अमेरिकी सत्ता की बागडोर संभालने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप एक के बाद एक ऐसे फैसले ले रहे हैं, जो अमेरिका को फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचा रहा है। पहले उन्होंने दुनियाभर के देशों पर बेतहाशा टैरिफ बढ़ाया। उनके इस फैसले से दुनिया में ट्रेड वॉर शुरू हो गया। हालांकि, इस फैसले से अमेरिका भी अछूता नहीं रहा। अमेरिका में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ गई है। अमेरिका में मंदी आने का खतरा भी है। अब ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा फीस में भारी बढ़ोतरी का ऐलान किया है। ट्रंप ने नए H-1B वीजा के लिए आवेदन फीस को बढ़ाकर $100,000 (लगभग 88 लाख रुपये) कर दिया है। यह फीस पहले के शुल्क (आमतौर पर $2,000 से $5,000) से लगभग 60 गुना अधिक है। ट्रंप के इस फैसले की आलोचना अमेरिकी कंपनियों के सीईओ कर रहे हैं। कई कंपनियों के सीईओ ने कहा कि, वीजा फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी से अमेरिकी कंपनियों को टैलेंट क्रंच का सामाना करना पड़ सकता है। इससे 'सुपरपावर' अमेरिका की नींव हिल सकती है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि H-1B वीजा फीस में बढ़ोतरी का ट्रंप का फैसला कैसे सेल्फ गोल साबित हो सकता है? भारत के पास आगे अब क्या विकल्प है।
अमेरिकी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ेंगी
विशेषज्ञों का मानना है कि H-1B वीजा फीस में बढ़ोतरी से शुरुआत में भारत को झटका लग सकता है, लेकिन असली दबाव अमेरिका की कंपनियों पर पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि H-1B वीजा से जुड़े हालिया फैसले अमेरिका की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अमेरिकी टेक कंपनियां इंजीनियर, वैज्ञानिक और आईटी विशेषज्ञों की भर्ती के लिए H-1B वीजा पर निर्भर रहती हैं। सबसे अधिक भारतीय प्रोफेशनल्स सिलिकॉन वैली में अपनी सेवा देते हैं। H-1B वीजा फीस में बढ़ोतरी से अमेरिकी कंपिनयों को सिकिल्उ प्रोफेशनल्स हायर करना मुश्किल होगा। इससे अमेरिका की सुपरपावर की नींव हिलेगी क्योंकि ब्रेन पावर के दम पर ही अमेरिका दुनिया पर राज करता है।
बताते चलें कि H-1B वीजा लेने वाले सबसे अधिक भारतीय हैं। करीब 70% H-1B वीजा भारतीयों को मिलते हैं। यही कारण है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और IBM जैसी कंपनियों में भारतीय मूल के CEO हैं। केवल टेक सेक्टर ही नहीं, अमेरिका के डॉक्टरों में भी लगभग 6% भारतीय मूल के हैं। अमेरिकी टेक कंपनियां पूरी दुनिया से खरबों डॉलर कमाती है। जब अच्छे टैलेंट ही अमेरिका के पास नहीं होंगे, तो इन कंपनियों की बादशाहत धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
अमेरिकी कंपनियों के CEO ने टिप्पणी की
Nvidia के सीईओ जेन्सेन हुआंग और ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने वीजा फीस बढ़ाने के फैसले पर टिप्पणी की है। हुआंग ने सोमवार को कहा कि हम चाहते हैं कि सभी प्रतिभाशाली लोग अमेरिका आएं और याद रखें कि आव्रजन अमेरिकी सपने की नींव है। हम अमेरिकी सपने का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आव्रजन हमारी कंपनी और हमारे देश के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऑल्टमैन ने कहा, हमें देश में सबसे अच्छे लोगों को लाने की जरूरत है। मस्क ने एक्स पर लिखा: “मैं अमेरिका में इसलिए हूं और इतने सारे महत्वपूर्ण लोग भी जो SpaceX, Tesla और सैकड़ों अन्य कंपनियों को बनाने में शामिल रहे और अमेरिका को मजबूत बनाया, क्योंकि H-1B है।
H-1B वीजा
थोड़े समय तक भारतीय प्रोफेशनल्स को होगी परेशानी
ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा फीस में भारी बढ़ोतरी के बाद चीन K वीजा प्रोग्राम लेकर आया है। चीन की कोशिश भारत समेत दुनियाभर के बेहतरीन टैलेंट को अपने देश में नौकरी देने की है। आपको बता दें कि चीन ने AI, बायोटेक्नोलॉजी, बायोइंजीनियरिंग, ग्रीन एनर्जी, डेटा साइंस और बिजनेस एनालिस्ट फिल्ड में दुनियाभर के युवाओं को आकर्षित करने के लिए K वीजा प्रोग्राम का ऐलान किया है। इतना ही नहीं, जर्मनी, कनाडा, ब्रिटेन समेत कई अन्य देश विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की शीर्ष प्रतिभाओं को लुभाने के लिए प्रयासरत हैं। जानकारों का कहना है कि थोड़े समय के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स को अमेरिकी फैसले से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है लेकिन फिर कोई दिक्कत नहीं आएगी। उल्टे इसका नुकसान अमेरिका को होगा। भारतीय प्रोफेशनल्स कम लगात में बेहतर रिजल्ट देने के लिए दुनियाभर में मसहूर हैं। इसलिए अमेरिकी फैसले के बाद दुनियाभर के कई देशा भारतीय प्रोफेशनल्स को अपने यहां बुलाने के लिए अपनी नीतियों को लचीला बना रहे हैं।
भारत के लिए नए रास्ते
- ऑफशोर डिलीवरी बढ़ेगी: भारतीय कंपनियां अब अपने प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा भारत से ही पूरा करने लगी हैं। इससे भारत में आईटी सेवाओं की मांग और विशेषज्ञता बढ़ेगी।
- रिमोट वर्क और गिग इकॉनमी पर जोर: अमेरिकी कंपनियां रिमोट कॉन्ट्रैक्टिंग पर ज्यादा भरोसा करेंगी। इसका मतलब यह है कि भारतीय पेशेवर बिना अमेरिका जाए भी अमेरिकी कंपनियों के लिए काम कर सकते हैं।
- अन्य देशों की ओर रुख: कनाडा, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसी देशों ने भारतीय पेशेवरों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। भारतीय प्रतिभा अब इन देशों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
- लोकल वर्कफोर्स को बढ़ावा: अमेरिकी कंपनियों को अब लोकल वर्कफोर्स बढ़ानी होगी। इससे भारत और अन्य देशों में भारतीय कंपनियों के लिए अवसर बढ़ेंगे क्योंकि उन्हें विदेशी प्रोजेक्ट्स पर काम करना होगा।
सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा?
कई देश अपनी तकनीकी और STEM प्रतिभाओं को मजबूत कर रहे हैं और H-1B वीजा शुल्क वृद्धि के कारण अमेरिकी नौकरियों से बाहर हो चुके वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण, कनाडा इस नीति परिवर्तन का सबसे बड़ा लाभार्थी हो सकता है। इस बीच, ब्रिटेन का "ग्लोबल टैलेंट टास्क फोर्स" शिक्षाविदों और डिजिटल विशेषज्ञों सहित शीर्ष वैश्विक वैज्ञानिकों को आकर्षित करने के लिए काम कर रहा है। जर्मनी पहले ही H-1B वीजा धारकों को अपने यहां नौकरी की तलाश करने के लिए आमंत्रित कर चुका है।
