Krishan Janmashtami Vrat Katha In Hindi 2025 (श्री कृष्ण जन्म कथा): हर साल भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस खास मौके पर कान्हा जी की भक्ति की जाती है। भजन-किर्तन किए जाते हैं। श्री कृष्ण चालीसा का पाठ किया जाता है और साथ ही कृष्ण जन्म की कहानी भी पढ़ी जाती है। कृष्ण जन्म की कथा के बिना जन्माष्टमी का त्योहार अधूरा है। इस कथा में लड्डू गोपाल के जन्म से लेकर कंस वध तक का वर्णन है। यहां से आप श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा पढ़ सकते हैं।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा (Krishna Janmashtami Vrat Katha)
इंद्र ने कहा हे मुनि श्रेष्ठ व्रतों में जो श्रेष्ठ व्रत हो वह उत्तम व्रत आप मुझसे कहिये-नारद जी ने कहा-द्वापर येग में नीच कर्मों को करन वाला महापापी कंस नाम का दैत्य हुआ। उस कंस की परम सुंदरी बहन देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ । वासुदेव तथा देवकी की आठवीं संतान तुम्हारा वध करेगी, ऐसी आकाशवाणी सुनकर अत्यन्त क्रोधित होकर कंस ने दोनों को कारागार में डाल दिया। कंस जब देवकी को मारने लगा तो वासुदेव ने कंस को वचन दिया कि वह अपनी हर संतान उसे सौंप देंगे। तब कंस ने द्वारपालों को दोनो का ध्यान रखने को कहा और चला गया। एक-एक कर कंस ने देवकी के छः पुत्रों की हत्या कर दी। भगवान विष्णु के कहने पर योग माया ने देवकी के सातवें गर्भ को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया ।
कंस ने समझा कि उसके डर से देवकी का सातवां गर्भ नष्ट हो गया। वह देवकी की आंठवी संतान की प्रतीक्षा करने लगा । श्री कृष्ण जी के जन्म के समय सिंह राशि के सूर्य में, आकाश मंडल में जलधारी मेघों ने अपना जमाव डाला । भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में वृष राशि ने चन्द्रमा में रोहिणी नक्षत्र में बुधवार में सौभाग्य योग से चुका चन्द्रमा के आधी रात्रि में, आधी रात्रि के उत्तर में जब एक घड़ी हो जाये तो श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल की प्राप्ति होती है। हे इन्द्र ऐसे विजय नामक शुभमुहूर्त में श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ । श्री कृष्ण जी के जन्म के समय पर मूसलाधार बारिश हुई। और पहरा दे रहे द्वारपाल सो गये। देवकी ने वासुदेव जी से कहा- हे स्वामी शीघ्र मेरे इस पुत्र को अपने मित्र गोप नंदलाल जी के यहां छोड़ आइये । वासुदेव जब कारागार से निकलकर यमुना के तट पर पहुंचे तो वहां पर डफली नदी को देखकर बड़े चिंतित हुए। वह उफनती नदी में भगवान का नाम लेकर उतर गये। यमुना नदी साक्षात् नारायण के चरण स्पर्श करने को व्याकुल हो उठीं। जैसे ही उन्होंने उनके चरण स्पर्श किये तो वसुदेव जी को उन्होंने मार्ग दे दिया। श्री कृष्ण को बरसात से बचाने के लिए शेषनाग जी अदृश्य रूप में आये और अपने फन फैलाकर बरसात से उनकी रक्षा की। यमुना नदी को पार कर वासुदेव जी गोप नंदलाल जी के घर बालक को छोड़ आये। और उनके घर से नवजात कन्या को ले आये। और लाकर कंस को सौंप दी। देवकी ने रोते हुए कहा- भईया यह तो कन्या है इसे छोड़ दो। पर उस दुराचारी ने उस मासूम कन्या को चट्टान पर दे मारा । भयानक आवाज के साथ वह योगमाया रुपी कन्या आकाश में उड़ गई और कंस को कहा कि तेरा काल अभी जीवित है। जो तेरा वध उचित समय आने पर करेगा। मेरा नाम वैष्णवी है और यह सारा जगत भगवान विष्णु की माया है। उन्हीं के हाथों तेरा मरण होगा । ऐसा कहकर वह स्वर्ग को चली गई।
