Lord Jagannath Appearance : पुरी के भगवान जगन्नाथ का स्वरूप पहली नजर में ही सबसे अलग लगता है। बड़ी-बड़ी गोल आंखें, अधूरे हाथ-पैर और लकड़ी से बनी प्रतिमा- इन्हें देखकर लगभग हर किसी के मन में यही सवाल आता है कि आखिर भगवान का ऐसा रूप क्यों बनाया गया!
श्री जगन्नाथ जी की बड़ी आंखों का क्या रहस्य है
यहीं से भगवान जगन्नाथ का वह रहस्य शुरू होता है, जो उन्हें दुनिया के दूसरे मंदिरों की मूर्तियों से बिल्कुल अलग बना देता है। गहराई से देखें तो उनका स्वरूप सिर्फ देखने के लिए नहीं है, बल्कि समझने के लिए भी है। उनकी आंखों से लेकर लकड़ी की प्रतिमा तक, हर चीज के पीछे एक मान्यता है, एक संदेश है और सदियों से चली आ रही परंपरा है।
जगन्नाथ जी की बड़ी-बड़ी आंखें क्यों हैं
भगवान जगन्नाथ की आंखें सिर्फ बड़ी नहीं हैं, उनका अपना एक अर्थ भी है। मान्यता है कि भगवान पूरी सृष्टि को एक जैसी नजर से देखते हैं। उनके लिए कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं। कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं। जो भी उनके दर पर आता है, वह सिर्फ भक्त होता है।
इसीलिए उनकी आंखों को इतना विशाल बनाया गया है। कहा जाता है कि ये आंखें कभी झपकती भी नहीं हैं। इसका भाव यह है कि भगवान की कृपा कभी रुकती नहीं। वे हर पल अपने भक्तों पर नजर बनाए रखते हैं। चाहे कोई मंदिर में हो, घर में हो या दुनिया के किसी भी कोने में।
जगन्नाथ जी की मूर्ति में हाथ-पैर क्यों नहीं बने हैं
पहली बार भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने वाले लगभग हर व्यक्ति के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर उनके हाथ और पैर पूरे क्यों नहीं हैं। इसका जवाब किसी कमी में नहीं, बल्कि भगवान की पूर्णता में छिपा है।
भक्त मानते हैं कि भगवान को किसी तक पहुंचने के लिए हाथों की जरूरत नहीं होती। उन्हें किसी के साथ चलने के लिए पैरों की भी जरूरत नहीं पड़ती। उनका प्रेम ही उनके हाथ हैं और उनकी कृपा ही उनके चरण।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: जगन्नाथ मंदिर में 22 सीढ़ियां क्यों हैं
यही वजह है कि भगवान जगन्नाथ का अधूरा दिखने वाला स्वरूप भी करोड़ों लोगों के लिए पूर्ण माना जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि ईश्वर को शरीर से नहीं, भावना से समझा जाता है।
जगन्नाथ जी की प्रतिमा लकड़ी से ही क्यों बनती है
देश के ज्यादातर मंदिरों में भगवान की मूर्तियां पत्थर या धातु की होती हैं। लेकिन पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं हमेशा पवित्र नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं।
इस नीम को साधारण पेड़ नहीं माना जाता। वहां की भाषा में इसे 'दारु ब्रह्म' कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार विशेष लक्षणों वाले नीम के वृक्ष की खोज की जाती है। उसके बाद वैदिक विधि से नई प्रतिमाओं का निर्माण होता है।
यही कारण है कि कुछ वर्षों के अंतराल पर नवकलेवर की परंपरा निभाई जाती है। इसमें भगवान नए कलेवर यानी नए शरीर को धारण करते हैं। पुरानी प्रतिमाओं को पूरे सम्मान के साथ विश्राम दिया जाता है और नई प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। बेशक दुनिया में यह अपनी तरह की सबसे अनोखी धार्मिक परंपराओं में से एक है।
टाइम्स नाउ नवभारत पर ये भी पढ़ें: क्या है अनवसर काल, इस दौरान क्यों दर्शन नहीं देते भगवान जगन्नाथ
भगवान जगन्नाथ के रूप का रहस्य क्या बताता है
भगवान जगन्नाथ का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि ईश्वर को सुंदर बनाने के लिए किसी परिपूर्ण शरीर की जरूरत नहीं होती। उनकी बड़ी आंखें बराबरी का संदेश देती हैं। उनकी प्रतिमा के अधूरे हाथ-पैर बताते हैं कि भगवान किसी सीमा में बंधे नहीं हैं। और लकड़ी की प्रतिमा यह याद दिलाती है कि इस संसार में परिवर्तन ही जीवन का नियम है।
शायद यही कारण है कि पुरी पहुंचने वाला हर श्रद्धालु सिर्फ भगवान के दर्शन करके नहीं लौटता। वह अपने साथ एक सवाल का जवाब भी लेकर लौटता है- ईश्वर आखिर दिखते कैसे हैं। और शायद भगवान जगन्नाथ का स्वरूप यही कहता है कि ईश्वर रूप में नहीं, भाव में बसते हैं।
