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FIFA World Cup Economics : समझिए अरबों का 'खेल', क्यों मेजबानी के लिए देशों में मचती है होड़?

FIFA World Cup दुनिया का सबसे बड़ा खेल इवेंट होता है। लेकिन, इस खेल इवेंट के साथ ही अरबों डॉलर के व्यापार का भी खेल चलता है, जिसकी वजह से तमाम देशों में इसे होस्ट करने की होड़ लगती है।

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फीफा वर्ल्ड कप 2026 बनेगा मनी मशीन
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jun 12, 2026, 15:22 IST
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FIFA World Cup Economics : दुनिया में हर काम के पीछे इकोनॉमिक डायनेमिक्स होते हैं। फीफा वर्ल्ड कप इस खेल को समझने का सबसे अच्छा जरिया है। एक तरफ ये अरबों लोगों के बीच लोकप्रिय खेल है। वहीं, दूसरी तरफ ये अरबों डॉलर का वैश्विक बिजनेस मॉडल भी है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की संयुक्त मेजबानी में होने वाला फीफा वर्ल्ड कप 2026 कई मायनों में ऐतिहासिक है। पहली बार इस इवेंट में 48 टीमें हिस्सा लेंगी और मैचों की संख्या 64 से बढ़कर 104 हो कर दी गई है। यह विस्तार फीफा से रिकॉर्ड कमाई की संभावनाएं बना रहा है। जानें कैसे फीफा होस्ट करने वाले देशों के लिए एक पैसा छापने का इवेंट बन जाता है।

फीफा बन गया है 'मनी मशीन'

फीफा का 2023-2026 कमर्शियल साइकल इतिहास का सबसे प्रॉफिटेबल दौर माना जा रहा है। संगठन ने पहले 11 अरब डॉलर की कमाई का अनुमान लगाया था, लेकिन अब यह आंकड़ा 13 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। इसमें करीब 8.9 अरब डॉलर केवल 2026 वर्ल्ड कप से आएंगे। फीफा की कमाई के चार बड़े स्रोत होते हैं। ब्रॉडकास्टिंग राइट्स, टिकट बिक्री, स्पॉन्सरशिप और लाइसेंसिंग। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा टीवी और डिजिटल प्रसारण अधिकारों से आता है। 104 मैचों के कारण प्रसारकों को ज्यादा विज्ञापन स्लॉट मिले हैं, जिससे फीफा की कमाई में जबरदस्त उछाल आया है। टिकटिंग भी अब केवल सीट बेचने तक सीमित नहीं है। फीफा ने आधिकारिक रीसेल प्लेटफॉर्म शुरू किया है, जिससे सेकेंडरी मार्केट में होने वाली बिक्री पर भी उसे कमीशन मिलता है। कई हाई-प्रोफाइल मैचों के टिकट हजारों डॉलर में बिक रहे हैं और फाइनल की कुछ सीटों की कीमत 33,000 डॉलर तक पहुंच चुकी है।

मेजबानी का सपना

फुटबॉल वर्ल्ड कप होस्ट करना किसी भी देश के लिए सपना होता है। यह इवेंट एक तरफ मेजबान देश को प्रतिष्ठा देता है। दूसरी तरफ इस तरह के इवेंट से इकोनॉमी को बड़ा बूम भी मिलता है। हालांकि, कमाई के साथ ही देशों को मेजबानी पर भारी खर्च भी करना पड़ता है। सुरक्षा, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक खर्च स्थानीय स्तर पर किए जाते हैं। अक्सर वर्ल्ड कप की मेजबानी में उम्मीद से ज्यादा खर्च होता है। हालांकि, 2026 का मॉडल थोड़ा अलग है। अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको ने नए स्टेडियम बनाने के बजाय मौजूदा स्टेडियमों का उपयोग करने का फैसला किया है। इससे निर्माण लागत काफी कम हुई है। फिर भी सुरक्षा और प्रशासनिक खर्च बहुत बड़े हैं। कनाडा को केवल 13 मैचों की मेजबानी के लिए एक अरब कनाडाई डॉलर से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जबकि अमेरिकी सरकार ने सुरक्षा के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर का बजट रखा है।

निजी कारोबारों के लिए 'जैकपॉट'

जहां सरकारों को सीधे वित्तीय लाभ सीमित मिलते हैं, वहीं निजी क्षेत्र के लिए वर्ल्ड कप किसी जैकपॉट से कम नहीं होता। होटल, एयरलाइंस, रेस्तरां, बार, इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां और सुरक्षा एजेंसियां इस दौरान रिकॉर्ड कमाई करती हैं। लाखों पर्यटकों, मीडिया कर्मियों और कॉर्पोरेट मेहमानों के आने से होटल बुकिंग और हवाई किरायों में भारी उछाल आता है। स्टेडियमों के आसपास के व्यवसायों को भी सीधा फायदा मिलता है। इसके बावजूद अर्थशास्त्रियों का मानना है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव सीमित रहता है। अनुमान है कि वर्ल्ड कप से अमेरिका की जीडीपी में महज 0.05% और मेक्सिको की जीडीपी में 0.1% से 0.2% तक का ही अतिरिक्त योगदान होगा।

भारत में बिना खेले अरबों का कारोबार

दिलचस्प बात यह है कि टूर्नामेंट भारत में नहीं हो रहा, लेकिन इसका आर्थिक असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। भारत फीफा वर्ल्ड कप से जुड़ी डिजिटल सामग्री का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन चुका है। भारत में सबसे बड़ा दांव प्रसारण कारोबार पर लगा है। ज़ी ने 2034 तक के फीफा प्रसारण अधिकार हासिल किए हैं और इस टूर्नामेंट को अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल पर पेश कर रहा है। इससे भारतीय मीडिया इंडस्ट्री में स्पोर्ट्स कंटेंट के बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां भी इस मौके का फायदा उठा रही हैं। केरल और पश्चिम बंगाल जैसे फुटबॉल प्रेमी राज्यों में बड़ी स्क्रीन वाले टीवी की मांग बढ़ी है। स्पोर्ट्स बार, फूड चेन और मर्चेंडाइज कंपनियां भी विशेष ऑफर और प्रमोशनल कैंपेन चला रही हैं।

आखिर मेजबानी के लिए इतनी होड़ क्यों?

यदि सीधा आर्थिक लाभ सीमित है, तो फिर देश फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी के लिए इतनी प्रतिस्पर्धा क्यों करते हैं? इसका जवाब 'सॉफ्ट पावर' और वैश्विक ब्रांडिंग में छिपा है। कतर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2022 वर्ल्ड कप के बाद वहां पर्यटन में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई और देश की वैश्विक पहचान मजबूत हुई। कई सरकारें वर्ल्ड कप को केवल खेल आयोजन नहीं, बल्कि दुनिया के सामने अपनी छवि और क्षमता दिखाने का मंच मानती हैं।

Fifa Infographic

Fifa Infographic

फीफा वर्ल्ड कप 2026 केवल फुटबॉल का महाकुंभ नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, मीडिया, पर्यटन और ब्रांडिंग का भी सबसे बड़ा मंच है। मेजबान देशों को जहां भारी निवेश और जोखिम उठाने पड़ते हैं, वहीं स्थानीय कारोबारों को अल्पकालिक फायदा मिलता है। लेकिन पूरे खेल में सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित विजेता एक ही संस्था दिखाई देती है—फीफा, जो बिना स्टेडियम बनाए और बिना सरकारी खर्च उठाए अरबों डॉलर की कमाई अपने खाते में दर्ज कर लेता है।

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