Banks Merger Explained : भारत ने वर्ष 2047 तक खुद को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने लक्ष्य रखा है। इसके लिए निकट भविष्य में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य हासिल करना जरूरी है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे, विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) और व्यावसायिक गतिविधियों में भारी निवेश की जरुरत है। इन बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज देने की जरूरत होगी, जो केवल मजबूत और वित्तीय रूप से सक्षम बैंक ही दे सकते हैं। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने देश में बैंकों के एकीकरण (विलय) की वकालत की है, ताकि भारत में वैश्विक स्तर के बड़े बैंक तैयार किए जा सकें।
आर्थिक वृद्धि के लिए बड़े बैंकों की जरुरत
किसी भी देश की आर्थिक प्रगति उसकी बैंकिंग सिस्टम की मजबूती पर निर्भर करती है। EAC-PM के एक हालिया अध्ययन पत्र में कहा गया है कि 2047 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देश की बढ़ती लोन जरुरतों को पूरा करना अनिवार्य है। वर्तमान में भारतीय बैंकिंग उद्योग में बैंकों का आकार काफी असमान है; कुछ बैंकों के पास 20 प्रतिशत से अधिक बाजार हिस्सेदारी है, तो कई बैंक 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी पर काम कर रहे हैं। इस असमानता को दूर करने और दक्षता बढ़ाने के लिए समान आकार के कुछ बड़े बैंक बनाना जरूरी है। विशाल बैंकों के पास मजबूत पूंजी आधार होता है, जिससे वे बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स और औद्योगिक पार्कों को बिना किसी वित्तीय जोखिम के आसानी से फंड कर सकते हैं।
बैंकों के मर्जर का गणित और पिछला अनुभव
भारत में बैंकों के मर्जर यानी विलय की प्रक्रिया कोई नई नहीं है। 2017 में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में उसके सहयोगी बैंकों के विलय से इसकी शुरुआत हुई थी। इसके बाद 2019 में बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ विजया बैंक और देना बैंक का विलय किया गया। वर्ष 2020 में एक बड़ा कदम उठाते हुए 10 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का आपस में विलय करके उन्हें 4 बड़े बैंकों में बदल दिया गया। इन विलयों के परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) की कुल संख्या 27 से घटकर 12 रह गई। इस विलय का मुख्य उद्देश्य परिचालन लागत में कमी लाना, शाखाओं की पहुंच बढ़ाना और बैंकों की जोखिम उठाने की क्षमता को मजबूत करना था।
दक्षता, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा में सुधार
अध्ययन के अनुसार, बैंकों के विलय से बड़े पैमाने पर काम करने का लाभ मिला है। सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रयासों के कारण भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की दक्षता में सुधार हुआ है। 'डेटा एनवलपमेंट एनालिसिस' (DEA) पद्धति से 47 बैंकों के प्रदर्शन का आकलन करने पर पाया गया कि बैंकों की औसत तकनीकी दक्षता वित्त वर्ष 2019-20 के 77.99 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 88.34 प्रतिशत हो गई है। खास बात यह है कि वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी बैंकों की दक्षता 93.12 प्रतिशत दर्ज की गई, जो प्राइवेट बैंकों (86.02 प्रतिशत) और विदेशी बैंकों (83-85 प्रतिशत) की तुलना में बेहतर रही। हालांकि अध्ययन में यह भी ध्यान दिलाया गया है कि कमजोर बैंकों को मजबूत बैंकों के साथ मिलाने से कुछ समय के लिए अधिग्रहण करने वाले बैंकों की दक्षता पर थोड़ा असर जरूर पड़ा है। इसलिए भविष्य में मर्जर इस तरह होना चाहिए कि इससे बैंकिंग क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रभावित न हो।
क्यों भारत को है 'सुपर बैंकों' की जरूरत! (तस्वीर-istock)
टैक्नोलॉजी और एआई आधारित भविष्य की बैंकिंग
आने वाले समय में केवल बैंकों का बड़ा आकार ही काफी नहीं होगा, बल्कि टैक्नोलॉजी का एकीकरण भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। EAC-PM का मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल तकनीकों के इस्तेमाल से बैंकिंग सेवाएं अधिक कुशल और पारदर्शी होंगी। इससे न केवल बैंकों की परिचालन दक्षता बढ़ेगी, बल्कि युवा ग्राहकों की जरुरतों के अनुसार सेवाओं का अनुकूलन भी संभव हो सकेगा। भविष्य की बैंकिंग केवल ग्राहकों की समस्याओं का समाधान करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एआई के माध्यम से ग्राहकों की वित्तीय जरुरतों का पहले से अनुमान लगाकर सक्रिय सेवाएं प्रदान करेगी।
