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रागमाला पेंटिंग्स: कैनवस पर सावन के रंग, राग कैसे बन गए सुंदर-सजीव चित्र

Ragamala Paintings: रागों को चित्रों में उतारने का नाम हैं रागमाला पेंटिंग्स। इन चित्रों में संगीत, सावन और मन के भावों को रंगों में खूबसूरती से उतारा जाता है। जानें रागमाला पेंटिंग्स का इतिहास, बनाने की प्रक्रिया, प्राकृतिक रंग, पहचान और कीमत।

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जब कैनवस पर उतरे संगीत के रंग- रागमाला पेंटिंग्स पर सजते हैं सुर
Authored by: Medha Chawla
Updated Jul 27, 2026, 17:37 IST
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Ragamala Paintings: काले बादलों ने आसमान को लगभग ढक लिया है। बादलों के बीच बिजली की एक पतली लकीर चमक रही है। नीचे महल की छत पर बैठी नायिका की आंखें दूर तक फैले रास्ते पर टिकी हैं। पास ही मोर ने अपने पंख खोल रखे हैं, लेकिन नायिका का मन सावन के उल्लास में नहीं भीग रहा। वह किसी की प्रतीक्षा में है। शायद प्रिय परदेस गया है, शायद उसका कोई संदेश नहीं आया या शायद बारिश ने उसकी याद को अचानक और गहरा कर दिया है।

पहली नजर में यह किसी पुराने राजमहल में बीतती बरसात का चित्र लगता है। थोड़ा ठहरकर देखें तो मालूम होता है कि बादल, मोर, बिजली और प्रतीक्षा करती स्त्री केवल दृश्य का हिस्सा नहीं हैं। ये सब मिलकर एक राग का भाव रच रहे हैं। यहां बारिश सुनाई नहीं देती, फिर भी चित्र के भीतर कहीं मल्हार बज रहा होता है।

भारतीय कला की यही अद्भुत परंपरा ‘रागमाला पेंटिंग’ कहलाती है। इसमें संगीत को रंगों में सुना गया, कविता को आकृतियों में देखा गया और मन के भावों को मौसम, पेड़, पशु-पक्षी, महल तथा मानवीय संबंधों के सहारे चित्र में उतार दिया गया। यह केवल मिनिएचर पेंटिंग की शैली नहीं, बल्कि संगीत, साहित्य और चित्रकला के बीच सदियों पहले हुआ एक बेहद कल्पनाशील संवाद है।

सुर से तस्वीर तक कैसे पहुंचा राग

‘रागमाला’ का सामान्य अर्थ है रागों की माला। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग केवल स्वरों का निश्चित क्रम नहीं होता। उसका अपना स्वभाव, समय, वातावरण और भाव होता है। कोई राग भोर की शांति जगाता है, कोई संध्या की गंभीरता। कोई राग विरह को गहरा करता है, तो कोई प्रेम, भक्ति, वैराग्य, उत्सव या बारिश की अनुभूति को।

पुराने कलाकारों के सामने सबसे बड़ा और सबसे सुंदर प्रश्न यही रहा होगा कि जिस राग को केवल कान सुन सकते हैं, उसे आंखों के सामने कैसे लाया जाए?

इसके लिए उन्होंने राग की तान को हूबहू चित्रित करने की कोशिश नहीं की। उन्होंने राग से पैदा होने वाले भाव को मनुष्य, प्रकृति और कथा का रूप दिया। कल्पना की गई कि यदि कोई राग मनुष्य होता, तो उसका व्यक्तित्व कैसा होता? वह किस समय जागता, किस मौसम में आता, क्या पहनता और किस तरह के स्थान पर रहता? उसके मन में प्रेम होता, भक्ति होती, प्रतीक्षा होती या किसी से बिछड़ने की पीड़ा?

