Shayari of the day: हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है.., जानें क्या कहता है अल्लामा इकबाल का यह शेर

Shayari of the day: अल्लामा इकबाल का यह शेर समाज में असली प्रतिभा और दूरदर्शिता की कमी को उजागर करता है और बताता है कि एक सच्चा ‘दीदा-वर’ पूरी दुनिया को बदलने की क्षमता रखता है।

Shayari of the day, Allama Iqbal Shayari: अल्लामा मुहम्मद इकबाल उर्दू शायरी के महान शायर और दार्शनिक थे। उनकी शायरी भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही गहरी दार्शनिक चेतना, आत्म-जागरण और राष्ट्रप्रेम से भरी हुई होती थी। इकबाल को “शायर-ए-मशरिक” (पूर्व का कवि) भी कहा जाता था। उनकी भाषा सरल, मार्मिक और प्रभावशाली हुआ करती थी। आज भी उनकी शायरी पढ़ने वाले के मन में नई ऊर्जा, साहस और सोच पैदा करती है। अल्लामा इकबाल के यूं तो बहुत से शेर दशकों बाद भी आज सुने सुनाए जाते हैं, लेकिन एक शेर ऐसा है जो बहुत ज्यादा पॉपुलर है। अल्लामा इकबाल का यह शेर कुछ इस तरह से हैः

Shayari of the day

आज की शायरी (Photo: istock)

“हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।”

अल्लामा इकबाल का यह मशहूर शेर गहरी सोच और दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है। इस शेर में ‘नर्गिस’ को रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। नर्गिस का फूल यहां उस समाज या दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है, जो लंबे समय तक एक सच्चे समझदार और दूरदर्शी व्यक्ति (दीदा-वर) की कमी महसूस करता है। ‘बे-नूरी’ का मतलब है रोशनी या चमक का अभाव, यानी ऐसा समय जब समाज में सच्ची समझ, नेतृत्व और गहरी दृष्टि रखने वाले लोग नहीं होते।

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