Mysore Dussehra 2023: मैसूर दशहरा (Mysore Dussehra) नवरात्रि (Navratri) के दौरान मनाए जाने वाले सबसे शुभ और प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। दस दिनों तक मनाया जाने वाला ये त्योहार नवरात्रि के पहले दिन से शुरू होता है और विजयादशमी के दिन समाप्त होता है। लोग इस त्योहार को बहुत ही भव्यता और उत्साह के साथ मनाते हैं। मैसूर शहर में दशहरा उत्सव (Mysore Dussehra 2023) मनाने की एक लंबी परंपरा है। मैसूर दशहरा को लंबे समय से कर्नाटक का राज्य त्योहार घोषित किया गया है। मैसूर दशहरा में ना तो राम (Rama) होते हैं और ना ही रावण (Ravana) का पुतला जलाया जाता है।
Mysore Dussehra 2023: मैसूर में रावण नहीं इस राक्षस के मारे जाने पर मनता है दशहरा।
दशहर के दौरान मैसूर पैलेस हजारों रोशनी से जगमगाता रहता है, जो देखने लायक होता है। मैसूर दशहरा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है और इसमें भारी भीड़ उमड़ती है। सड़कों पर रोशनी और पेड़ों को सजाकर खूबसूरती से सजाया जाता है। इस साल मैसूर दशहरा 15 अक्टूबर से शुरू हुआ है और ये 24 अक्टूबर को खत्म होगा। देश ही नहीं विदेशों से भी लोग इस त्योहार को देखने के लिए आते हैं। मैसूर पैलेस सभी 10 दिनों में 100,000 प्रकाश बल्बों के कारण शानदार दिखता है।
कई सदियों पुराना है मैसूर दशहरा का इतिहास
मैसूर दशहरा का इतिहास कई सदियों पुराना है। मैसूर में दशहरा पारंपरिक रूप से 10 दिन वाला त्योहार है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है। मैसूर दशहरा उत्सव 10वें दिन विजयादशमी के साथ समाप्त होता है, जिस दिन हिंदू देवी चामुंडेश्वरी भैंस के सिर वाले राक्षस राजा महिषासुर का वध करती हैं। किंवदंती है कि मैसूर पर एक बार राक्षस राजा महिषासुर का शासन था, जिसे देवी दुर्गा ने मार डाला था। देवी दुर्गा ने देवी-देवताओं की प्रार्थनाओं के जवाब में चामुंडेश्वरी के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने उस स्थान पर राक्षस को मार डाला, जो बाद में शहर के पास चामुंडी पहाड़ियों के नाम से जाना जाने लगा। कहा जाता है कि राक्षस का वध करने के बाद देवी पहाड़ी की चोटी पर रुकी थीं। इस जीत के सम्मान में हर साल मैसूर दशहरा उत्सव मनाया जाता है।इतिहासकारों के अनुसार दशहरा उत्सव मनाने की भव्य परंपरा 15वीं शताब्दी में विजयनगर के राजाओं के साथ शुरू हुई, जिसे मैसूर के तत्कालीन शाही परिवार वोडेयार ने आज तक जारी रखा है। मैसूर में विजयादशमी के दिन एक भव्य परेड आयोजित की जाती है, जो इस भव्य त्योहार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। मैसूर दशहरा के दौरान कुल तीन भव्य जुलूस निकलते हैं। महानवमी के दिन लोग पहला जुलूस मनाते हैं। इस दिन लोग शाही तलवार की पूजा करते हैं और यह जुलूस घोड़ों, ऊंटों, हाथियों, नर्तकियों और अन्य लोगों के साथ निकाला जाता है। इस उत्सव से जुड़े सभी लोग इस जुलूस में भाग लेते हैं और इसका आनंद लेते हैं।
बाकी दो जुलूस दशहरा के दिन निकाले जाते हैं, पहला पारंपरिक जुलूस है जिसे जंबू सावरी के नाम से जाना जाता है। इस भव्य जुलूस को बड़ी संख्या में लोग देखते हैं और सशस्त्र बल भी इसमें हिस्सा लेते हैं। देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को हाथी पर सुनहरे आसन पर रखा गया है, जो त्योहार का मुख्य आकर्षण है। इस परेड को पूरा करने के बाद आखिरी परेड टॉर्चलाइट परेड के नाम से प्रसिद्ध है, जो विजयादशमी के दिन शाम को आयोजित की जाती है। इस जुलूस को पंजिना काविथा के नाम से भी जाना जाता है और यह भव्य उत्सव के साथ इस त्योहार के अंत का प्रतीक है।