सावन के हर भाव का प्रतीक हैं रागमाला पेंटिंग्स

सावन के हर भाव का प्रतीक हैं रागमाला पेंटिंग्स

इस कल्पना से राग कभी राजसी पुरुष बना, कभी साधु, देवता या प्रेमी। रागिनी को अक्सर स्त्री नायिका का रूप मिला। कुछ परंपराओं में राग और रागिनियों के पुत्र-पुत्रियों का भी जिक्र मिलता है। इनको रागपुत्र और रागपुत्री के तौर पर चित्रित किया गया है। इस तरह संगीत को एक मानवीय परिवार और कथा मिल गई।

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि अलग-अलग काल और क्षेत्रों में रागों का यह वर्गीकरण एक जैसा नहीं रहा। फिर भी छह प्रमुख रागों के साथ उनकी पांच या छह रागिनियों को जोड़कर 36 या 42 चित्रों की शृंखला बनाना काफी चित्रकारों के बीच लोकप्रिय रहा। कुछ बड़ी शृंखलाओं में रागपुत्रों और रागपुत्रियों को जोड़कर चित्रों की संख्या और बढ़ जाती थी।

राग को पहचानने के लिए रचा जाता था पूरा संसार

रागमाला पेंटिंग में कलाकार किसी व्यक्ति का चित्र भर नहीं बनाता था। वह उसके चारों ओर एक ऐसा संसार रचता था, जिसे देखकर राग के स्वभाव का अनुमान लगाया जा सके।

सुबह से जुड़े किसी राग के लिए हल्का आकाश, जागता हुआ नगर, मंदिर और पूजा का दृश्य चुना जा सकता था। रात के राग में गहरा नीला आकाश, चंद्रमा, महल का शांत कक्ष और दीपक दिखाई देते। प्रेम और विरह से जुड़ी रागिनी में खाली पलंग, अधखुली खिड़की, प्रतीक्षा करती नायिका या उसे समझाती सखी चित्र का हिस्सा बनती।

भैरव को प्रायः शिव, साधना और प्रातःकाल की गंभीरता से जोड़ा गया। भैरवी रागिनी के चित्रों में शिव की उपासना करती स्त्री दिखाई देती है। टोडी रागिनी को कई शैलियों में जंगल में वीणा बजाती नायिका के रूप में दिखाया गया, जिसकी धुन सुनकर हिरण उसके पास चले आते हैं। यहां हिरण केवल वन्यजीव नहीं, संगीत की कोमलता और नायिका के अकेलेपन के साथी हैं।

दीपक राग के चित्रों में अग्नि, प्रकाश, दीपों की कतार और गर्म रंगों की प्रधानता मिलती है। वसंत राग फूलों, नृत्य, संगीत और उत्सव के बीच सामने आता है। मेघ या मल्हार से जुड़े चित्रों में बादल, बिजली, वर्षा, मोर, जल और उमड़ती हरियाली राग की पहचान बन जाते हैं।

राग का नाम कभी चित्र के ऊपर या पीछे लिख दिया जाता था। कई चित्रों के साथ ‘ध्यान’ अथवा छोटी कविता भी होती थी, जो राग के रूप, भाव और परिस्थिति का वर्णन करती थी। कलाकार उस कविता को आधार बनाकर दृश्य रचता था। इसीलिए रागमाला चित्र एक साथ पढ़े, देखे और मन ही मन सुने जा सकते हैं।

कला शैलीमुख्य पहचान और भावरंगों का प्रयोगविशेष प्रतीक
बूंदी एवं कोटा शैली (राजस्थान)प्रकृति का सघन चित्रण, सावन के मेघ, तीव्र भावुकता और नाटकीय दृश्य।गहरा हरा, चटक लाल, चमकीला पीला और सुनहरा।नाचते मोर, कमल से भरे सरोवर, घने जंगल और गरजते बादल।
कांगड़ा और बसोहली शैली (पहाड़ी)कोमलता, लयात्मकता, चेहरे के सौम्य भाव तथा ईश्वरीय और वैष्णव प्रेम।हल्के, प्राकृतिक और पारदर्शी रंगों के साथ शांत नीले और हरे रंग।पहाड़ी दृश्य, बहती नदियां, हरे वन तथा राधा-कृष्ण से जुड़े प्रतीक।
मुगल शैलीयथार्थवादी चित्रण, राजसी वैभव, वस्त्रों और चेहरे की बारीकियां तथा फारसी प्रभाव।संयमित रंग, सोने का महीन प्रयोग और सूक्ष्म सजावटी बॉर्डर।भव्य दरबार, अलंकृत वास्तुकला, शाही पोशाक और सजावटी हाशिये।
दक्कनी शैली (अहमदनगर और बीजापुर)रहस्यवाद, फारसी सौंदर्यबोध और भारतीय भावों का अनोखा संगम।बैंगनी, नारंगी, गुलाबी, गहरे नीले और सुनहरे रंगों का मेल।ऊंचे ताड़ के पेड़, बहुरंगी वस्त्र, असामान्य वास्तुकला और रहस्यमयी पृष्ठभूमि।

