जगन्नाथ मंदिर में भगवान लकड़ी की मूर्ति में ही क्यों विराजते हैं, जानिए सदियों पुरानी इस परंपरा का महत्व

Jagannath Yatra 2026: पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भगवान की मूर्ति पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि लकड़ी की क्यों होती है? जानिए इस अनोखी परंपरा के पीछे छिपे आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

Lord Jagannath Yatra 2026: पुरी के जगन्नाथ मंदिर की सबसे अनोखी बात सिर्फ इसकी प्रसिद्ध रथ यात्रा नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां भी हैं। देश के अधिकांश मंदिरों में भगवान की प्रतिमाएं पत्थर, संगमरमर या धातु से बनी होती हैं, लेकिन पुरी में यह परंपरा बिल्कुल अलग है। ऐसे में हर श्रद्धालु के मन में सवाल उठता है कि आखिर भगवान लकड़ी की मूर्ति में ही क्यों विराजते हैं? क्या इसके पीछे केवल धार्मिक मान्यता है या कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है? दरअसल, इसका संबंध दारु ब्रह्म, नवकलेवर और सदियों पुरानी मंदिर परंपराओं से जुड़ा है, जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और ओडिशा की पारंपरिक परंपराओं में मिलता है।

Lord Jagannath Yatra 2026

लड़की की मूर्ति में क्यों विराजते हैं भगवान जगन्नाथ

दारु ब्रह्म की मान्यता बताती है लकड़ी का महत्व

सनातन परंपरा में भगवान जगन्नाथ को 'दारु ब्रह्म' कहा जाता है। संस्कृत में 'दारु' का अर्थ लकड़ी और 'ब्रह्म' का अर्थ परम चेतना है। स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण और ओडिशा के पारंपरिक इतिहास ग्रंथ 'मादला पांजी' में भगवान के इस स्वरूप का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि भगवान ने स्वयं दारु स्वरूप में विराजने की इच्छा व्यक्त की थी। इसलिए यहां प्रतिमाएं पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि पवित्र नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं। यही परंपरा जगन्नाथ संस्कृति को देश के अन्य मंदिरों से अलग पहचान देती है।

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