यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ती सैन्य कार्रवाई ने पश्चिम एशिया में तनाव को एक नए मोड़ पर ला दिया है। रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 12 लोगों की मौत और 300 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर के बाद सऊदी अरब ने अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बंद कर दिया है। साथ ही राजधानी रियाद में स्कूलों की पढ़ाई भी ऑनलाइन कर दी गई है। दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र और हवाई अड्डों पर नए हमलों की चेतावनी दी है।
इस घटनाक्रम ने इसलिए भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि पश्चिम एशिया में पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष खत्म कराने की कोशिशें ठप पड़ती दिख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य कार्रवाई में शामिल होने पर विचार कर सकता है। यदि ऐसा होता है, तो संघर्ष का दायरा और बढ़ सकता है। इसका असर केवल सऊदी अरब और यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए पांच अहम सवालों पर गौर करना जरूरी है-हूती कौन हैं, सऊदी अरब को निशाना क्यों बनाया जा रहा है,इस सैन्य टकराव में अमेरिका की संभावित भूमिका क्या होगी,साथ ही समुद्री रास्तों पर इसका क्या असर पड़ सकता है और आगे युद्ध किस दिशा में बढ़ सकता है?
हूतियों ने सऊदी अरब को निशाना क्यों बनाया?
यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच दुश्मनी कोई नई नहीं है। दोनों के बीच संघर्ष की जड़ें यमन के गृहयुद्ध से जुड़ी हैं। साल 2015 में सऊदी अरब ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया था। इसके बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन और हूतियों के बीच लंबे समय तक लड़ाई चलती रही।हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक-सैन्य संगठन है, जिसे ईरान का समर्थन प्राप्त है। संगठन ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित किया है, जिसमें राजधानी सना भी शामिल है। सऊदी अरब के लिए हूती लंबे समय से सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं, क्योंकि वे सऊदी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमले करने की क्षमता रखते हैं।
दोनों पक्षों के बीच 2022 में युद्धविराम के बाद कुछ समय तक अपेक्षाकृत शांति रही। लेकिन जुलाई में यह स्थिति बदल गई, जब हूतियों ने फिर से हमले शुरू कर दिए। हूतियों ने आरोप लगाया कि सना हवाई अड्डे पर सऊदी अरब की ओर से गोलीबारी की गई थी, जब ईरान से आ रहा एक विमान उतरने की कोशिश कर रहा था। इसके बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन की नाकेबंदी को लेकर भी हूतियों का गुस्सा बढ़ गया।
हालिया घटनाक्रम में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हूतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। इसका मकसद लाल सागर के आसपास यमनी सरकारी बलों के लिए बढ़त हासिल करना और हूतियों की हालिया सैन्य कामयाबी को पीछे धकेलना है। इसके जवाब में सऊदी अरब के हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और तेल से जुड़े बुनियादी ढांचे पर हमलों में तेजी आने की खबरें सामने आई हैं।
रियाद एयरपोर्ट पर ताजा हमले में क्या हुआ?
