सोशल मीडिया का इस्तेमाल आज बच्चों और किशोरों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म जहां मनोरंजन और कनेक्टिविटी का जरिया हैं, वहीं इनके ज्यादा इस्तेमाल को लेकर बच्चों की मानसिक सेहत पर सवाल भी लगातार उठ रहे हैं। इसी बीच Meta ने अमेरिका में बच्चों और किशोरों की सुरक्षा को लेकर कई बड़े बदलाव करने पर सहमति जताई है।
कंपनी पर बच्चों के लिए अत्यधिक आकर्षक और लत लगाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तैयार करने तथा बच्चों की प्राइवेसी से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने के आरोप लगे थे। इन मामलों के निपटारे के तहत Meta को भारी जुर्माने का सामना करना पड़ा है और प्लेटफॉर्म के डिजाइन में भी बदलाव करने होंगे।
किशोरों के लिए रोजाना करीब 2 घंटे की सीमा
Meta के नए नियमों में सबसे अहम बदलाव किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल की समय सीमा से जुड़ा है। इसके तहत 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के लिए डिफॉल्ट तौर पर रोजाना करीब दो घंटे की सीमा तय की जा सकती है। इसके अलावा रात के समय सोशल मीडिया इस्तेमाल पर भी रोक लगाने की योजना है। लगभग आधी रात से सुबह 6 बजे तक किशोरों की पहुंच सीमित की जा सकती है।
इसका उद्देश्य सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करना नहीं, बल्कि बच्चों की नींद को बेहतर करना भी है। रात में सोशल मीडिया देखने या लगातार आने वाले नोटिफिकेशन के कारण बच्चों की नींद प्रभावित हो सकती है। Johns Hopkins Bloomberg School of Public Health के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जोहान्स थ्रुल के मुताबिक, रात में इस्तेमाल पर रोक मानसिक स्वास्थ्य के लिए खास तौर पर फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि इससे बच्चों को पर्याप्त नींद मिल सकती है।
स्कूल के समय भी कम होगा सोशल मीडिया का दखल
नए बदलावों के तहत स्कूल के समय नोटिफिकेशन और कुछ दूसरे फीचर्स को सीमित करने की भी योजना है। इसका मकसद पढ़ाई के दौरान सोशल मीडिया से होने वाली परेशानी और ध्यान भटकने को कम करना है। इसके साथ ही Meta माता-पिता के लिए ज्यादा मजबूत कंट्रोल उपलब्ध कराने की तैयारी में है। माता-पिता को बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़ी ज्यादा जानकारी मिल सकती है और वे कुछ सेटिंग्स पर अधिक नियंत्रण रख सकेंगे। कंपनी 13 साल से कम उम्र के बच्चों को अनुचित अकाउंट्स तक पहुंचने से रोकने के लिए उम्र की पुष्टि यानी Age Verification को भी मजबूत करने की योजना बना रही है।
लाइक और दूसरे Engagement Features में बदलाव
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूजर्स को ज्यादा समय तक बनाए रखने के लिए कई तरह के Engagement Features इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें लाइक काउंट, लगातार सुझाया जाने वाला कंटेंट, Endless Scrolling और नोटिफिकेशन प्रमुख हैं।
Meta किशोरों के लिए ऐसे कुछ फीचर्स को सीमित करने की योजना बना रहा है। उदाहरण के तौर पर लाइक काउंट छिपाने और कुछ Cosmetic Features को सीमित करने जैसे बदलाव किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों के बीच दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति कम हो सकती है।
सोशल मीडिया सुरक्षा और किशोर
डॉ. थ्रुल के मुताबिक, Appearance-Based Social Comparison, दिखाई देने वाले Like Counts और रात में आने वाले Notifications ऐसे फीचर्स हैं जिनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने के स्पष्ट रास्ते दिखाई देते हैं।
क्या कम सोशल मीडिया इस्तेमाल से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है?
इस सवाल का जवाब पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। कुछ प्रयोगात्मक अध्ययनों में पाया गया है कि सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के इस्तेमाल को कम करने से बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है। 2025 में 220 युवाओं पर किए गए एक Randomised Controlled Trial में भावनात्मक परेशानी से जूझ रहे युवाओं ने जब स्मार्टफोन आधारित सोशल मीडिया का इस्तेमाल करीब एक घंटे प्रतिदिन तक सीमित किया, तो तीन सप्ताह बाद उनमें Depression, Anxiety और Fear of Missing Out में ज्यादा कमी देखी गई। साथ ही उनकी नींद में भी सुधार हुआ।
2026 के एक अन्य Randomised Controlled Trial में सोशल मीडिया इस्तेमाल को रोजाना करीब 78 मिनट कम करने वाले युवाओं में अकेलेपन यानी Loneliness में महत्वपूर्ण कमी देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि सिर्फ सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रहना जरूरी नहीं, बल्कि इस्तेमाल की मात्रा और तरीका भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
ज्यादा इस्तेमाल और मानसिक परेशानी का क्या संबंध है?