रागमाला में सावन केवल मौसम नहीं

रागमाला पेंटिंग्स का सबसे भावपूर्ण रंग वर्षा ऋतु में खुलता है। सावन के चित्रों में आसमान शांत नहीं रहता। बादल नीचे झुके हुए लगते हैं, बिजली चित्र को एक कोने से दूसरे कोने तक काटती है और बारिश तिरछी रेखाओं में धरती पर उतरती है। पेड़ हवा से झुकते हैं, तालाब भर उठते हैं और मोर पंख फैलाकर नाचते हैं।

प्रकृति के रंगों का अनूठा मेल हैं ये पेंटिंग्स

प्रकृति के रंगों का अनूठा मेल हैं ये पेंटिंग्स

लेकिन इस हरियाली और उल्लास के बीच एक दूसरा सावन भी दिखाई देता है। यह उस स्त्री का सावन है, जिसका प्रिय उसके पास नहीं है। आसपास प्रकृति में मिलन का उत्सव है, जबकि उसके हिस्से में प्रतीक्षा आई है। मोर का नृत्य उसके मन को खुश करने के बजाय बेचैन कर सकता है। बिजली की चमक खाली महल को और सूना बना सकती है। बारिश की हर बूंद उस आवाज की तरह लगती है, जिसका वह लंबे समय से इंतजार कर रही है।

दूसरे चित्र में यही सावन प्रेमियों को पास लाता है। नायक-नायिका किसी मंडप में बैठे हैं। दासियां संगीत बजा रही हैं। महल के बाहर बादल बरस रहे हैं और भीतर मिलन का शांत सुख है। कहीं कृष्ण बांसुरी बजाते हैं और गोपियां उनके आसपास हैं। कहीं नायिका सखी के हाथ प्रिय के लिए संदेश भेजती है।

यही कारण है कि रागमाला का सावन हरे रंग और मोर की सुंदर तस्वीर भर नहीं है। यह मिलन और विरह के बीच झूलता हुआ मन है। बाहर बरसता मौसम भीतर की भावना को कई गुना बढ़ा देता है।

राजदरबारों से निकली अलग-अलग चित्र भाषाएं

रागमाला चित्रों के शुरुआती उदाहरण 15वीं शताब्दी के आसपास दिखाई देने लगते हैं। 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच यह परंपरा राजस्थान, मध्य भारत, दक्कन और पंजाब की पहाड़ियों के राजदरबारों में खूब विकसित हुई। हर क्षेत्र ने रागों को अपने भूगोल, रंग और सौंदर्यबोध के अनुसार चित्रित किया।

मालवा शैली में लाल, काले, पीले और गहरे नीले जैसे सपाट तथा प्रभावशाली रंग मिलते हैं। आकृतियां सरल दिखाई दे सकती हैं, लेकिन दृश्य में नाटकीयता बहुत होती है। मेवाड़ शैली में रंगों का खुला और निर्भीक इस्तेमाल मिलता है। लाल धरातल, पीली इमारतें, हरे पेड़ और नीला आकाश एक साथ इतने स्पष्ट रूप में आते हैं कि छोटा चित्र भी दूर से ध्यान खींचता है।

बूंदी और कोटा के कलाकार प्रकृति को स्थिर सजावट की तरह नहीं देखते थे। उनके बादल लहराते हैं, पेड़ हवा में झूमते हैं, जानवर दौड़ते हैं और पहाड़ों के बीच पानी बहता हुआ महसूस होता है। मानसून के दृश्य इन शैलियों में खास तौर पर जीवंत दिखाई देते हैं।

किशनगढ़ शैली में चेहरे अधिक कोमल, आंखें लंबी और भाव महीन होते हैं। यहां प्रेम अधिक स्वप्निल दिखाई देता है। पहाड़ी शैली में हरी ढलान, नदियां, वृक्ष और प्रेम-दृश्य एक सौम्य लय के साथ सामने आते हैं। दक्कन की रागमाला में गहरे रंग, भव्य वस्त्र, असामान्य वास्तु और रहस्यमय वातावरण देखने को मिल सकता है।

विषय एक होने के बावजूद हर क्षेत्र ने राग को अपनी भाषा में चित्रित किया। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि धुन वही रही, लेकिन उसे गाने का अंदाज और आवाज बदलती गई।

