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मर कर भी नहीं मरा 'होरी', समाज में आज भी जिंदा हैं प्रेमचंद की कहानियों के कई किरदार

आज हम चांद तक पहुंच चुके हैं। समाज भी बहुत ज्यादा उदार हो चुका है। लेकिन क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि इस समाज में कोई 'निर्मला' नहीं है।

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मुंशी प्रेमचंद के अमर किरदार (AI Generated Image)
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 31, 2026, 12:19 IST
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तारीख 31 जुलाई 1880. जगह वाराणसी जिले का लमही गांव। सरकारी डाकघर में क्लर्क की नौकरी करने वाले अजायब राय और आनंदी देवी के घर बच्चे का जन्म हुआ। माता-पिता ने नाम रखा धनपत राय। कायस्थ परिवार में जन्मे धनपत राय को लिखने का हुनर ईश्वर ने दे कर भेजा था। जिस उम्र में बच्चे बड़ों से कहानियां सुनते वो उसी उम्र में खुद कहानियां लिखता। उसके लिखे से कभी अंग्रेज भी असहज हो जाते थे। लिखने पर पाबंदी लगा दी। धनपत राय ने नाम बदलकर लिखना शुरू किया। आज उसी धनपर राय को दुनिया प्रेमचंद के नाम से जानती है।

प्रेमचंद आज भी हिंदी साहित्य के सम्राट हैं। उनके लिखे में भारत का असली समाज दिखाई देता है। उन्होंने हमेशा किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और गरीबों को अपनी कहानी का नायक बनाया। उनकी कहानी के किरदार आम तो थे लेकिन साधारण कहीं से नहीं थे। तभी तो आप प्रेमचंद का कोई भी उपन्यास उठाकर पढ़ लें। कहानियां खत्म हो जाएंगी, लेकिन उसके किरदार आपके जेहन में रह जाएंगे। किसी भी अच्छे लेखक की सबसे बड़ी काबिलियत यही होती है। वो कहानी गढ़ता नहीं है, कहानी सुनाता है।

करीब सौ साल पहले प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जिन गांवों के किस्से सुनाए वो गांव आज पूरी तरह बदल चुके हैं। समाज बदल चुका है। शहर बदल गए हैं। तकनीकें भी बदल गईं। लेकिन दशकों बाद भी प्रेमचंद की कहानियों के कुछ किरदार हमारे आसपास दिखाई देते हैं। प्रेमचंद की कलम और कल्पना से निकले ये अमर किरदार कभी हमें पड़ोस में, कभी समाज में, कभी राजनीति में तो कभी अपने ही घर में नजर आ जाते हैं।

अधूरे सपने के साथ मर जाने वाला होरी महतो

प्रेमचंद की गोदान का होरी महतो उस दौर के ज्यादातर किसानों का चेहरा था। उसका सपना गाय खरीदने का था। गरीबी, कर्ज, सामाजिक दबाव और शोषण उसे कभी इस सपने तक नहीं पहुंचने देते। होरी मुश्किल समय में भी ईमानदारी और परिवार को बचाए रखने की कोशिश करता । वह विद्रोह की जगह संघर्ष करता रहा। अधूरे सपने के साथ उसकी मौत हो जाती है।

आज भी हमारे समाज में ऐसे कई होरी महतो दिख जाएंगे। अपने सपनों का पीछे करते हुए। उन सपनों के लिए संघर्ष करते हुए। अपने सपनों का गला घुटते देख आज भी कई होरी महतो फांसी के फंदे पर लटके मिल जाते हैं। आज भी होरी बहुत से परिवारों में जिंदा है।

परिवार की रीढ़ धनिया

गोदान में ही होरी का पत्नी का नाम धनिया था। वह परिवार की सबसे मजबूत कड़ी थी। धनिया निडर थी, व्यावहारिक थी और मुश्किल हालात में भी परिवार को संभाले रखती थी। जहां होरी सामाजिक दबावों के आगे झुक जाता, वहीं धनिया अन्याय का खुलकर विरोध करती। गरीबी, अभाव और संघर्ष के बीच भी उसका आत्मसम्मान कभी नहीं टूटता।

आज भी भारतीय घरों में ऐसी लाखों महिलाएं हैं, जो परिवार की रीढ़ होती हैं। समाज या परिवार उन्हें शायद उतनी अहमियत न दे, लेकिन वे अच्छी तरह जानते हैं कि उसके बिना घर खड़ा नहीं रह सकता।

चरम गरीबी के कारण संवेदनाएं खो चुके घीसू और माधव

प्रेमचंद की कफन में घीसू और माधव पिता-पुत्र हैं। माधव की पत्नी बुधिया प्रसव पीड़ा से तड़पती हुई मर जाती है। दोनों उसके अंतिम संस्कार के लिए मिले चंदे के पैसों से कफन खरीदने के बजाय शराब और खाने पर खर्च कर देते हैं। प्रेमचंद ने घीसू और माधव को उस व्यवस्था के तौर पर दिखाया था, जहां लगातार अभाव इंसान की संवेदनाओं को भी कुंद कर देता है।

