अस्पताल के बेड से ग्लासगो में तिरंगा लहराने तक, अग्निपथ से कम नहीं था जैस्मिन के गोल्ड मेडल जीतने का सफर

भारत की जैस्मिल लंबोरिया की कहानी बताती है कि खेल में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। आज से एक महीने पहले वह बीमार थीं और अब जाकर ग्लासगो में उन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर पूरी दुनिया में भारत देश का मान बढ़ाया है।

खेल की एक खासियत होती है कि वह खिलाड़ी वापसी करने के लिए प्रेरित करती है। कभी हार ना मानने का जुनून अपने आप खिलाड़ियों में आ जाता है। चाहे वो कोई भी खेल हो खिलाड़ी अंतिम क्षण तक बाजी पलटने की उम्मीद में लगा रहता है। ग्लासगो 2026 में जब 57 किलोग्राम भारवर्ग में भिवानी की रहने वाली जैस्मिन लंबोरिया ने गोल्ड मेडल जीता तो पूरा देश उनके इस उपलब्धि पर झूम उठा। यह राष्ट्रमंडल खेलों में उनका लगातार दूसरा मेडल था। 4 चाल पहले उन्होंने बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीता था और अब गोल्ड जीतकर लंबी छलांग लगाई है।

Jasmine lamboria

जैस्मिन लंबोरिया (साभार-AI Image)

रिंग में उतरने से पहले का संघर्ष

एक बार जब जैस्मिन रिंग में उतरी तो उन्होंने हर मुकाबले में डॉमिनेट किया और पहले बाउट से ही मेडल की मजबूत दावेदार के रूप उभरी। लेकिन इसके पीछे बीते कुछ महीनों का कठिन संघर्ष छिपा था। उनकी मुश्किलें मार्च में एशियाई चैंपियनशिप के दौरान शुरू हुईं, जब तेज बुखार के बावजूद उन्होंने प्रतियोगिता से हटने से इनकार कर दिया। लगातार तीन कठिन मुकाबले जीतकर वह फाइनल में पहुंचीं, जहां रजत पदक जीतने के साथ राष्ट्रमंडल खेलों के लिए सीधे क्वालीफाई किया।

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