Azerbaijan Hijab Ban Schools Secularism: अजरबैजान में स्कूल यूनिफॉर्म के बदले हुए नियमों के कारण विरोध शुरू हो गया है। खबरों के अनुसार, हिजाब पहनने वाली छात्राओं को क्लासरूम में घुसने से रोका गया और महिला शिक्षकों से उनके सिर के स्कार्फ (हेडस्कार्फ) हटाने के लिए कहा गया।
हालांकि सरकार ने हिजाब पर साफ तौर पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन इन बदलावों में ऐसे कपड़ों पर रोक लगाई गई है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के खिलाफ माना जाता है। इससे धार्मिक आजादी और बच्चों के शिक्षा के अधिकार को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं।
यह विवाद 21 सितंबर को अपनाए गए कैबिनेट ऑफ मिनिस्टर्स के प्रस्ताव नंबर 309 पर केंद्रित है। यह प्रस्ताव ऐसे अतिरिक्त कपड़ों पर रोक लगाता है जो स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों का उल्लंघन करते हैं और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के सिद्धांत के खिलाफ हैं।
सरकारी अजरबैजानी प्रेस एजेंसी (APA) ने कहा कि सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों के छात्रों की यूनिफॉर्म के विवरण में किए गए बदलावों का मकसद देश के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के अनुरूप एक कॉमन ड्रेस कोड लागू करना था।
नियमों के तहत, विज्ञान और शिक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली पेडागोगिकल काउंसिल की मंजूरी से, समारोहों के दौरान अजरबैजान के इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय परंपराओं को दर्शाने वाले कपड़े पहनने की इजाजत है। APA ने कहा कि इन नियमों का मकसद शिक्षकों के बीच पेशेवर मानक बनाए रखना और स्कूलों की सार्वजनिक प्रतिष्ठा की रक्षा करना था।
हालांकि, JAMnews ने रिपोर्ट दी है कि इन संशोधनों में ड्रेस कोड का उल्लंघन करने पर क्लास से सस्पेंड करने को अलग सजा के तौर पर साफ तौर पर शामिल नहीं किया गया है। 9 अक्टूबर को, बाकू शहर के शिक्षा विभाग ने छात्रों और शिक्षकों द्वारा कपड़ों के नियमों का पालन करने की जांच करने की घोषणा की।
इस फैसले पर इतना गुस्सा क्यों है?
अल जजीरा के अनुसार, अजरबैजान की लगभग 96 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। ज्यादातर अजरबैजानी मुस्लिम शिया हैं, हालांकि सुन्नी मुस्लिम भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं।
इसके बावजूद, अजरबैजान का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष बताता है और धार्मिक आजादी की गारंटी देता है। सरकार का कहना है कि स्कूलों को एक जैसे ड्रेस कोड के जरिए धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, जबकि विरोध करने वालों का तर्क है कि हेडस्कार्फ पहनना एक व्यक्तिगत और धार्मिक फैसला है और इससे बच्चों की शिक्षा में रुकावट नहीं आनी चाहिए।
शिक्षिका जहरा हसनोवा ने अल जजीरा से बात करते हुए कहा कि उन्हें बताया गया था कि अब वे स्कूल में हिजाब नहीं पहन सकतीं।
उन्होंने कहा, 'सच कहूं तो, मैं थोड़ी भावुक हूं। मुझे दुख पहुंचा है।' '[हिजाब] एक निजी पसंद है, और अगर मैं किसी दिन इसे उतारना चाहूं, तो यह भी मेरी ही पसंद होनी चाहिए।'
इस विवाद ने माता-पिता के अधिकारों पर भी सवाल खड़े किए हैं। JAMnews के अनुसार, 'नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते' (International Covenant on Civil and Political Rights) का अनुच्छेद 18 माता-पिता की इस आजादी को मान्यता देता है कि वे यह सुनिश्चित कर सकें कि उनके बच्चों को उनकी मान्यताओं के अनुसार धार्मिक और नैतिक शिक्षा मिले।
बच्चों के अधिकारों पर कन्वेंशन के आर्टिकल 5 और 14 में भी बच्चों की परवरिश और उनके विकास में माता-पिता की भूमिका को मान्यता दी गई है।
आलोचकों ने सवाल उठाया है कि हेडस्कार्फ पहनने से क्लासरूम में पढ़ाई में कैसे रुकावट आती है और क्यों छात्रों को सिर्फ अपने पहनावे की पसंद के कारण पढ़ाई से वंचित रहना चाहिए।

क्लास का बहिष्कार और ऑनलाइन कैंपेन शुरू हो गए
छात्र और शिक्षक कैसे विरोध कर रहे हैं?