कैनवस नहीं, छोटे कागज पर बसता था पूरा मौसम

आज रागमाला से प्रेरित पेंटिंग्स कैनवस, कपड़े, लकड़ी के पैनल और डिजिटल माध्यम में भी बनाई जाती हैं। हालांकि ऐतिहासिक रागमाला चित्र मुख्य रूप से कागज पर तैयार किए गए छोटे आकार के चित्र थे। कुछ उदाहरण कपड़े पर भी मिलते हैं।

यहां ‘मिनिएचर’ का अर्थ केवल छोटा चित्र नहीं है। इसका असली महत्व बेहद बारीक रेखांकन और सूक्ष्म विवरण में है। हथेली से थोड़े बड़े चित्र में कलाकार महल, बाग, बादल, पशु-पक्षी, संगीतकार और नायक-नायिका का पूरा संसार बना देता था। कुछ सेंटीमीटर के चेहरे पर आंखों और भौंहों के सहारे प्रेम, प्रतीक्षा या दुख का भाव दिखाई देता था।

चित्र बनाने के लिए हाथ से बने कागज की परतों को आपस में चिपकाकर मजबूत आधार तैयार किया जाता। फिर उसे चिकने पत्थर या किसी कठोर वस्तु से घिसकर चमकदार और समतल बनाया जाता। यह प्रक्रिया कागज की सतह को रंगों के योग्य बनाती थी।

इसके बाद कलाकार हल्की रेखाओं में प्रारंभिक चित्र बनाता। नायिका कहां बैठेगी, पेड़ कितनी जगह घेरेगा, महल की छत किस ऊंचाई पर होगी और आकाश का कितना हिस्सा बादलों से भरा जाएगा, यह सब पहले तय होता। अच्छी रागमाला पेंटिंग में खाली स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी आकृतियां। नायिका और दूर जाते रास्ते के बीच की खाली जगह उसकी प्रतीक्षा को और लंबा बना सकती है।

परत-दर-परत तैयार होती थी पेंटिंग

रेखांकन पूरा होने के बाद रंग भरे जाते, लेकिन यह काम एक ही बार में नहीं होता था। रंगों की कई पतली परतें लगाई जातीं। पहले बड़े हिस्से, जैसे आकाश, धरती, दीवार और वस्त्र रंगे जाते। इसके बाद चेहरे, हाथ, पेड़, पशु-पक्षी और आभूषणों की बारी आती।

हर परत के सूखने के बाद अगली परत लगाई जाती थी। कुछ हिस्सों को फिर से घिसकर चमक दी जाती। अंत में आंखें, बाल, वस्त्रों की महीन छपाई, पत्तियों की नसें, आभूषण और इमारत की सजावट तैयार होती।

बारीक काम के लिए बेहद महीन ब्रश इस्तेमाल किया जाता था। परंपरागत मिनिएचर कलाकार गिलहरी के बालों से बने नुकीले ब्रश के इस्तेमाल के लिए जाने जाते रहे हैं। ऐसे ब्रश से बहुत पतली और नियंत्रित रेखा खींची जा सकती थी। एक छोटी आंख, पलकों की रेखा या मोर के पंख का महीन हिस्सा बनाते समय कलाकार को सांस तक नियंत्रित रखनी पड़ती थी।

साधारण सजावटी चित्र कुछ दिनों में तैयार हो सकता है। पारंपरिक तकनीक से बनाया गया विस्तृत रागमाला चित्र कई सप्ताह ले सकता है। यदि उसमें प्राकृतिक रंग, जटिल वास्तु, अनेक आकृतियां और सोने का काम हो तो कई महीने भी लग सकते हैं।

पत्थरों और कालिख से निकलते थे रंग

रागमाला पेंटिंग्स के रंग केवल चमकदार नहीं होते, उनके पीछे लंबी तैयारी और गहरी सांकेतिक भाषा होती है। पुराने कलाकार प्राकृतिक और खनिज स्रोतों से रंग बनाते थे। कालिख से काला, गेरू और दूसरे खनिजों से लाल, नील से नीला तथा विभिन्न पत्थरों और वनस्पतियों से हरा रंग तैयार किया जाता था। पीले रंग के लिए हरताल जैसे खनिज स्रोतों का इस्तेमाल भी मिलता है। सफेद रंग सीप या अन्य खनिज पदार्थों से बनाया जा सकता था।

