दास्तान-ए-उस्ताद: 'मेरी गंगा कहां से लाओगे..', ये कहते हुए बिस्मिल्लाह खां ने ठुकरा दिया था अमेरिका का ऑफर

Ustad Bismillah Khan: उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का बनारस, गंगा और बाबा विश्वनाथ से गहरा लगाव था। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "सुरीला बनना है तो बनारस चले आओ, गंगा किनारे बैठो, क्योंकि बनारस के नाम में ही 'रस' है।"

Ustad Bismillah Khan: उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जब शहनाई बजाते थे तो मानो गंगा की धारा बह उठती थी। छोटे से वाद्ययंत्र के छिद्रों पर उनकी जादुई पकड़ ने शहनाई को भारत की आत्मा और बनारस की पहचान बना दिया और उन्हें 'भारत रत्न' की उपाधि दिलाई। उस्ताद के लिए सबसे बड़ा सम्मान गंगा के घाट और बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी थी। यही कारण है कि जब उन्हें अमेरिका में बसने का प्रस्ताव मिला, तो उन्होंने बड़ी सहजता से जवाब दिया, "अमेरिका में आप मेरी गंगा कहां से लाओगे?”

Ustad Bismillah Khan

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (Photo: PTI)

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। छह साल की उम्र में वह अपने मामा अली बख्श के पास वाराणसी आ गए, जो काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। यहीं से उस्ताद ने शहनाई को अपना पहला प्यार बनाया। रोजाना छह घंटे रियाज और बालाजी मंदिर के सामने बैठकर साधना ने उनकी शहनाई को वह जादू दिया, जिसने 1937 में ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में पहली बार दुनिया को मंत्रमुग्ध किया।

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