आप सोचकर देखिए कि क्या आज भी ऐसे लोग हमारे आसपास नहीं हैं, जो अभाव और गरीबी के जाल में ऐसे उलझते हैं कि उनके लिए रिश्ते-नाते सब बेईमानी लगता हैं। अपने सिवा वो किसी और के लिए नहीं सोच पाते। आज भी बड़ी तादाद में ऐसे घीसू और माधव हैं जो इस सभ्य समाज पर दाग की तरह मौजूद हैं।

बचपन खो चुका हामिद

आपने अगर प्रेमचंद की ईदगाह पढ़ी होगी तो हामिद जरूर याद होगा। आज किसी भी गली नुक्कड़ पर आप निकल जाएं आपको कोई ना कोई 'छोटू' मिल जाएगा। कहीं चाय नाश्ता परोसते हुए तो कहीं जूठे बर्तन मांजते हुए। प्रेमचंद के ईदगाह का हामिद भी कुछ ऐसा ही था। गरीबी ने उसे समय से पहले समझदार और जिम्मेदार बना दिया था। ईद के मेले में जहां दूसरे बच्चे खिलौने और मिठाइयां खरीद रहे थे तो वहीं हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना के लिए चिमटा खरीदता है, ताकि रोटी बनाते समय उनके हाथ न जलें।

आज भी जिंदा हैं प्रेमचंद के कलम से जन्मे कई किरदार

आज भी जिंदा हैं प्रेमचंद के कलम से जन्मे कई किरदार

सत्ता और न्याय के बीच खड़ा जुम्मन शेख

याद कीजिए मुंशी प्रेमचंद के पंच परमेश्वर के जुम्मन शेख नाम का किरदार। पढ़ने वालों को वह एक ही वक्त में नायक और खलनायक दोनों लग सकता है। जब वह पंच बनता है तो अपनी बूढ़ी खाला के साथ बड़ा अन्याय करता है। फिर हालात बदलते हैं। उसका दोस्त पंच बन जाता है। अब उसे एहसास होता है कि न्याय क्या है और अन्याय क्या है।

जुम्मन बुरा इंसान नहीं है। लेकिन जब तक उसके पास अधिकार है, वह उसका दुरुपयोग करता है। फिर जब वही जिम्मेदारी उसके दोस्त के पास आती है, तो उसे न्याय का महत्व समझ में आता है। पंच परमेश्वर का वह जुम्मन शेख आज भी हर उस शख्स का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे अधिकार मिलने के बाद यह तय करना होता है कि वह पक्षपात करेगा या न्याय। सत्ता ही इंसान की असली परीक्षा लेती है। इन हालातों से हम आज भी रोज रूबरू होते हैं।

स्त्री समाज की त्रासदी का नाम है निर्मला

मुंशी प्रेमचंद के अमर किरदारों की बात तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक उसमें निर्मला का जिक्र ना आए। उपन्यास निर्मला की नायिका उस सामाजिक व्यवस्था का चेहरा है, जहां लड़कियों की इच्छा सबसे आखिरी पायदान पर होती। छोटी उम्र में निर्मला की शादी उससे काफी उम्रदराज शख्स से कर दी जाती है। उसके लिए ये शादी कम त्रासदी ज्यादा थी। फिर भी हर हाल में वो अपने सारे फर्ज पूरे करती है। बावजूद उसे कभी वह सम्मान और विश्वास नहीं मिलता, जिसकी वह हकदार थी।

आज हम चांद तक पहुंच चुके हैं। समाज भी बहुत ज्यादा उदार हो चुका है। लेकिन क्या हम ईमानदारी से कह सकते हैं कि इस समाज में कोई निर्मला नहीं है। हम अपने ही घर परिवार में झांक कर देखें तो कोई ना कोई निर्मला जरूर दिख जाएगी। आज भी लड़किया परिवार की प्रतिष्ठा और दबाव के चलते अपनी इच्छा का कत्ल कर निर्मला के भेष में जिंदा लाश बनी दिख जाती हैं।

..तो इसलिए अमर हो गए प्रेमचंद की कलम से निकले किरदार

प्रेमचंद ने शायद ही कभी अपने किरदारों को किसी आदर्श दुनिया का दिखाया हो। उन्होंने उन्हें उसी समाज से उठाया, जिसमें गरीबी थी, लालच था, अन्याय था, प्रेम था, स्वाभिमान था और उलझे रिश्ते भी थे। उन्होंने इंसान की कमजोरियों को भी उतनी ही ईमानदारी से लिखा, जितनी उसकी अच्छाइयों को। इसलिए उनके पात्र एक रंग के नहीं हैं। वे पूरी तरह अच्छे भी नहीं और पूरी तरह बुरे भी नहीं। वे बिल्कुल हमारी तरह हैं।

प्रेमचंद ने कभी समाज को दूर खड़े होकर नहीं देखा। उसके बीच रहे उसको जीकर देखा। वह लिखते थे क्योंकि वो समाज को समझते थे। उन्हें पता था कि भले पढ़ने-लिखने वाले बदल जाए लेकिन समाज की कुछ जटिलताएं कभी नहीं बदलेंगी। आज भी हमारा समाज काम, क्रोध, लोभ, मोह, गरीबी, असमानता और लाचारी से भरा हुआ है। इसी कारण प्रेमचंद के पात्र हर दौर में दिखते रहे। बस उनके नाम और पते बदल गए।

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