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2030 तक दोगुनी हो सकती है डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की मांग, क्या AI बन रहा है पर्यावरण के लिए नया संकट?

साल 2030 तक एआई और उससे जुड़े डेटा सेंटर दुनिया की कुल बिजली खपत का लगभग 3 प्रतिशत उपयोग कर सकते हैं। इतना ही नहीं, इन डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए जरूरी पानी की मात्रा वैश्विक आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकता से भी अधिक हो सकती है।

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एआई से कैसे बढ़ रही बिजली और पानी की खपत। (फोटो- AI)
Edited by: Shiv Shukla
Updated Jun 7, 2026, 21:46 IST
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Times Now Navbharat Explainer: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence-AI) को चौथी औद्योगिक क्रांति का आधार माना जा रहा है। आज आर्टीफिशियस इंटेलिजेंस यानी एआई स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग, रक्षा, कृषि, मीडिया और प्रशासन जैसे लगभग हर क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर चुका है। दुनिया भर की सरकारें और कंपनियां AI को आर्थिक विकास का नया इंजन मान रही हैं। लेकिन इसी बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई रिपोर्ट ने एआई के बढ़ते पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है।

रिपोर्ट के अनुसार, साल 2030 तक एआई और उससे जुड़े डेटा सेंटर दुनिया की कुल बिजली खपत का लगभग 3 प्रतिशत उपयोग कर सकते हैं। इतना ही नहीं, इन डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए जरूरी पानी की मात्रा वैश्विक आबादी की वार्षिक पेयजल आवश्यकता से भी अधिक हो सकती है। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब दुनिया पहले से ही जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव का सामना कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एआई इतनी उर्जा क्यों खाता है?

आखिर एआई इतनी बिजली क्यों खाता है?

जब हम किसी भी AI टूल का उपयोग करते हैं तो हमें केवल स्क्रीन पर कुछ शब्द दिखाई देते हैं। लेकिन इसके पीछे हजारों शक्तिशाली कंप्यूटर लगातार काम कर रहे होते हैं। AI मॉडल को प्रशिक्षित (Training) करने के लिए अरबों-खरबों डेटा बिंदुओं का विश्लेषण करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में हजारों ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) और विशेष चिप्स लगातार हफ्तों या महीनों तक चलते रहते हैं। इसके बाद भी ऊर्जा की जरूरत खत्म नहीं होती। जब कोई व्यक्ति एआई से प्रश्न पूछता है,चित्र बनवाता है या वीडियो तैयार करता है,तब भी डेटा सेंटर में भारी कंप्यूटिंग शक्ति का उपयोग होता है। सरल शब्दों में कहें तो AI केवल एक सॉफ्टवेयर नहीं है,बल्कि विशाल डिजिटल अवसंरचना (Infrastructure) पर आधारित एक ऊर्जा-गहन तकनीक है।

क्या होते हैं डेटा सेंटर?

बता दें कि एआई की पूरी दुनिया डेटा सेंटरों पर टिकी हुई है। डेटा सेंटर ऐसे विशाल भवन होते हैं जिनमें लाखों सर्वर लगातार चलते रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार,बीते वर्ष दुनिया भर के डेटा केंद्रों ने लगभग उतनी बिजली की खपत की जितनी पूरे सऊदी अरब ने की। सऊदी अरब दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है। वहीं, जिस तरह से एआई की मांग बढ़ती जा रही है, उसी के अनुरूप दुनिया भर में नए डेटा सेंटर भी बनाए जा रहे हैं। अमेरिका, चीन, यूरोप और खाड़ी देशों, ऑस्ट्रेलिया में अरबों डॉलर के निवेश के साथ मेगा डेटा सेंटर विकसित किए जा रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2030 तक डेटा केंद्रों की बिजली मांग वर्तमान स्तर की तुलना में लगभग दोगुनी हो सकती है।

पानी की खपत क्यों है बड़ी चिंता?

पिछले कुछ वर्षों में एआई उद्योग की जल खपत वैश्विक बहस का विषय बन गई है। ज्यादातर लोग एआई का इस्तेमाल तो खूब कर रहे हैं, लेकिन उसका और पानी के लिंक को नहीं जानते। असल में ये एआई डेटा सेंटर्स के सर्वर अत्यधिक गर्मी पैदा करते हैं। ऐसे में उन्हें लगातार ठंडा न रखा जाए तो वे काम करना बंद कर सकते हैं। इसीलिए डेटा सेंटर्स में बड़े पैमाने पर कूलिंग प्रणालियां लगाई जाती हैं। इनमें भारी मात्रा में पानी का उपयोग होता है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक एआई से जुड़े डेटा केंद्रों को लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की आवश्यकता हो सकती है। यह मात्रा इतनी अधिक है कि इससे दुनिया की बड़ी आबादी की पेयजल जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। ऐसे में जल संकट से जूझ रहे देशों के लिए यह विशेष चिंता का विषय है। अगर भविष्य में डेटा केंद्र ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किए जाते हैं जहां पहले से पानी की कमी है, तो स्थानीय समुदायों और उद्योगों के बीच संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

भविष्य को लेकर तकनीकी कंपनियों का क्या दावा?

