शनिवार को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों (ऑपरेशन एपिक फ्युरी) में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने मध्य-पूर्व की राजनीति में एक ऐसा भूकंप ला दिया है, जिसकी तीव्रता पूरी दुनिया महसूस कर रही है। 1989 से ईरान पर शासन करने वाले 86 वर्षीय खामेनेई ने सार्वजनिक रूप से कभी अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया था। अब सवाल यह है कि क्या दशकों पुराना यह मजहबी निजाम इस झटके को बर्दाश्त कर पाएगा? तेहरान की गलियों से लेकर वॉशिंगटन के गलियारों तक, बस एक ही चर्चा है, ईरान का अगला 'सुप्रीम लीडर' कौन होगा?
कैसे चुना जाता है नया सर्वोच्च नेता?
ईरान के संविधान के अनुसार, नए नेता का चुनाव 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' (Assembly of Experts) द्वारा किया जाता है। यह 88 वरिष्ठ मौलवियों का एक निर्वाचित निकाय है। इस्लामिक गणराज्य के इतिहास में अब तक केवल एक बार ऐसा हुआ है, जब 1989 में खुमैनी की मौत के बाद खामेनेई को जल्दबाजी में चुना गया था। नया नेता चुनने के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं, नेता पुरुष होना चाहिए, जो उच्च श्रेणी का मौलवी भी हो, उसमें राजनीतिक क्षमता और नैतिक अधिकार हो, और सबसे जरूरी, वह इस्लामिक गणराज्य के प्रति अटूट वफादारी रखता हो। तो आइए एक नजर डालते हैं सबसे मजबूत दावेदारों के नाम पर।
1. अली लारीजानी (Ali Larijani):
लारीजानी हालिया दिनों में ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे हैं। 67 वर्षीय लारीजानी 'सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल' के सचिव हैं। हालांकि इनके पदभार संभालने के मामले में एक समस्या यह है कि लारीजानी संवैधानिक रूप से सर्वोच्च नेता नहीं बन सकते, क्योंकि वे वरिष्ठ शिया मौलवी नहीं हैं। हालांकि लारीजानी के संबंध मौलवियों, सेना (IRGC) और खुफिया तंत्र में बेहद गहराई तक हैं। संकट के इस दौर में खामेनेई ने खुद उन्हें सिस्टम को स्थिर करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि वे जानते हैं कि ईरान में फैसले कौन ले रहा है, और ऐसे में जो नाम सबसे आगे आता है वह व्यक्ति लारीजानी ही हैं।
2. मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei):
अयातुल्ला के दूसरे बेटे, 56 वर्षीय मोजतबा, पर्दे के पीछे से सरकार चलाने के लिए जाने जाते हैं। उनके पास रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) का समर्थन है, लेकिन शिया मौलवी परंपरा में पिता के बाद बेटे का शासन (Succession) अच्छा नहीं माना जाता। ईरान की क्रांति राजशाही को उखाड़ने के लिए हुई थी, ऐसे में मोजतबा को चुनना क्रांति के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा सकता है। इसके अलावा, वे उच्च श्रेणी के मौलवी भी नहीं हैं।
3. अलीरेजा अराफी (Alireza Arafi):
67 वर्षीय अराफी एक कम चर्चित लेकिन बेहद प्रभावशाली चेहरा हैं। वे वर्तमान में 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' के उपाध्यक्ष हैं। अंग्रेजी और अरबी के जानकार अराफी तकनीक की अच्छी समझ रखने वाले माने जाते हैं। खामेनेई ने उन्हें कई रणनीतिक पदों पर नियुक्त किया था, जो उनकी प्रशासनिक क्षमता पर भरोसे को दर्शाता है। हालांकि, IRGC के साथ उनके संबंध बहुत मजबूत नहीं हैं।
4. मोहम्मद महदी मीरबाघेरी (Mohammad Mehdi Mirbagheri):
60 वर्षीय मीरबाघेरी मौलवियों के सबसे कट्टरपंथी धड़े का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे पश्चिम के घोर विरोधी हैं। हाल ही में उन्होंने एक विवादित बयान दिया था कि "अगर दुनिया की आधी आबादी भी खत्म हो जाए, लेकिन उससे खुदा के करीब जाया जा सके, तो वह जायज है।" वे मानते हैं कि मोमिनों और काफिरों के बीच संघर्ष ऐसा है जिसे टाला नहीं जा सकता।
5. हसन खुमैनी (Hassan Khomeini):
इस्लामिक गणराज्य के संस्थापक अयातुल्ला रुहल्ला खुमैनी के पोते होने के नाते उनके पास धार्मिक और क्रांतिकारी वैधता (Legitimacy) है। हालांकि वे अन्य मौलवियों की तुलना में कम कट्टरपंथी माने जाते हैं, जिस कारण 2016 में उन्हें असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के चुनाव से रोक दिया गया था। सत्ता के शीर्ष नेतृत्व और सेना में उनका प्रभाव काफी कम है।
ट्रंप का रुख और भविष्य की अनिश्चितता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अयातुल्ला की मौत को "ईरानी जनता के लिए अपना देश वापस लेने का सबसे बड़ा अवसर" बताया है। ट्रंप ने तंज कसते हुए कहा कि ईरानी लोग उन्हें फोन करके पूछेंगे कि अगला नेता किसे होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अब ईरान के साथ बातचीत करना 'बहुत आसान' हो गया है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' सुरक्षित रूप से बैठक कर पाएगी? ट्रंप ने कसम खाई है कि "ऑपरेशन एपिक फ्युरी" के तहत बमबारी जारी रहेगी। ऐसे में किसी एक नाम पर सहमति बनाना और सत्ता का हस्तांतरण करना ईरान के मजहबी निजाम के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।