Ramkrishna Paramhans Ke Prerak Prasang (रामकृष्ण परमहंस के प्रेरक प्रसंग): रामकृष्ण परमहंस 19वीं सदी के एक महान संत और आध्यात्मिक गुरु थे। उनका जन्म 1836 में पश्चिम बंगाल के कामारपुकुर गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे और माँ काली की भक्ति में लीन रहते थे। वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी भी रहे। रामकृष्ण परमहंस का मानना था कि सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं। उन्होंने सादगी, प्रेम और ईश्वर-भक्ति का संदेश दिया। उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद थे, जिन्होंने उनके विचारों को पूरे विश्व में फैलाया। आज रामकृष्ण परमहंस की जयंती है और इस खास मौके पर यहां उनके जीनन की कुछ प्रेरणादायक कहानियां यहां बताई गई हैं।
भगवान को किस चीज का लोभ
रामकृष्ण परमहंस के मथुरा बाबू नाम के एक शिष्य थे। एक बार उन्होंने एक सुन्दर मंदिर बनवाया और उसमें भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करवाई। मूर्ति को विभिन्न प्रकार के बेशकीमती वस्त्राभूषणों से सजाया गया। दूर – दूर से लोग इस अनोखे मंदिर और मूर्ति के दर्शनार्थ आने लगे। तभी एक रात कुछ चोर मंदिर में घुसे और मूर्ति के सभी बेशकीमती आभूषणों को चुरा ले गये। सुबह जब लोगों ने देखा तो चारों ओर खबर आग की तरह फ़ैल गई। जब यह बात मथुरा बाबू को पता चली तो वह दौड़े- दौड़े मंदिर चले आये। भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने खड़े दुखी होकर बोले – भगवान! आपके पास तो गदा और चक्र जैसे भयंकर हथियार है, जिनसे आपने कितने ही दुष्ट राक्षसों को मौत के घाट उतार दिया। फिर भी चोर आपके वस्त्राभूषण चोरी कर गये और आपने कुछ नहीं किया। आपसे तो हम मनुष्य अच्छे जो कमसे कम थोड़ा बहुत विरोध तो कर ही लेते है। रामकृष्ण परमहंस उस समय वही पास ही खड़े सब सुन रहे थे। वह मुस्कुराते हुए बोले- मथुरा बाबू ! भगवान को तुम्हारी तरह वस्त्राभूषणों का कोई लोभ- मोह नहीं, जो दिन रात अपनी नींद खराब करके उनकी चौकीदारी करें। और भगवान को कमी किस बात की है, जो उन तुच्छ गहनों के अपने अमोघ अस्त्रों का प्रयोग करें । मथुरा बाबू ने शर्म से सिर झुका लिया।
समर्पण ही सच्ची भक्ति है
एक बार परमहंसदेव अपने शिष्यों को कुछ उपदेश दे रहे थे। वह शिष्यों को अवसर की महत्ता बता रहे थे । वह बोल रहे थे कि मनुष्य अक्सर अपने जीवन में आये सुअवसरों को ज्ञान और साहस की कमी के कारण खो देता है। अज्ञान के कारण मनुष्य या तो अवसर को समझ ही नहीं पाता और कोई समझ भी जाये तो उसका लाभ उठाने के अनुरूप उसमें साहस नहीं होता। जब उन्होंने देखा कि बात शिष्यों को समझ नहीं आ रही है तो उन्होंने सामने ही बैठे नरेंद्र से कहा– नरेंद्र ! मान ले अगर तू एक मक्खी है और तेरे सामने अमृत का एक कटोरा भरा पड़ा है । अब बता तू उसमें कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे छूने की कोशिश करेंगा? नरेंद्र बोला- किनारे बैठकर छूने की कोशिश करूँगा। बीच में कूद पड़ा तो प्राण संकट में आ सकते है । इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि किनारे बैठकर खाने की कोशिश की जाये। पास में बैठे दुसरे शिष्यों ने विवेकानंद के तर्क की खूब सराहना की । किन्तु परमहंसजी हँसे और बोले– मुर्ख ! जिस अमृत को पीकर तू अमर होने की कल्पना करता है, उसमें भी डूबने से डरता है। जब अमृत में डूबने का सुअवसर मिल रहा है तो फिर मृत्यु का भय क्यों? तब शिष्यों को बात समझ में आई । चाहे आध्यात्मिक उन्नति हो या भौतिक, जब तक पूर्ण समर्पण नहीं होता, सफलता संदिग्ध है।
अहंकार की जड़
एक बार रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्य इस बात पर झगड़ रहे थे कि हम दोनों में से कौन अधिक श्रेष्ठ है? लड़ते – झगड़ते बात गुरुदेव तक जा पहुंची। उन्होंने परमहंसजी से जाकर पूछा– गुरुदेव ! आप ही बताइए, हम दोनों में से कौन अधिक श्रेष्ठ है ? जब परमहंसदेव ने यह बात सुनी तो बोले– तुम इतनी सी बात पर झगड़ रहे थे। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो बहुत ही सरल है। जो दुसरे को अपने से बड़ा और श्रेष्ठ समझता है, वही श्रेष्ठ है। यह सुनकर दोनों शिष्य बोलने लगे- तू श्रेष्ठ, नहीं तू श्रेष्ठ। परमहंस जी मुस्कुराने लगे।