रंग तैयार करने से पहले पत्थर या खनिज को लंबे समय तक घिसकर महीन चूर्ण बनाया जाता। फिर उसे छानकर प्राकृतिक गोंद के साथ मिलाया जाता, ताकि रंग कागज पर टिक सके। रंग जितना अच्छी तरह घिसा जाता, उसकी चमक और सतह उतनी ही सुंदर बनती।

महंगी और राजसी पेंटिंग्स में असली सोने तथा कभी-कभी चांदी का इस्तेमाल किया जाता था। सोने की महीन परत या चूर्ण से आभूषण, महल की सजावट, वस्त्रों के बॉर्डर और प्रकाश के हिस्से बनाए जाते। चित्र को अलग-अलग कोणों से देखने पर ये हिस्से हल्के-हल्के चमकते हैं। इससे छोटे से चित्र में भी राजसी वैभव और जीवंतता आ जाती है।

हर रंग अपने साथ एक भाव लाता है

रागमाला में रंग दृश्य को सजाने भर के लिए नहीं होते। वे राग की मनःस्थिति बताते हैं। गहरा नीला या स्याह आकाश वर्षा की गंभीरता और विरह का विस्तार बन सकता है। हरा रंग नई वनस्पति, जीवन और आशा का संकेत देता है। लाल प्रेम, ऊर्जा, बेचैनी या राजसी वैभव को सामने लाता है। पीला रंग वसंत, प्रकाश और उत्सव से जुड़ सकता है।

कैसे बनते थे रागमाला पेंटिंग्स के रंग

कैसे बनते थे रागमाला पेंटिंग्स के रंग

काला बादल हमेशा डर का प्रतीक नहीं होता। सावन की पेंटिंग में वही बादल प्रिय के लौटने की उम्मीद भी जगा सकता है। सफेद बिजली केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, अचानक उठी भावना की तरह चित्र को चीरती हुई दिखाई देती है।

पुराने कलाकार कई बार वास्तविकता से अलग रंग चुनते थे। धरती लाल हो सकती थी, आकाश गहरा पीला और पहाड़ी नीली। उद्देश्य प्रकृति की हूबहू नकल करना नहीं था। कलाकार उस भाव को रंगना चाहता था, जो राग सुनकर मन में पैदा होता है।

क्या आज भी बनती हैं रागमाला पेंटिंग्स

रागमाला परंपरा आज संग्रहालयों तक सीमित नहीं है। राजस्थान और दूसरे क्षेत्रों के मिनिएचर कलाकार पुराने चित्रों की प्रतिकृतियां बनाने के साथ नए रूप भी तैयार कर रहे हैं। कुछ कलाकार पारंपरिक आकृतियों और प्राकृतिक रंगों को बचाए हुए हैं, जबकि कुछ बड़े कैनवस, आधुनिक रंगों और समकालीन रचना के साथ प्रयोग कर रहे हैं।

अंतर इतना है कि पहले रागमाला अक्सर एक पूरी शृंखला के रूप में बनाई जाती थी। आज ग्राहक घर की सजावट के लिए मेघ राग, टोडी रागिनी या भैरवी जैसे एक दृश्य को चुन सकता है। कई आधुनिक कलाकार पुराने विषय में नई स्त्री, नया शहर या आज के अकेलेपन को जोड़कर भी काम कर रहे हैं।

हालांकि हर मोर और नायिका वाली पेंटिंग रागमाला नहीं होती। प्रामाणिक रागमाला रचना के पीछे किसी विशिष्ट राग, उससे जुड़ी कविता, भाव या पारंपरिक दृश्य-संकेत की समझ जरूरी है। केवल राजस्थानी पोशाक, महल और बादल जोड़ देने से चित्र रागमाला नहीं बन जाता।

कुछ हजार से लाखों तक क्यों पहुंचती है कीमत

रागमाला पेंटिंग की कीमत उसके माध्यम, आकार, बारीकी, कलाकार, उम्र और प्रामाणिकता पर निर्भर करती है। बाजार में एक ही नाम के नीचे प्रिंट, नई हस्तनिर्मित पेंटिंग और सैकड़ों वर्ष पुरानी दुर्लभ कृति मिल सकती है। तीनों की कीमतों की आपस में तुलना नहीं की जा सकती।

