ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा युद्ध आखिरकार थम गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने और एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर मुहर लगने का ऐलान किया है, जिसकी पुष्टि ईरान की तरफ से भी कर दी गई है। मिडिल ईस्ट में शांति की की इस खबर का असर आज भारतीय रुपये से लेकर शेयर बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। शेयर बाजार में शानदार तेजी है। रुपया भी डॉलर के सामने 58 पैसे मजबूत हुआ है। सबसे बड़ी राहत कच्चे तेल के मोर्चे पर मिली है। होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर से खुलने की खबर के बीच क्रूड ऑयल की कीमतों में करीब 5% की गिरावट दर्ज की गई है। एनर्जी एक्सपर्ट का कहना है कि आने वाले दिनों में तेल और सस्ता होगा, जो भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए बड़ी राहत साबित होगा।
लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा संकट पूरी तरह टल गया है? क्या शेयर बाजार, रुपया और आम लोगों के लिए अब ‘अच्छे दिन’ शुरू हो गए हैं? क्या अब महंगाई नहीं बढ़ेगी? अगर आप भी ऐसा सोच रहे हैं, तो जरा ठहरिए! आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि पिक्चर अभी बाकी है। युद्ध थमना एक मनोवैज्ञानिक राहत जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर आर्थिक घावों को भरने में अभी लंबा वक्त लगेगा। ऐसा क्यों, आइए समझते हैं।
इंडियन इकोनॉमी को तुरंत राहत नहीं!
अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने का रास्ता साफ हो गया है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स और अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह भारत सहित तमाम एशियाई देशों के लिए एक बहुत बड़ी राहत है। गौरतलब है कि मिडिल ईस्ट के इस तनाव की सबसे भारी कीमत साउथ एशियाई देशों को चुकानी पड़ी है, जिसमें भारत भी शामिल रहा है।
होर्मुज जलमार्ग के बंद होने के कारण पिछले साढ़े तीन महीनों में पूरी एशियाई अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है। भारतीय रुपये समेत पूरे एशिया की मुद्राओं की वैल्यू डॉलर के मुकाबले तेजी से गिरी। कच्चे तेल और गैस की किल्लत से महंगाई बढ़ी है। सप्लाई-चेन टूटने से फैक्ट्रियों के आउटपुट पर बेहद बुरा असर पड़ा।
ऐसे में जानकारों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता पूरी तरह लागू रहता है, तो इसका तात्कालिक फायदा बाजार को जरूर मिलेगा। तेल, गैस और अन्य ईंधन उत्पादों से लदे सैकड़ों टैंकर, जो पिछले कई हफ्तों से फंसे हुए थे, वे अब एशियाई बंदरगाहों के लिए अपनी यात्रा फिर से शुरू कर सकेंगे। लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं! अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इकोनॉमी के हालात रातों-रात नहीं सुधरेंगे। बाजार को संभलने में वक्त लगेगा। सप्लाई-चेन पर पड़ा हुआ असर और महंगाई का बढ़ा हुआ स्तर इस साल के अंत तक बने रहने की आशंका है।
आम लोगों को महंगाई अभी सताएगी
ईरान युद्ध जरूर खत्म हो गया है लेकिन बढ़ी महंगाई से साल के अंत तक राहत नहीं मिलने की उम्मीद है। ऐसा सप्लाई चेन पर दबाव और ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने से होगा। सोमवार को सरकार ने महंगाई के आंकड़े जारी किए हैं। इसमें देश में थोक महंगाई मई 2026 में बढ़कर 9.68 फीसदी हो गई है। इससे पहले अप्रैल में यह 8.26 फीसदी रही थी। इन आंकड़ों के मुताबिक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) सिंतबर 2022 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। खुदरा महंगाई भी बढ़कर 3.93% पर पहुंंच गई है।
होर्मुज संकट के कारण पेट्रोल, डीजल से लेकर रसोई गैस के दाम बढ़े हैं। इससे आम लोगों पर खर्च का बोझ बढ़ा है। इस महंगाई से फौरी राहत मिलने की उम्मीद अभी नहीं है। तेल कंपनियों को अभी भी भारी नुकसान हो रहा है। ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमत कम भी होती है तो जल्द ईंधन सस्ता होने की उम्मीद बिल्कुल नहीं है।
ईरान युद्ध का असर
बाजार में बहार, लेकिन चुनौतियां बाकी
ईरान युद्ध खत्म होने और होर्मुज खुलने की उम्मीद से भारतीय शेयर बाजार में पिछले दो ट्रेडिंग सेशन में शानदार तेजी दर्ज की गई है। शुक्रवार के बाद आज सोमवार को शेयर बाजार में शानदार तेजी है। हालांकि, मार्केट एक्सपर्ट इस उछाल को फिलहाल स्थायी नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि भारतीय शेयर बाजार में गिरावट सिर्फ ईरान संकट या होर्मुज ब्लॉकेज की वजह से नहीं आई थी। बाजार पर दबाव पहले से बना हुआ था। विदेशी निवेशकों ने 2025 के बाद 2026 में भी बड़ी बिकवाली की है। इसकी एक बड़ी वजह भारतीय शेयरों का अन्य उभरते बाजारों (Emerging Markets) की तुलना में महंगा होना और रुपये में कमजोरी रही है।
इसके अलावा, बहुत सारी कंपनियों के कमजोर नतीजों ने भी निवेशकों का भरोसा डगमगाया है। ऐसे में सिर्फ ईरान तनाव कम होने से बाजार की सभी समस्याएं दूर नहीं हुईं हैं। मार्केट एक्सपर्ट का मानना है कि बाजार में टिकाऊ तेजी तभी संभव है, जब कंपनियों की कमाई में सुधार दिखे, रुपये में स्थिरता और मजबूती लौटे तथा देश की आर्थिक वृद्धि (GDP Growth) की रफ्तार तेज हो। तब तक मौजूदा रैली को राहत आधारित और शॉर्ट टर्म के लिए माना जा सकता है। इसलिए, निवेशक इस तेजी में बहने के बजाय फूंक-फूंक कर कदम रखें।
