Vakratunda Sankashti Chaturthi Vrat Katha (वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी की कथा): माता पार्वतीजी बोलीं-हे पुत्र! कार्तिक मास में गणेश चौथ को किस गणेश का पूजन करना चाहिए। गणेश जी बोले- गिरजा नंदिनी! कार्तिक में विकट नाम गणेश का पूजन करना चाहिए, चंद्रोदय के समय आध्य भोजन करना चाहिए।
वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (pic credit: canva)
पूर्व समय में अगस्त्य मुनि नामक एक ऋषि थे, वे समुद्र के किनारे कठोर तप कर रहे थे, वहां से कुछ देरी पर एक मादा पक्षी अपने अंडों को सेय रही थी, उसी समय समुद्र का चढ़ाव आया और अंडो को बहा ले गया। पक्षी बहुत दुखी हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि मैं समुद्र जल को समाप्त कर दूंगा और अपनी चोंच से समुद्र जल को फेंकने लगा। इस प्रकार करते-करते काफी समय व्यतीत हो गया पर समुद्र का जल नही घटा तो वह दुखी हो अगस्त्य मुनि की शरण में गया और उनसे समुद्र को सुखाने की प्रार्थना की, तब अगस्त्य मुनि को चिंता हुई कि मैं समुद्र को किस प्रकार पी सकूंगा।
तब महामुनि ने गणेशजी का स्मरण किया और संकटा चतुर्थी के व्रत को किया। तीन मास के व्रत करने से गणेशजी प्रसन्न हुए श्री गणेशजी के व्रत की कृपा से अगस्त्य मुनि सुखपूर्वक समुद्र को पी गए। इसी व्रत के प्रभाव से अर्जुन ने निर्गत, कवचादि शत्रुओं पर विजय प्राप्त की। श्री गणेश के ऐसे वचन सुनकर पार्वतीजी प्रसन्न हुई और विचार करने लगीं कि मेरा पुत्र जगत में पूज्यनीय तथा सर्व सिद्धि का दाता हैं। इस कथा का महत्व बताते हुए श्री कृष्णजी बोले- हे राजन ! तुम कार्तिक मास की चतुर्थी तिथि के व्रत को करो। श्री कृष्ण के ऐसे वचन सुनकर धक्रराज ने भक्तिपूर्वक व्रत किया और अपने राज्य को प्राप्त किया, इस कथा के सुनने से हजार अश्वमेध व सौ यज्ञों का फल मिलता है और पुत्र-पौत्रादि की वृद्धि होती है।