तकनीकी कंपनियां अक्सर दावा करती हैं कि आने वाले एआई मॉडल पहले की तुलना में अधिक ऊर्जा-कुशल (Energy Efficient)होते जा रहे हैं। मतलब ये कि वे कम बिजली में अधिक काम कर सकते हैं। हालांकि ये हकीकत नहीं है। इसमें "जेवॉन्स पैराडॉक्स" का भी जिक्र किया गया है।

क्या है जेवॉन्स पैराडॉक्स?

19वीं सदी के ब्रिटिश अर्थशास्त्री विलियम स्टेनली जेवॉन्स ने देखा था कि जब कोयले के उपयोग की तकनीक अधिक दक्ष हुई, तब कोयले की खपत घटने के बजाय बढ़ गई। इसका कारण यह था कि दक्षता बढ़ने से लागत कम हुई और लोग कोयले का उपयोग पहले से अधिक करने लगे।

इसी सिद्धांत को आज AI पर लागू किया जा रहा है। ऐसे में अगर भविष्य में AI मॉडल अधिक सस्ते,तेज और दक्ष होते हैं, तो उनका उपयोग भी कई गुना बढ़ सकता है। ऐसे में कुल ऊर्जा खपत कम होने के बजाय बढ़ सकती है।

कार्बन उत्सर्जन पर क्या होगा असर?

रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई की बढ़ती क्षमता और लोकप्रियता के साथ उसके पर्यावरणीय प्रभाव भी तेजी से बढ़ रहे हैं। एआई मॉडल के लिए जरूरी बिजली का अधिकांश हिस्सा अभी भी जीवाश्म ईंधनों से उत्पन्न ऊर्जा से आता है। ऐसे में डेटा केंद्रों की बिजली मांग 2030 तक अनुमानित स्तर तक पहुंचती है,तो इससे कार्बन उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। इस अतिरिक्त कार्बन प्रभाव की भरपाई करने के लिए लगभग 6.7 अरब पेड़ लगाने पड़ सकते हैं,जिन्हें 10 वर्षों तक जीवित रखना होगा। अध्ययन में कहा गया है कि डेटा केंद्रों को 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी तथा विशाल भू-क्षेत्र की जरूरत होगी, जिसका आकार मेक्सिको सिटी के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना अधिक हो सकता है।

जमीन और खनिजों पर बढ़ता दबाव

एआई उद्योग केवल बिजली और पानी ही नहीं,बल्कि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की भी भारी मांग करता है।रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य के डेटा केंद्रों के लिए जिस भूमि की आवश्यकता होगी उसका आकार मेक्सिको सिटी के क्षेत्रफल से लगभग 10 गुना बड़ा हो सकता है। इसके अलावा एआई चिप्स और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण के लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकल और दुर्लभ खनिजों की जरूरत होती है।

इन खनिजों का खनन अक्सर विकासशील देशों में होता है, जहां पर्यावरणीय नियम अपेक्षाकृत कमजोर हो सकते हैं। खनन से जंगलों का नुकसान, जल प्रदूषण और स्थानीय समुदायों के विस्थापन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

एआई के क्षेत्र में कितनी वैश्विक असमानता?

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि एआई की शक्ति और उसका नियंत्रण कुछ देशों तक सीमित होता जा रहा है। दुनिया के केवल 32 देशों में AI-विशिष्ट क्लाउड अवसंरचना उपलब्ध है। इनमें भी लगभग 90 प्रतिशत क्षमता अमेरिका और चीन में केंद्रित है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि एआई से होने वाले आर्थिक लाभ कुछ चुनिंदा देशों को मिल सकते हैं,जबकि उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव दूसरे देशों को झेलने पड़ सकते हैं।

ऐसे में भले ही एआई मानव इतिहास की सबसे परिवर्तनकारी तकनीकों में से एक बन सकता है,लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ा है क्या हम इस तकनीकी प्रगति की पर्यावरणीय कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं? संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट यही चेतावनी देती है कि एआई का भविष्य केवल नवाचार और मुनाफे से नहीं,बल्कि ऊर्जा, पानी, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग से भी तय होगा। यदि समय रहते उचित नियमन, पारदर्शिता और टिकाऊ नीतियां नहीं अपनाई गईं,तो एआई की क्रांति पर्यावरण पर ऐसा दबाव डाल सकती है जिसकी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।

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