तरह सुरक्षित हैं। असल में होर्मुज बंदी की वजह से यूएस के करीबी सहयोगी जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए बड़ संकट की वजह है। इन सभी देशों से मिलकर सुरक्षित समुद्री कॉरिडोर बनाने की अपील की है। क्योंकि, इन देशों के लिए यह सिर्फ एक भू-राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि सीधा आर्थिक खतरा है। अगर सप्लाई बाधित होती है, तो ऊर्जा लागत बढ़ेगी, जिससे उद्योग और आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा।

क्या अमेरिका बिना संभल पाएगी स्थिति?

यह संकट एक बड़े सवाल को जन्म देता है। क्या अमेरिका के बिना वैश्विक सहयोगी देश इतने बड़े सामरिक और आर्थिक संकट को संभाल सकते हैं? अब तक अमेरिका इस क्षेत्र में सुरक्षा का प्रमुख गारंटर रहा है। लेकिन अगर वह पीछे हटता है, तो यह वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। इससे न सिर्फ ऊर्जा बाजार, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बदल सकती है। होर्मुज स्ट्रेट का संकट सिर्फ एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता की परीक्षा है। अमेरिका के रुख, सहयोगी देशों की तैयारी और ईरान की प्रतिक्रिया, तीनों मिलकर इस संकट का भविष्य तय करेंगे। फिलहाल सबसे बड़ा खतरा अनिश्चितता है। जब तक यह साफ नहीं होता कि स्ट्रेट कैसे खुलेगा, तब तक बाजार, सरकारें और निवेशक सभी सतर्क रहेंगे।

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