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युद्ध की हांडी में पक रहा महंगाई का तूफान! 76% बढ़े गैस के दाम, मंडरा रहा ‘एनर्जी इमरजेंसी’ का खतरा

कमर्शियल गैस सिलिंडर के दाम 1 मई 2026 से बढ़कर ₹3,071.50 रुपये हो गया है। ईरान-अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने से पहले इसकी कीमत महज ₹1,740.50 रुपये थी। इस तरह युद्ध की वजह से दाम 76% तक बढ़े हैं।

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गहरा और दूर तक होगा गैस के दाम बढ़ने का असर
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated May 1, 2026, 12:56 IST

कमर्शियल LPG की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल ने होटल, ढाबा, रेस्तरां और छोटे कारोबारियों की लागत एक झटके में बढ़ा दी है। सरकार की तरफ से भले ही घरेलू सिलिंडर की कीमतों को नहीं बढ़ाया है। लेकिन, लेकिन महंगाई का दबाव अब सप्लाई, बजट और बाजार तीनों मोर्चों पर दिखने लगा है।

भारत में गैस की कीमतों पर आया ताजा झटका सिर्फ सिलिंडर बिल नहीं बढ़ा रहा, बल्कि महंगाई की पूरी कहानी बदल रहा है। फरवरी में जो कमर्शियल सिलिंडर दिल्ली में ₹1,740.50 था, वह 1 मई तक ₹3,071.50 तक पहुंच गया। यानी करीब 76.5% की छलांग। इसी बढ़ोतरी ने “एनर्जी शॉक” को एक नई बहस बना दिया है।

युद्ध की आग से निकला महंगाई का भूत

कमर्शियल सिलिंडर के दाम एक झटके में करीब 1000 रुपये बढ़ना, कोई सामान्य मासिक रिवीजन नहीं है। भारतीय तेल कंपनियों ने 19 किलो वाले कमर्शियल LPG सिलिंडर की कीमत 1 मई, 2026 से ₹993 बढ़ाई है। इसकी वजह से दिल्ली में इसकी कीमत ₹3,071.50 हो गई। हालांकि, घरेलू 14.2 किलो सिलिंडर की कीमत अभी नहीं बदली है। लेकिन, व्यावसायिक उपभोक्ताओं को झटका लग चुका है। जाहिर तौर पर यह बढ़ोतरी वैश्विक तेल कीमतों में आए उछाल और पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव का नतीजा है।

जल्द हल होने वाला संकट नहीं

इस संकट की जड़ पश्चिम एशिया के एनर्जी प्रोडक्शन ढांचे के नुकसान में छिपा है। तमाम रिसर्च और एक्सपर्ट बता चुके हैं कि हॉर्मुज स्ट्रेट को अगर आज पूरी तरह खोल भी दिया जाए, तो ऑयल-गैस सप्लाई को युद्ध पूर्व स्थिति तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं। लिहाजा, ईंधन की महंगाई कोई शॉर्ट टर्म में हल होने वाला संकट नहीं है।

गैस के दाम में 76% की बढ़ोतरी

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले दिल्ली में कमर्शियल LPG सिलिंडर की कीमत फरवरी में ₹1,740.50 थी, 1 मई को बढ़कर यह ₹3,071.50 हो गई। यह सिर्फ संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि तीन महीने में लागत के ढांचे के टूटने की कहानी है। इससे यह पता चलता है कि युद्ध के बाद से अब तक होटल-रेस्तरां इंडस्ट्री के लिए ईंधन की लागत में करीब 76.5% की बढ़ोतरी हुई है। आमतौर होटल-रेस्तरां बिजनेस में ईंधन कुल लागत का बड़ा हिस्सा रखता है। जब यह महंगा होता है, तो आटा, तेल, सब्जी और मजदूरी के साथ जुड़ी पूरी लागत-श्रृंखला हिल जाती है।

