भारत में प्रॉपर्टी या पुराना घर बेचना सिर्फ एक बड़ा वित्तीय सौदा नहीं होता, बल्कि इसके साथ एक बड़ी टैक्स लायबिलिटी भी जुड़ी होती है। जब भी आप कोई पुराना रिहायशी मकान या जमीन बेचते हैं, तो उस पर मिले मुनाफे पर सरकार को 'कैपिटल गेन्स टैक्स' (Capital Gains Tax) देना पड़ता है। अगर आपने प्रॉपर्टी को दो साल (24 महीने) से अधिक समय तक अपने पास रखने के बाद बेचा है, तो इस मुनाफे को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) कहा जाता है। इस टैक्स के कारण आपके मुनाफे का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के खाते में चला जाता है, जिससे बचने के लिए लोग अक्सर नया रेडी-टू-मूव (बना-बनाया) घर तलाशते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आयकर कानून के तहत आप एक निर्माणाधीन या अंडर-कंस्ट्रक्शन मकान (Under-Construction Property) में पैसा लगाकर भी अपना लाखों रुपए का कैपिटल गेन्स टैक्स पूरी तरह बचा सकते हैं?
निर्माणाधीन बिल्डिंग कैसे बचाएगी टैक्स?
इनकम टैक्स एक्ट 1961 का सेक्शन 54 (Section 54) टैक्सपेयर्स को यह शानदार मौका देता है। बहुत से लोगों को यह भ्रम रहता है कि टैक्स छूट का लाभ केवल तभी मिलता है जब पुराना घर बेचकर तुरंत कोई तैयार फ्लैट या मकान खरीदा जाए। लेकिन असलियत यह है कि कानून आपको एक अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में निवेश करने या अपनी खुद की जमीन पर नया मकान बनवाने के लिए भी टैक्स में पूरी छूट प्रदान करता है। इस नियम का सही इस्तेमाल करके आप न सिर्फ टैक्स बचा सकते हैं, बल्कि अपनी पसंद का नया घर भी तैयार करवा सकते हैं। आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी के जरिए टैक्स बचाने का यह पूरा गणित और इसकी समय-सीमा क्या है।
इस नियम के तहत टैक्स छूट का दावा करने के लिए आयकर विभाग ने कुछ बेहद सख्त समय-सीमाएं (Timelines) तय की हैं, जिन्हें जानना आपके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। कानून के मुताबिक, अगर आप पुराना घर बेचने के बाद किसी बिल्डर के अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक करते हैं या नया घर बनवाना शुरू करते हैं, तो पुरानी प्रॉपर्टी की बिक्री की तारीख से लेकर अगले 3 साल के भीतर उस नए मकान का निर्माण कार्य पूरी तरह से मुकम्मल हो जाना चाहिए। यानी बिल्डर को 3 साल के अंदर आपको फ्लैट का पजेशन (कब्जा) सौंपना होगा। अगर बिल्डर नियत समय में काम पूरा नहीं करता है, तो आपकी टैक्स छूट खतरे में पड़ सकती है। हालांकि, अदालतों के कई फैसलों में टैक्सपेयर्स को राहत भी मिली है, जहां यह माना गया है कि अगर खरीदार ने अपनी तरफ से पूरा पैसा चुका दिया है और देरी बिल्डर की गलती से हुई है, तो छूट रद्द नहीं होगी; लेकिन विवादों से बचने के लिए 3 साल की इस सीमा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
ऐसे भी बचेगा टैक्स
अब एक बहुत बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर आईटीआर (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख आ जाए और तब तक पैसा नए घर में इन्वेस्ट न हुआ हो, तो क्या करें? मान लीजिए आपने जनवरी में अपनी प्रॉपर्टी बेची और आपको ₹50 लाख का मुनाफा हुआ। अब जुलाई में आपको इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करना है, लेकिन आपको अभी तक कोई अच्छी अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी नहीं मिली है या बिल्डर को किस्तों में पैसा देना है। ऐसी स्थिति में आपको टैक्स के भारी नुकसान से बचाने के लिए सरकार ने 'कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम' (CGAS - Capital Gains Account Scheme) बनाई है। आपको आईटीआर भरने की अंतिम तारीख से पहले किसी भी सरकारी बैंक में जाकर यह स्पेशल खाता खुलवाना होगा और अपने मुनाफे की रकम (Capital Gains) को इस खाते में जमा करना होगा। ऐसा करने से आयकर विभाग यह मान लेगा कि आपने टैक्स बचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, और आपको उस साल टैक्स नहीं देना पड़ेगा। बाद में, आप इस खाते से पैसे निकालकर 3 साल के भीतर अपने अंडर-कंस्ट्रक्शन मकान की किस्तों का भुगतान कर सकते हैं।
इसके अलावा, इस खास नियम का लाभ उठाने के लिए कुछ अन्य महत्वपूर्ण शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है। सबसे पहली शर्त यह है कि सेक्शन 54 के तहत टैक्स छूट केवल इंडिविजुअल्स (व्यक्तियों) और एचयूएफ (HUF) को ही मिलती है, किसी कंपनी या पार्टनरशिप फर्म को नहीं। दूसरी बात, यह छूट सिर्फ रिहायशी मकान (Residential Property) को बेचकर दूसरा रिहायशी मकान खरीदने या बनाने पर ही लागू होती है; कमर्शियल दुकान या प्लॉट बेचने पर इसके नियम बदल जाते हैं (वहां सेक्शन 54F लागू होता है)। इसके साथ ही, इस नियम के तहत खरीदे या बनवाए गए नए मकान को आपको अगले 3 साल तक बेचने की अनुमति नहीं होती है। अगर आप नया अंडर-कंस्ट्रक्शन मकान पजेशन मिलने के 3 साल के भीतर बेच देते हैं, तो जो टैक्स आपने पहले बचाया था, वह वापस आपकी इनकम में जोड़ दिया जाएगा और उस पर दोबारा टैक्स वसूल लिया जाएगा। इसलिए, प्रॉपर्टी बेचने के बाद हड़बड़ी में कोई गलत सौदा करने के बजाय, इस नियम की मदद से एक अच्छे अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में निवेश करना आपकी जेब के लिए एक बेहद समझदारी भरा और टैक्स-बचत का बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