साधारण डिजिटल प्रिंट कुछ सौ रुपये में मिल सकता है। प्रिंट के ऊपर हाथ से रंग या स्वर्ण प्रभाव देकर बनाई गई सजावटी कृति लगभग 1,500 से 5,000 रुपये में मिल सकती है। पूरी तरह हाथ से बनाई गई छोटी मिनिएचर पेंटिंग का मूल्य करीब 5,000 से 20,000 रुपये तक हो सकता है।

प्रशिक्षित कलाकार की बारीक रचना, प्राकृतिक रंग, हाथ से तैयार कागज और सोने के काम वाली पेंटिंग 20,000 से 75,000 रुपये या इससे ऊपर जा सकती है। बड़े आकार, महीनों की मेहनत, जटिल दृश्य और कलाकार की प्रतिष्ठा के अनुसार नई कृति की कीमत एक लाख रुपये से अधिक भी हो सकती है।

सदियों पुरानी प्रमाणित रागमाला पेंटिंग का बाजार बिल्कुल अलग है। उसकी कीमत में उम्र के साथ दुर्लभता, चित्र की स्थिति, कलाकार या क्षेत्रीय शैली, शृंखला से उसका संबंध और उसका ‘प्रोवेनेंस’ यानी अब तक के स्वामित्व का प्रमाण महत्वपूर्ण होता है। अंतरराष्ट्रीय नीलामियों में ऐतिहासिक रागमाला चित्र हजारों से लेकर कई दसियों हजार पाउंड या डॉलर तक के अनुमान पर सामने आते रहे हैं। पूरी और दुर्लभ शृंखला का सांस्कृतिक तथा आर्थिक महत्व कहीं अधिक हो सकता है।

खरीदते समय केवल रंग देखकर फैसला न करें

रागमाला पेंटिंग खरीदने से पहले यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि कृति पूरी तरह हाथ से बनाई गई है, प्रिंट है या प्रिंट के ऊपर रंग भरे गए हैं। कई सजावटी पेंटिंग्स को ‘हैंडमेड’ कहकर बेचा जाता है, जबकि उनका मूल ढांचा मशीन से छपा होता है।

कलाकार का नाम, माध्यम, चित्र का आकार, रंगों की प्रकृति और इसे बनाने में लगा समय पूछना चाहिए। प्राकृतिक रंगों का दावा हो तो उनके स्रोत की जानकारी लें। महंगी कृति के साथ कलाकार का प्रमाणपत्र और बिल जरूरी है।

यदि चित्र को पुराना या एंटीक बताया जा रहा है तो केवल पीले पड़े कागज और धुंधले रंगों को प्रमाण न मानें। पुराने जैसा प्रभाव नया कागज तैयार करके भी दिया जा सकता है। ऐसे चित्र की उम्र, शैली और सामग्री की जांच किसी भरोसेमंद कला विशेषज्ञ से करानी चाहिए। कागज में फंगस, नमी, टूटन, रंग उखड़ने और बाद में किए गए सुधार भी उसकी कीमत को प्रभावित करते हैं।

घर पर रागमाला पेंटिंग्स कैसे सजाएं

घर पर रागमाला पेंटिंग्स कैसे सजाएं

घर में कहां और कैसे सजाएं

रागमाला पेंटिंग को घर में ऐसे स्थान पर लगाना चाहिए, जहां उसे पास जाकर देखा जा सके। इसकी बारीकियां बहुत दूरी से समझ नहीं आतीं। लिविंग रूम की साइड वॉल, संगीत कक्ष, पढ़ने का कोना, पैसेज या शांत बैठकी इसके लिए अच्छे स्थान हो सकते हैं।

एक बड़े आधुनिक रागमाला कैनवस को प्रमुख दीवार पर अकेले लगाया जा सकता है। छोटी मिनिएचर पेंटिंग्स तीन, छह या नौ चित्रों के समूह में सुंदर लगती हैं। अलग-अलग रागों की छोटी शृंखला घर की साधारण दीवार को एक निजी कला-दीर्घा में बदल सकती है।

पारंपरिक कागजी पेंटिंग को सीधी धूप, नमी, रसोई की भाप और एसी की सीधी हवा से बचाना चाहिए। फ्रेम में एसिड-फ्री माउंट और यूवी सुरक्षा वाला कांच बेहतर रहता है। पेंटिंग को कांच से सीधे चिपकाकर फ्रेम नहीं करना चाहिए। पुराने चित्र की सफाई घर पर रगड़कर करने के बजाय प्रशिक्षित संरक्षक से करानी चाहिए।

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