कंस ने भयवश पूतना राक्षसी को बुलाया और उसे श्री कृष्ण का वध करने भेजा। उस राक्षसी ने अनेको बालकों को अपना विषयुक्त स्तनपान करवाकर मार डाला । तत्पश्चात् वह श्री कृष्ण के पास पहुंची । जब उसने उन्हें अपने स्तनपान करवाये तो उन्होनें स्तनपान करते हुए उसके प्राण खींच लिए। पूतना के वध के पश्चात् कंस ने एक ब्राह्मण को भेजा। ब्राह्मण पालने में खेलते हुए दोनों बालकों के पास पहुंचा। और उनको मारने का प्रयास किया । इससे श्री कृष्ण ने उसे अपाहिज बना दिया । और उसका मुंह दही वाले बर्तन में कर दिया । तन्तर यशोदा ने आकर उस ब्राह्मण के मुंह में दही को लगे देखा और गुस्से में कहा कि आपने यह क्या कर दिया दही का पान कर लिया। अब तुम्हें दही नहीं दूंगी। उस ब्राह्मण ने कंस के पास आकर सब कह सुनाया। तब कंस ने केशी नामक दैत्य को भेजा । केशी नामक दैत्य ने घोड़े का रूप बनाया और गोकुल में श्री कृष्ण को अपने ऊपर चढ़ाने मात्र से ही अपने प्राण गंवा बैठा । फिर महा असुर कंस ने 'अरिष्ट नामक दैत्य को भेजा। वह एक बैल के रूप में श्री कृष्ण के समीप पहुंचा। श्री कृष्ण ने उस बैल से युद्ध करते हुए मार डाला। फिर दानव कंस ने 'कालाख्य' नामक दैत्य को कौवे (कागले) के रूप में भेजा। वह श्री कृष्ण के समीप आया । श्री कृष्ण ने उसके गले को दबोच कर उसे मार डाला और उसके पंखों को उखाड़ फेंका । कंस ने नन्द को बुलाकर कहा कि मुझे पारिजात के पुष्प लाकर दो नहीं तो मार डालूंगा। नन्द उसे एवं अस्तु कहकर घर आकर अपनी सारी बात अपनी पत्नी को कह सुनाई। श्री कृष्ण ने उनकी सारी बात सुनकर बालकों के साथ खेलते हुए अपनी 'गेंद' यमुना नदी में फेंक दी। जब बालकों ने 'गेंद' को यमुना नदी में जाते देखा तो उन्होने श्री कृष्ण से 'गेंद' लाने को कहा- श्री कृष्ण ने कहा कि मेरे पास 'गेंद' नहीं है मैं तुम्हें यही 'गेंद' ला देता हूं। तब सब बालकों के मना करने पर भी वह यमुना नदी में कूद गये। और बीच में कालिया नाग के समीप पहुंच गये। श्री कृष्ण से उसकी पत्नी ने कहा- कि तुम शीघ्र यहां से चले जाओ नहीं तो हमारे स्वामी तुम्हें मार डालेंगे। श्री कृष्ण ने कहा कि मैं अपनी 'गेंद' लिए बगैर नहीं जाऊंगा।
इतनी देर में कालिया नाग की आंख खुल गई। और वह उनसे युद्ध करने लगा । श्री कृष्ण एक-एक करके उसके सारे फनो को तोड़ना शुरू कर दिया । तब वह कालिया नाग उनकी अनेको प्रकार से स्तुति करने लगा। और उनसे माफी मांगने लगा। तब श्री कृष्ण ने कहा-कि तुम समुद्र में चले जाओ और यमुना का पानी निर्मल करो। कालिया नाग ने कहा कि वहां पर गरुड़ मुझे देखकर मार डालेंगे । तब श्री कृष्ण ने कहा कि तुम्हारे सिर पर मेरे पद चिन्ह देखकर गरुड़ तुम्हे नही मारेंगे। तब उस कालिया नाग उनकी अनेको प्रकार से स्तुति की और कृष्ण को देवताओं में दुर्लभ पारिजात के पुष्प भेंट में दिए। उन पुष्पों को उससे लाकर उन्होनें नन्द बाबा व यशोदा मैय्या को दिये। नन्द बाबा व यशोदा मैया ने उनके आने पर अनेकों उत्सव किए । नारद ने कहा- मथुरा नगरी के दक्षिणी हिस्से में कंस का मंत्री महातेजस्वी चाणूर रहता था। कंस ने उसे बुलवाया उसने कंस से कहा कि उन दोनों बालकों को नगर में बुलवाकर मल्लयुद्ध में उनका वध करवा दो। कंस को उसका सुझाव पसंद आ गया। उसने अक्रूर जी को बुलवाकर उन दोनों बालकों को लाने भेजा। अक्रूर जी ने नन्द जी के पास जाकर कंस की मंशा बताई। जिसे सुनकर नंद जी और यशोदा माता भयभीत हो गये। और उन्होंने अक्रूर जी को मना कर दिया। श्री कृष्ण के सुनने पर उन्होंने उन्हें समझा दिया और वह बलराम जी के साथ जाने को राजी हो गये।
नगर में पहुंचकर उन्होंने मालिन का कूबड़ ठीक किया और पागल हाथी का वध किया। कंस के उत्सव में उन्होंने शिव का धनुष तोड़ डाला और अखाड़े में पहले चाणूर और फिर केशी को मार डाला। कंस ने बड़े-बड़े दैत्यों को बुलाकर कहा- कि उन्हें परास्त न कर सका। उन सबको श्री कृष्ण व बलराम ने मार डाला । बलराम जी ने मूसल तथा हल से व श्री कृष्ण ने चक्र से अनेको दैत्यों को मार डाला। श्री कृष्ण ने कंस को पकड़कर कहा- हे महानीच दैत्य देख मैं वही देवकी का आठवां पुत्र हूं जिसके द्वारा तुम मृत्यु को प्राप्त होंगे। मैं तुम्हारा वध करके इस संसार को तुम्हारे पापों से मुक्त करूंगा ।इतना कहकर श्री कृष्ण ने कंस को धरती पर पटक दिया और उसकी छाती पर सवार हो गये। कंस के केश पकड़कर उसकी छाती पर मुष्टि प्रहार कर उसके प्राण ले लिये। उस असुर के मरने पर सब देवताओं ने पुष्प वर्षा की और संसार के सब लोगों ने उनकी वंदना की । तत्पश्चात् उन्होंने वासुदेव, देवकी व अग्रसेन जी को कारागार से मुक्त किया। जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है वह प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।