ये हालात तब और बिगड़ गए जब शनिवार को रियाद स्थित किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमला हुआ। इस हमले में 12 लोगों की मौत हुई,जबकि 300 से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद सऊदी अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों से हवाई अड्डे को बंद रखा और बंदी की अवधि कम से कम रविवार रात नौ बजे तक बढ़ा दी गई। एक क्षेत्रीय अधिकारी के अनुसार, हमला हवाई अड्डे के उस परिसर में हुआ, जहां घरेलू उड़ानों के लिए टर्मिनल 3 और 4 स्थित हैं। अधिकारी ने मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं होने के कारण अपनी पहचान उजागर नहीं की। सऊदी अरब की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, मृतकों में चार सऊदी नागरिकों के अलावा बांग्लादेश, फलस्तीन, अमेरिका, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया और सूडान के नागरिक शामिल थे। घायलों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज किया जा रहा था।
हूतियों की नई चेतावनी से सऊदी अरब में बढ़ी चिंता
रियाद एयरपोर्ट पर हमले के बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दूसरे हवाई अड्डों को भी निशाना बनाने की चेतावनी दी। संगठन के सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सरी ने एयरलाइंस,विमानन विशेषज्ञों,कर्मचारियों और यात्रियों को सऊदी अरब के हवाई अड्डों तथा हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने से बचने की चेतावनी दी।
उनका दावा था कि सऊदी अरब के हवाई अड्डे हमलों के खतरे में हैं और हूतियों के सैन्य अभियान का हिस्सा बन चुके हैं। हालांकि, उन्होंने मक्का और मदीना के हवाई अड्डों को इस चेतावनी से अलग रखा। हूती संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि पिछले पांच सप्ताह में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन की कार्रवाई में यमन के 91 लोगों की मौत हुई और 168 लोग घायल हुए। मंत्रालय के मुताबिक, मृतकों में 60 फीसदी महिलाएं और बच्चे हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं दी गई है।
क्या युद्ध में शामिल हो सकता है अमेरिका?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू अमेरिका की संभावित भूमिका है। सऊदी अरब अमेरिका का प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगी है। रियाद एयरपोर्ट पर हमले के बाद सऊदी अरब अपने सहयोगियों से सैन्य समर्थन की मांग और तेज कर सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले के बाद कहा कि उनका प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की कार्रवाई में अमेरिका को शामिल होना चाहिए या नहीं। उन्होंने कहा कि हालिया हमले की जानकारी मिलने के बाद इस पर फैसला किया जाएगा और अमेरिका तेजी से कदम उठाता है।ट्रंप ने यह भी कहा कि वह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत करने की योजना बना रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका सीधे संघर्ष में शामिल हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इस बारे में आगे पता चलेगा।
अगर अमेरिका जंग में उतरा तो...
यदि अमेरिका हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होता है, तो इसके कई बड़े परिणाम हो सकते हैं-
- पहला, यमन में चल रहा संघर्ष और व्यापक हो सकता है।
- दूसरा, ईरान समर्थित हूतियों की ओर से अमेरिकी हितों और क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है।
- तीसरा, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री परिवहन पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, अमेरिका के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। ईरान के साथ पहले से चल रहा संघर्ष अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में यमन में एक और मोर्चे पर सैन्य भागीदारी बढ़ाने से अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति और घरेलू राजनीति दोनों पर असर पड़ सकता है।
ईरान-अमेरिका संघर्ष से कैसे जुड़ गया यमन?
सऊदी अरब और हूतियों के बीच बढ़ती लड़ाई को केवल दो क्षेत्रीय पक्षों के बीच संघर्ष के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव भी एक अहम कारक है। हूतियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है। अब तक ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष में हूती अपेक्षाकृत सीमित भूमिका में थे। लेकिन सऊदी अरब पर हमलों के बढ़ने से वे ईरान के लिए दबाव बनाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।
वहीं, सऊदी अरब अमेरिका का अहम सहयोगी है। ऐसे में हूतियों के हमले रियाद को सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर अधिक सक्रिय होने के लिए मजबूर कर सकते हैं। इससे अमेरिका पर भी अपने सहयोगी की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी अरब के सामने मिसाइल रक्षा की चुनौती
सऊदी अरब के लिए एक और बड़ी चिंता मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने की क्षमता है। समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के मुताबिक, क्षेत्रीय अधिकारियों ने पहले बताया था कि सऊदी अरब के पास मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की उपलब्धता कम हो रही है। इसी वजह से सऊदी अरब ने फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से क्षेत्र में वायु रक्षा सहायता तैनात करने का अनुरोध किया था। एक अधिकारी ने यह भी कहा था कि ईरान के साथ युद्ध के दौरान अमेरिका के अपने मिसाइल इंटरसेप्टर भंडार पर भी दबाव पड़ा है।क्या सऊदी अरब पीछे हटेगा या हमले और तेज होंगे?
अंतरराष्ट्रीय संकट समूह के यमन मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक अहमद नागी के मुताबिक, हूतियों की दबाव बनाने की रणनीति उलटा असर भी डाल सकती है। उनका आकलन है कि सऊदी अरब के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले रियाद को पीछे हटने के बजाय सैन्य अभियान जारी रखने के लिए और दृढ़ बना सकते हैं।