gas prices hike

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सबसे पहले किसकी जेब पर असर

इसका सबसे बड़ा असर उन छोटे कारोबारियों (रेहड़ी, थड़ी और फूड स्टॉल) पर पड़ता है, जो बेहद कम मार्जिन पर काम करते हैं। यहीं वजह है कि कई जगह चाय की कीमत ₹10 से ₹15 तक पहुंच गई है और वेज थाली ₹60-70 से बढ़कर ₹85-90 तक चली गई है। यानी सिलिंडर महंगा हुआ, लेकिन नुकसान ग्राहक और दुकानदार दोनों की जेब में उतर गया। छोटे ढाबे, सड़क किनारे खाने वाले विक्रेता और लोकल रेस्तरां इस लागत को लंबे समय तक अपने मार्जिन में नहीं समेट सकते। इसी दबाव में कई कारोबारियों ने मेनू छोटा कर दिया है, मात्रा कम कर दी है या काम के घंटे घटा दिए हैं। कुछ जगहों पर गैस की कमी और ऊंची लागत के चलते कोयले का इस्तेमाल बढ़ गया है।

घर की रसोई तक नहीं पहुंची आग

अभी घरेलू उपभोक्ताओं को राहत है। दिल्ली में 14.2 किलो LPG सिलिंडर की कीमत ₹913 पर स्थिर रखी गई है। इसका मतलब है कि सरकार ने राजनीतिक और सामाजिक दबाव को देखते हुए रसोई गैस को फिलहाल महंगाई की सीधी मार से बचा लिया है। लेकिन, यह राहत मुफ्त नहीं है। इसके बदले सरकार ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बड़े पैमाने पर मुआवजा दे रही है, ताकि घरेलू सिलिंडर सस्ता रखा जा सके, इसके लिए सरकार घुमाकर नाक पकड़ रही, बाद में इसका असर राजकोषीय घाटे के तौर पर पूरी इकोनॉमी पर पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में, फिलहाल, घर का बोझ उठकर सरकार की बैलेंस शीट पर आ गया है। लेकिन, किसी न किसी तरीके से आज नहीं, तो कल इसकी कीमत भी आम लोगों को ही चुकानी होगी।

महंगाई, रुपया और RBI की चिंता

ऊर्जा की हर तेज चाल भारत में महंगाई का अगला अध्याय लिखती है। RBI की तरफ से किए गए दखल के बाद भी रुपया फिर से 95 प्रति डॉलर की हर लांघने को आमादा है। तेल महंगा होने से आयातित मुद्रास्फीति की आशंका गहराती जा रही है। RBI की हालिया पॉलिसी मीटिंग के मिनट्स में भी Iran war की वजह से आए ऑयल स्पाइक को “supply shock” कहा गया है, यानी यह मांग का नहीं, सप्लाई का झटका है। इसका मतलब है कि महंगाई सिर्फ भोजन या ईंधन तक सीमित नहीं रहेगी। जब ट्रांसपोर्ट, खाना पकाने, होटल बिल और सप्लाई कॉस्ट बढ़ती है, तो उसका असर धीरे-धीरे बाकी कीमतों में भी समा जाता है। यही वजह है कि RBI अभी दरों में जल्द राहत देने के मूड में नहीं दिख रही।

यह संकट अभी खत्म नहीं हुआ है

सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह झटका एक बार का नहीं लग रहा। तेल कीमतें अब भी ऊंची बनी हुई हैं और सरकार ने भी घरेलू ईंधन कीमतों को स्थिर रखने के लिए सावधानी बरती है। दूसरी तरफ PNG विस्तार, बुकिंग नियमों और डिलीवरी ऑथेंटिकेशन जैसी सख्त व्यवस्थाएं बताती हैं कि सिस्टम अब सप्लाई शॉक और कालाबाजारी दोनों से लड़ने की कोशिश में है। यानी कहानी सिर्फ गैस के बिल की नहीं है। यह भारत की ऊर्जा निर्भरता, महंगाई की संवेदनशीलता और छोटे कारोबार की नाजुकता की कहानी है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो कमर्शियल LPG का यह झटका रसोई से निकलकर पूरे अर्थतंत्र को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल, युद्ध की आंच घरों तक नहीं पहुंची है, लेकिन कमर्शियल सिलिंडर के बढ़े हुए दाम बता रहे हैं कि युद्ध की हांडी में महंगाई उबल रही और, यह कब फट जाए कहा नहीं जा सकता है।

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