Passenger Parenting: जब बच्चे इस दुनिया में आते हैं और जीवन की गाड़ी में सवार होते हैं तो उनके माता-पिता उनके सबसे पहले सहयात्री होते हैं। बच्चों के शुरुआती सफर में कुछ पेरेंट्स ड्राइवर बनकर रास्ता दिखाते हैं, तो कुछ बच्चों को स्टीयरिंग थमा बगल की सीट पर बैठ जाते हैं। पेरेंटिंग के इसी दूसरे स्टाइल को इंटरनेट की भाषा में पैसेंजर पेरेंटिंग कहा जाता है। मतलब कि पैसेंजर पेरेंट्स वो माता-पिता होते हैं जो बच्चों के जीवन सफर में साथ तो होते हैं, लेकिन ना स्टीयरिंग संभालते हैं, ना ही संकेत देते हैं।
Passenger Parenting क्या है?
क्या है पैसेंजर पेरेंटिंग? (What is Passenger Parenting)
यह पेरेंटिंग की वह स्टाइल है जिसमें पेरेंट्स बच्चों को पूरी आजादी तो देते हैं, लेकिन खुद एक गाइड के किरदार में होते हैं। वे बच्चों के निर्णयों में दखल नहीं देते, सीमाओं की रेखा नहीं खींचते और भावनात्मक रूप से भी थोड़े दूर रहते हैं। यह लिबरल अप्रोच कई बार बच्चे के आत्मनिर्भर बनने और उसके मल्टी-डाइमेंशन डेवलपमेंट में मदद करती है। लेकिन हर आज़ादी की तरह यह भी एक तरह का संतुलन मांगती है।
What is Passenger Parenting?
पैसेंजर पेरेंटिंग के फायदे (Benefits of Passenger Parenting)
पैसेंजर पेरेंटिंग इन दिनों खूब चलन में है। पेरेंट्स बच्चों की परवरिश के लिए पेरेंटिंग का यह स्टाइल चुन रहे हैं। वो ऐसा क्यों कर रहे हैं इसे समझने के लिए जरूरी है पैसेंजर पेरेंटिक के फायदों को जानना:
आत्मनिर्भरता: पेरेंटिंग के इस स्टाइल का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इससे बच्चे आत्मनिर्भर बनते हैं। बच्चे खुद फैसले लेना सीखते हैं।
रचनात्मकता: पैसेंजर पेरेंटिंग में बच्चों के सामने किसी तरह की सीमा न होने पर उनकी सोच खुलती है। उन्हें कुछ नया करने की आज़ादी भी मिलती है।
अनायास तनाव से दूरी: इस तरह के पेरेंटिंग स्टाइल की खासियत ये भी है कि ये बच्चे पर परफेक्ट बनने का दबाव नहीं डालती। इससे बच्चे अनायास के तनाव से दूर रहते हैं।
पैसेंजर पेरेंटिग के नुकसान (Side Effects of Passenger Parenting):
जैसे सिक्के के दो पहलू होते हैं, उसी तरह से पैसेंजर पेरेंटिंग के भी फायदे औऱ नुकसान दोनों हैं। आइए डालते हैं पैसेंजर पेरेंटिंग से होने वाले संभावित नुकसानों पर एक नजर:
दिशाहीनता: बच्चों के फैसलों पर अगर ध्यान ना दिया जाए को कई बार बच्चे सही-गलत की समझ के बिना भटक सकते हैं। उन्हें दिशा दिखाना जरूरी होता है।
भावनात्मक दूरी: पैसेंजर पेरेंटिंग में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम होता है। यह कई बार बच्चों और पेरेंट्स के बीच भावनात्मक दूरी को जन्म देता है।
Benefits of Passenger Parenting
सुरक्षा की कमी: कई बच्चे ये भी सोचते हैं कि उनके साथ कोई नहीं है। ऐसे बच्चे सुरक्षा की कमी महसूस करते हैं। बच्चों को यह आभास नहीं रहता कि कोई उन्हें संभालने वाला है।
अनुशासनहीनता: पैसेंजर पेरेंटिंग का सबसे बड़ा संभावित नुकसान ये हो सकता है कि खुली छूट और बिना किसी बंदिश के परवरिश उनमें अनुशासनहीनता को जन्म देती है।
कैसे करें सही पैसेंजर पेरेंटिंग?
पैसेंजर पेरेंटिंग का सही तरीका है कि बच्चों को दिशा दें, दखल नहीं। भले आप बच्चों के फैसलों में दखल ना दें लेकिन उनसे बातचीत करते रहें। उन्हें इशारों या उदाहरण से बताएं कि क्या गलत है और क्या सही। आप उन्हें राय दीजिए, थोपिये नहीं। पैसेंजर पेरेंटिंग में भी कुछ सीमाएं तय होनी चाहिए। बच्चों को यह पता होना चाहिए कि उन्हें क्या नहीं करना है। इस पैरेंटिंग स्टाइल में पेरेंट्स बच्चों के साथ तो होते हैं लेकिन सिर्फ शारीरिक तौर पर। ऐसा नहीं करना है। उन्हें तन के साथ ही मन और आत्मा से भी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
How to do Passenger Parenting
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स
इंटरनेट पर उपलब्ध तमाम पेरेंटिंग एक्सपर्ट्स की राय का निचोड़ निकाला जाए तो यह कहा जा सकता है कि पैसेंजर पेरेंटिंग एक ऐसी नाव है जिसमें पाल तो खुले होते हैं पर पतवार नहीं। अगर हवा सही हो तो मंजिल मिल सकती है, लेकिन अगर वक्त की लहरें तेज हों तो बच्चे दिशाहीन भी हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता सिर्फ साथ न बैठें, बल्कि साथ निभाएं। कभी सलाह से, कभी प्यार से और कभी एक चुप्पी में भी भरोसे के साथ।
