ईरान संकट लंबा खिंचने से कच्चे तेल से लेकर रासायनिक खादों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है। भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी कच्चा तेल और खाद विदेशों से आयात करता है। ईरान युद्ध और होर्मुज ब्लॉकेज से कच्चे तेल से लेकर खाद की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इस बड़े संकट से पार पाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से 7 बड़ी अपील की हैं। इनमें एक साल तक सोना नहीं खरीदने, तेल की खपत कम करने और किसानों से रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाकर प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील शामिल है।
अब सवाल यह है कि क्या बिना यूरिया और DAP के भी देश की खाद्य जरूरतें पूरी की जा सकती हैं? प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद सिक्किम का 100% ऑर्गेनिक खेती मॉडल फिर चर्चा में है, जहां पूरी खेती बिना रासायनिक खाद के की जाती है। क्या सिक्किम जैसा मॉडल पूरे भारत में लागू हो सकता है, और क्या यही भविष्य की खेती का रास्ता है? आइए समझते हैं—
पीएम मोदी ने क्या अपील की?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 मई को हैदराबाद में रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भारत आज भी उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, जिससे देश की विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है। प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि खेतों में रासायनिक खादों का लगातार और अत्यधिक उपयोग मिट्टी की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति भविष्य में कृषि उत्पादन के लिए बड़ा संकट बन सकती है। पीएम मोदी के मुताबिक, रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध इस्तेमाल हमारी “धरती मां” को कमजोर कर रहा है। इससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता धीरे-धीरे खत्म हो रही है और कई इलाकों में जमीन बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है। इसको देखते हुए पीएम मोदी ने किसानों से प्राकृतिक खेती पर जोर देने की अपील की है।
क्या है ऑर्गेनिक और प्राकृतिक खेती?
ऑर्गेनिक खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की जगह जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और प्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं प्राकृतिक खेती का मॉडल इससे एक कदम आगे है, जहां देसी गाय के गोबर और गौमूत्र से बने जीवामृत, घनजीवामृत और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। इस मॉडल से खेती की लागत घटती है, मिट्टी की सेहत सुधरती है और किसानों की आय बढ़ सकती है। हालांकि, यह बदलाव एक दिन में संभव नहीं होता और खेतों को रसायनों से मुक्त होने में समय लगता है।
कैसे बना सिक्किम 100% ऑर्गेनिक राज्य?
हिमालय की गोद में बसा सिक्किम आज दुनिया के सामने टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल खेती का एक सफल मॉडल बनकर उभरा है। वर्ष 2016 में सिक्किम भारत का पहला और दुनिया के चुनिंदा 100% ऑर्गेनिक राज्यों में शामिल हो गया। इस छोटे से राज्य ने यह साबित कर दिया कि बिना रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के भी खेती की जा सकती है और पर्यावरण के साथ-साथ किसानों की आय को भी सुरक्षित रखा जा सकता है। बता दें कि सिक्किम ने वर्ष 2003 से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल को धीरे-धीरे कम करने की शुरुआत की। करीब 13 वर्षों तक चरणबद्ध तरीके से रसायनों पर निर्भरता घटाने के बाद 2016 में सिक्किम दुनिया का पहला 100% ऑर्गेनिक राज्य बना। राज्य सरकार ने सिंथेटिक खाद और कीटनाशकों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया और किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर प्रेरित किया। इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य मिट्टी की सेहत सुधारना, जैव विविधता को बचाना और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना था।
सिक्किम मॉडल की सफलता के पीछे क्या है खास?
सिक्किम की ऑर्गेनिक खेती केवल एक सरकारी घोषणा नहीं थी, बल्कि इसके लिए मजबूत संस्थागत ढांचा तैयार किया गया। 2010 में “सिक्किम ऑर्गेनिक मिशन” की स्थापना की गई, जिसने किसानों को प्रशिक्षण, जैविक खाद बनाने की तकनीक और प्रमाणन प्रक्रिया में सहायता दी। किसानों को कंपोस्ट, वर्मी-कंपोस्ट, फसल चक्र, इंटरक्रॉपिंग और नीम आधारित जैविक कीटनाशकों का उपयोग सिखाया गया। राज्य ने बड़ी इलायची, अदरक, हल्दी, कीवी और एवोकाडो जैसी हाई वैल्यू फसलों पर फोकस किया, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिल सके।
पर्यावरण और मिट्टी को क्या मिला फायदा?
सिक्किम मॉडल का सबसे बड़ा लाभ पर्यावरण संरक्षण के रूप में सामने आया। रासायनिक उर्वरकों के बंद होने से मिट्टी और जल स्रोतों में प्रदूषण कम हुआ। जैविक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता और सूक्ष्मजीव गतिविधियां बढ़ीं। इसके अलावा, जैव विविधता को संरक्षण मिला और खेतों में लाभकारी कीटों व परागणकर्ताओं की संख्या में सुधार हुआ। प्राकृतिक खेती पद्धतियों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भी कम करने में मदद की, जिससे यह मॉडल जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सिक्किम मॉडल के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां आईं?
हालांकि सिक्किम का मॉडल पर्यावरणीय दृष्टि से सफल माना जाता है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी रहीं। कई किसानों ने शुरुआत में अदरक, मक्का और दालों जैसी फसलों की पैदावार घटने की शिकायत की। जैविक कीटनाशकों की सीमित उपलब्धता के कारण कीट और रोग प्रबंधन भी बड़ी समस्या बना। किसानों को हर जगह पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण नहीं मिल पाया और बाजार तक पहुंच कमजोर रहने से उन्हें ऑर्गेनिक उत्पादों का उचित दाम नहीं मिला। इसके अलावा प्रमाणन प्रक्रिया महंगी और जटिल होने के कारण छोटे किसानों पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ा।
Sikkim organic model
ऑर्गेनिक खेती से टूरिज्म को बढ़ावा मिला
ऑर्गेनिक खेती ने सिक्किम में इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा दिया। देश-विदेश से पर्यटक अब सिक्किम के ऑर्गेनिक फार्म देखने और प्राकृतिक उत्पादों का अनुभव लेने पहुंच रहे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हुए हैं। सिक्किम की इस उपलब्धि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र की संस्था FAO ने सिक्किम को “फ्यूचर पॉलिसी अवॉर्ड” से सम्मानित किया, जिसे “ऑस्कर फॉर बेस्ट पॉलिसीज” भी कहा जाता है।
क्या पूरे भारत में लागू हो सकता है सिक्किम मॉडल?
विशेषज्ञों का मानना है कि सिक्किम मॉडल पूरे भारत के लिए प्रेरणादायक जरूर है, लेकिन इसे हूबहू लागू करना आसान नहीं होगा। भारत के अलग-अलग राज्यों की जलवायु, मिट्टी और खेती की जरूरतें अलग हैं। इसलिए किसी भी राज्य को स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से ऑर्गेनिक मॉडल अपनाना होगा। हालांकि सिक्किम ने यह साबित कर दिया है कि चरणबद्ध तरीके, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, किसान प्रशिक्षण और बाजार समर्थन के जरिए रासायनिक खेती पर निर्भरता कम की जा सकती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राकृतिक खेती अपील के बाद अब सिक्किम मॉडल पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।