इन पाबंदियों की वजह से प्रदर्शन, क्लास का बहिष्कार और ऑनलाइन कैंपेन शुरू हो गए हैं; बाकू और अजरबैजान के दूसरे हिस्सों में भी विरोध-प्रदर्शन की खबरें हैं।
ऑनलाइन वायरल हो रहे वीडियो में छात्र स्कूल से लौटाए जाने के बाद शिक्षकों को गले लगाकर रोते हुए दिखे। लोकल मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम दो स्कूलों के छात्रों ने क्लास का बहिष्कार किया।
JAMnews ने बाकू के स्कूल नंबर 322 में विरोध-प्रदर्शन की खबर दी, जहां छात्रों ने मांग की कि हिजाब पहनने वाली उनकी क्लासमेट्स को क्लास में शामिल होने दिया जाए। एक और वीडियो में बाकू के बालाखानी इलाके में स्कूल नंबर 69 के बाहर छात्र अपनी क्लासमेट्स के समर्थन में क्लास में जाने से इनकार करते दिखे।
विरोध के एक मैसेज में कहा गया, 'हिजाब किसी को भी शिक्षा पाने से नहीं रोकता है।' जलीलबाद जिले के स्कूल नंबर 9 में, लड़कियों को हेडस्कार्फ पहनने की वजह से बिल्डिंग में घुसने से रोकने की खबर है। बाकू के खोखमेली इलाके में, माता-पिता ने चेतावनी दी कि वे अपने बेटों को भी स्कूल भेजना बंद कर देंगे।
6 अक्टूबर को शिक्षकों के लिए अलग ड्रेस कोड की जरूरतों को मंजूरी मिलने के बाद, शिक्षकों ने Toplum TV को बताया कि सुमगयित के कुछ स्कूल हिजाब पहनने वाली शिक्षिकाओं से हेडस्कार्फ हटाने या इस्तीफा देने के लिए कह रहे थे।
गिरफ्तारियां क्यों की गई हैं?
JAMnews की रिपोर्ट के अनुसार, 12 अक्टूबर को अजरबैजान के गृह मंत्रालय ने स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों को लागू करने से जुड़ी घटनाओं के सिलसिले में 37 लोगों की गिरफ्तारी की घोषणा की।
मंत्रालय ने हिरासत में लिए गए लोगों पर बाकू में शिक्षा कर्मियों के साथ टकराव भड़काने, शिक्षण संस्थानों को नुकसान पहुंचाने और स्कूल के कामकाज व ट्रैफिक में बाधा डालने की कोशिश करने का आरोप लगाया। क्रिमिनल कोड की धारा 233 के तहत एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया; यह धारा सार्वजनिक व्यवस्था में खलल डालने वाली गतिविधियों को आयोजित करने या उनमें सक्रिय रूप से भाग लेने से संबंधित है।
हालांकि, मंत्रालय ने उन स्कूलों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जिन्हें कथित तौर पर नुकसान पहुंचाया गया था, और न ही हिरासत में लिए गए लोगों द्वारा की गई खास गतिविधियों का ब्योरा दिया। उनके नाम और उम्र भी नहीं बताई गई, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या किसी नाबालिग को हिरासत में लिया गया था और अधिकारी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और कथित आपराधिक गतिविधियों के बीच कैसे फर्क कर रहे थे।
मंत्रालय ने कहा कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए ये कदम जरूरी थे। हालांकि, इन गिरफ्तारियों ने परिवारों के बीच पाबंदियों के खिलाफ विरोध करने के जोखिमों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी नए नियमों के खिलाफ भूख हड़ताल की घोषणा की है। अल जजीरा के अनुसार, 2020 में देशद्रोह का दोषी ठहराए जाने के बाद वह 113 साल की सजा काट रहे हैं।
उनकी पत्नी गुलमिरा असलानोवा द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किए गए एक संदेश में उन्होंने लिखा, 'जेल में होने के बावजूद, मैं संघर्ष के अपने एकमात्र उपलब्ध साधन- भूख हड़ताल- का इस्तेमाल करके हमारे संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ आवाज उठा रहा हूं!'
विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट बंद होने की खबरें भी सामने आईं, लेकिन अल जज़ीरा ने कहा कि 'ओपन ऑब्जर्वेटरी ऑफ नेटवर्क इंटरफेरेंस' और 'नेटब्लॉक्स' जैसे निगरानी संगठनों ने इनकी पुष्टि नहीं की है।
क्या यह विवाद विदेशी प्रभाव की चिंताओं से जुड़ा है?
2 अक्टूबर को 'न्यू अजरबैजान पार्टी' के आठवें सम्मेलन में बोलते हुए, राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने देश को तथाकथित वैचारिक खतरों से बचाने में शिक्षा की भूमिका पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, 'इसलिए, हमें खुद को वैचारिक उकसावे से बचाना होगा। कैसे? सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, निश्चित रूप से, शिक्षा के माध्यम से।'
अलीयेव ने पड़ोसी देशों में चल रहे अजरबैजानी-भाषा के मीडिया आउटलेट्स की भी आलोचना की। हालांकि उन्होंने अपने भाषण के उस हिस्से में ईरान या हिजाब का स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं किया, लेकिन कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों ने उनकी बातों को ईरानी धार्मिक प्रभाव के खिलाफ चेतावनी के तौर पर देखा।
JAMnews द्वारा अधिकारियों के करीबी बताए गए राजनीतिक टिप्पणीकार आसिफ नरीमानली ने इस विवाद को ईरान द्वारा 'राजनीतिक और वैचारिक हस्तक्षेप' की कथित कोशिशों से जोड़ा। उन्होंने कोम (Qom) में एक धार्मिक सभा और इस्तांबुल में विरोध प्रदर्शनों का जिक्र किया। सरकार समर्थक मीडिया आउटलेट के लिए काम करने वाली पत्रकार आयगुन मुरादखानली ने भी तर्क दिया कि पाबंदियों का विरोध करने वाले धार्मिक समूहों के विदेशों में मौजूद केंद्रों से संबंध थे।
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अलीयेव ने पार्टी कांग्रेस में बाहरी आलोचना के खिलाफ इशारों-इशारों में चेतावनी दी और कहा कि दूसरों को 'हमारी जीवनशैली में दखल नहीं देना चाहिए'। उन्होंने तुर्की का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया।
तुर्की ने क्या प्रतिक्रिया दी है?
इन पाबंदियों का विरोध पड़ोसी देश तुर्की तक भी फैल गया है। 3 अक्टूबर को इस्तांबुल में अजरबैजान के वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शनकारी जमा हुए। उन्होंने इन उपायों को हटाने और तुर्की के अधिकारियों से दखल देने की मांग की।
इन विरोध प्रदर्शनों ने 1997 में तुर्की में हुए तथाकथित 'पोस्ट-मॉडर्न तख्तापलट' की यादें ताजा कर दी हैं। उस समय हेडस्कार्फ पहनने वाली महिलाओं को विश्वविद्यालयों में जाने से रोक दिया गया था और सिविल सेवा में काम करने वाली कुछ महिलाओं को नौकरी से निकाल दिया गया था या इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था।
7 अक्टूबर को, तुर्की की सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी के प्रवक्ता ओमर सेलिक ने कहा कि अजरबैजान का विरोध करने वाले समूहों का न तो पार्टी से और न ही तुर्की सरकार से कोई संबंध है।
अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का जिक्र किया था। हालांकि, अंकारा ने विरोध प्रदर्शनों पर अलीयेव की आलोचना का आधिकारिक तौर पर कोई जवाब नहीं दिया है।
अजरबैजान के भीतर भी लोगों की राय बंटी हुई है। प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष रशाद माजिद ने देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने के लिए इन पाबंदियों का बचाव किया है और प्रदर्शनों के पीछे विदेशी प्रभाव की ओर इशारा किया है। वहीं, कुछ लोग बच्चों के हिजाब पहनने का विरोध तो करते हैं, लेकिन उनका मानना है कि सिर्फ कपड़ों की वजह से छात्रों को स्कूल से बाहर नहीं निकाला जाना चाहिए।
