Krichra Chaturthi Vrat Katha (कृच्छ्र चतुर्थी व्रत कथा): कृच्छ्र चतुर्थी की सबसे लोकप्रिय कथा माघ माह की सकट चौथ से जुड़ी है, जो इस व्रत के महत्व को दर्शाती है। प्राचीन काल में एक बार माता पार्वती स्नान करने गईं और उन्होंने गणेश जी को द्वारपाल बनाकर बाहर खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी आज्ञा के बिना किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दिया जाए। कुछ देर बाद भगवान शिव आए और भीतर जाने लगे, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिव जी क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया।
जब माता पार्वती को यह बात पता चली, तो वह अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने क्रोध में आकर प्रलय लाने की चेतावनी दी। सभी देवताओं ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया। तब भगवान शिव ने एक हाथी का सिर गणेश जी के धड़ से जोड़कर उन्हें पुनः जीवनदान दिया और उन्हें यह वरदान दिया कि त्रिलोक में उनकी पूजा सबसे पहले होगी।
तब माता पार्वती ने सभी देवताओं और मनुष्यों को यह वरदान भी दिया कि जो भी व्यक्ति माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी की पूजा करेगा, उसके जीवन के सभी संकट (कृच्छ्र) दूर होंगे और उसे संतान सुख, धन और मोक्ष की प्राप्ति होगी। तभी से इस तिथि को 'संकट चौथ' या 'कृच्छ्र चतुर्थी' के नाम से जाना जाने लगा और यह परंपरा शुरू हुई।
राजा हरिश्चंद्र और रानी तारामती की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र और उनकी पत्नी तारामती को जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जब वह संकट में थे, तब रानी तारामती ने अपने कष्टों को दूर करने और अपने परिवार की रक्षा के लिए गणेश जी का यह व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से उनके सभी दुःख दूर हुए और उन्हें उनका खोया हुआ राज्य और पुत्र पुनः प्राप्त हुआ। इस कथा ने भी लोगों में इस व्रत के प्रति विश्वास को बढ़ाया और इसे संकट निवारण के लिए एक प्रभावी माध्यम माना जाने लगा।