विशेषज्ञों के अनुसार समस्या केवल सोशल मीडिया इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि उसके अत्यधिक या अनियंत्रित इस्तेमाल में भी है। ज्यादा इस्तेमाल का संबंध अकेलेपन, चिंता और Depression जैसी समस्याओं से पाया गया है। डॉ. थ्रुल के एक अध्ययन में 2,990 हाई-स्कूल छात्रों को शामिल किया गया था। इसमें अत्यधिक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वाले छात्रों ने अपने साथियों की तुलना में ज्यादा Loneliness और Mental Distress की जानकारी दी। इनमें इस्तेमाल पर नियंत्रण न रहना, नकारात्मक परिणामों के बावजूद सोशल मीडिया का इस्तेमाल जारी रखना, रोजमर्रा की जिंदगी में दखल और नींद पर खराब असर जैसी समस्याएं सामने आईं।
इसके अलावा 2025 की 34 अध्ययनों वाली एक Systematic Review में बच्चों और किशोरों के पढ़ाई से इतर सोशल मीडिया और स्मार्टफोन इस्तेमाल का संबंध कम Academic Achievement से पाया गया। यानी बार-बार फोन चेक करना या स्क्रॉल करते रहना पढ़ाई और एकाग्रता को प्रभावित कर सकता है।
क्या Social Media Companies की भी जिम्मेदारी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ बच्चों या उनके माता-पिता पर नहीं डाली जा सकती। प्लेटफॉर्म किस तरह डिजाइन किए जाते हैं, इसका भी व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
American Psychological Association (APA) ने भी किशोरों के लिए प्लेटफॉर्म डिजाइन करते समय Like Features, Recommended Content, बिना सीमा वाला इस्तेमाल और Endless Scrolling जैसे फीचर्स पर सावधानी बरतने की बात कही है। वहीं 2024 में प्रकाशित 143 अध्ययनों और 10 लाख से ज्यादा किशोरों के Meta-Analysis में ज्यादा सोशल मीडिया Engagement का संबंध Anxiety और Depression के उच्च स्तर से पाया गया।
क्या Meta के नए नियम पर्याप्त हैं?
डॉ. थ्रुल के मुताबिक Meta का कदम सही दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार रात में इस्तेमाल पर रोक, रोजाना समय सीमा और उम्र की पुष्टि जैसे नियम पहले की तुलना में ज्यादा ठोस हैं। हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि ये नियम वास्तव में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य में कितना सुधार लाते हैं।
एक बड़ी चुनौती यह भी है कि सोशल मीडिया की दुनिया केवल Meta तक सीमित नहीं है। TikTok, Snapchat, YouTube और दूसरे प्लेटफॉर्म पर भी इसी तरह के Engagement Features मौजूद हैं। अगर अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर समान सुरक्षा मानक लागू नहीं होते हैं, तो बच्चों की सुरक्षा का लक्ष्य अधूरा रह सकता है।
इसके अलावा कुछ आलोचकों का कहना है कि केवल स्क्रीन टाइम सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। Recommendation Algorithms अभी भी ऐसा कंटेंट दिखा सकते हैं जो यूजर्स को लगातार स्क्रॉल करने के लिए प्रेरित करता है। इसलिए भविष्य में सिर्फ समय सीमा नहीं, बल्कि एल्गोरिदम और प्लेटफॉर्म डिजाइन की स्वतंत्र जांच भी जरूरी हो सकती है।
शुरुआत अच्छी, लेकिन निगरानी जरूरी
Meta के नए नियम बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव हैं। खासकर रात में इस्तेमाल रोकना, स्क्रीन टाइम सीमित करना, लाइक काउंट जैसे Social Comparison Features को कम करना और माता-पिता को ज्यादा नियंत्रण देना सकारात्मक कदम हो सकते हैं।
लेकिन इन नियमों की असली सफलता इस बात से तय होगी कि इन्हें कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है और क्या स्वतंत्र वैज्ञानिक शोध यह साबित करता है कि बच्चों की Anxiety, Depression, Loneliness और Sleep Problems में वास्तव में कमी आई है। इसलिए Meta का फैसला एक शुरुआत जरूर है, लेकिन बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए लगातार निगरानी, वैज्ञानिक मूल्यांकन और सभी बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर समान नियम जरूरी होंगे।
