देश के कई हिस्सों में पारा 45° से 48° सेल्सियस तक पहुंच गया है। भीषण गर्मी से इंसान से लेकर जानवरों का बुरा हाल है। साल दर साल गर्मी का कहर बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में अर्थशास्त्री और स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह भीषण गर्मी सिर्फ तापमान ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि आर्थिक विकास को धीमा करेगी, उत्पादकता घटाएगी और इलाज का खर्च बढ़ाएगी। जानकारों का कहना है कि भारत के लिए भीषण गर्मी अब एक आर्थिक जोखिम बनती जा रही है। हीटवेव के कारण काम के घंटे कम हो रहे हैं, खेती का उत्पादन घट रहा है, कूलिंग के लिए बिजली की मांग बढ़ रही है। इससे स्वास्थ्य व घरेलू खर्चों में भी बढ़ोतरी हो रही है। आइए जानते हैं कि भीषण गर्मी किस तरह आपकी जेब पर बोझ बढ़ा रही है और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है।
प्रचंड गर्मी उत्पादकता घटा रहा
एक रिपोर्ट के अनुसार, चिलचिलाती गर्मी के कारण उत्पादकता में लगभग 159 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है, जो भारत की कुल आय का लगभग 5.4 प्रतिशत है। साथ ही, हर साल 160 अरब से ज्यादा काम के घंटे बर्बाद हो रहे हैं क्योंकि बढ़ती गर्मी के कारण मजदूर अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस दशक के अंत तक, हीटवेव भारत की अर्थव्यवस्था को उम्मीद से कहीं ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे देश की GDP का लगभग 2.5 से 4.5 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हो सकता है।किसान, मजदूर और रेहड़ी वाले बेहाल
साल दर साल बढ़ती भीषण गर्मी और गर्मी का बढ़ता पीरियड सबसे अधिक किसानों, निर्माण और असंगठित शहरी मजदूरों और रेहड़ी पटरी वाले छोटे कारोबार करने वाले को प्रभावित कर रहा है। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (ILO) ने अपनी रिपोर्ट 'वर्किंग ऑन ए वार्मर प्लैनेट' में चेतावनी दी है कि गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) के बढ़ने से 2030 तक दुनिया भर में उत्पादकता का इतना नुकसान हो सकता है जो 80 मिलियन फुल-टाइम नौकरियों के बराबर होगा।
ILO का अनुमान है कि भारत में, जहां बहुत सारे मजदूर खुले में या बिना एयर-कंडीशनिंग वाली जगहों पर काम करते हैं, गर्मी के तनाव की वजह से उत्पादकता घटने से 2030 तक 34 मिलियन नौकरियां जा सकती हैं। उसने यह भी अनुमान लगाया है कि गर्मी के तनाव के कारण 2030 में भारत के काम के घंटों में 5.8 प्रतिशत की कमी आ सकती है। 'द लैंसेट काउंटडाउन' की 2024 की भारत डेटा शीट के अनुमान के मुताबिक, 2023 में गर्मी के असर से भारत को 181 अरब संभावित लेबर घंटे का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा 1990-1999 के औसत से 50 प्रतिशत ज्यादा है।
ये सब मिलकर भीषण गर्मी को केवल मौसम से जुड़ी एक अस्थायी समस्या से बदलकर एक बड़े आर्थिक जोखिम (मैक्रो-इकोनॉमिक रिस्क) में बदल रहे हैं। इसका असर नौकरियों, महंगाई, ग्रामीण आय और भारत की लंबी अवधि की विकास यात्रा पर पड़ सकता है।
भीषण गर्मी बढ़ा रहा लोगों का खर्च
भीषण गर्मी आम लोगों का खर्च बढ़ा रही है। भारत में बिजली की मांग बढ़ती जा रही है। इस बढ़ोतरी से बिजली के इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव बढ़ रहा है और साथ-साथ घरों का खर्च भी बढ़ रहा है। घरों के लिए, लंबे समय तक चलने वाली लू (heatwaves) का मतलब है बिजली का ज्यादा बिल, पंखों, कूलर और एयर कंडीशनर का ज्यादा इस्तेमाल, पीने के पानी और मेडिकल देखभाल पर ज्यादा खर्च, और बाहर काम करने वालों के काम बंद करने पर मजदूरी का नुकसान। कारोबारों पर इसका असर कम प्रोडक्टिविटी और गर्मी की वजह से कर्मचारियों के काम पर न आने के रूप में हो रहा है।
हीटवेव
पशुपालन-मत्स्य पालन पर भी मार
गर्मी का बुरा असर सिर्फ फसलों तक ही सीमित नहीं है। भीषण गर्मी का असर पशुओं की सेहत, दूध के उत्पादन, पोल्ट्री (मुर्गी पालन) के जीवित रहने, मछली पालन और चारे की मांग पर भी हो रहा है। गर्मी के तनाव से गाय-भैंसों में चारा खाने की क्षमता कम हो सकती है, प्रजनन पर असर पड़ सकता है, बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है और दूध का उत्पादन घट सकता है। इससे दूध महंगा हो सकता है। पोल्ट्री (मुर्गी पालन) में, ज्यादा गर्मी से मरने का खतरा बढ़ सकता है और उत्पादकता कम हो सकती है। मछली पालन और एक्वाकल्चर में, पानी का तापमान बढ़ने से उसमें घुली ऑक्सीजन का स्तर कम हो सकता है और स्टॉक (मछलियों) के नुकसान का खतरा बढ़ सकता है। भारत के लिए यह बात बहुत अहम है क्योंकि पशुपालन कई ग्रामीण परिवारों, खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए रोज़ाना की कमाई का जरिया है।
हीट एक्शन प्लान की जरूरत
एक्सपर्ट का मनना है कि अब वह समय चला गया जब हम गर्मी या लू को केवल 'मई-जून की बात होती थी। गर्मी का सितम लगातार बढ़ रहा है। इसलिए सरकार को पॉलिसी में सुधार और हीट एक्शन प्लान बनाने की जरूरत है।
