Passenger Parenting: साथ होकर भी साथ नहीं होते पेरेंट्स, बच्चे खुद चुनते हैं रास्ता, खूब चलन में है पैसेंजर पेरेंटिंग

Passenger Parenting: पैसेंजर पेरेंटिंग इन दिनों खूब चलन में है। दरअसल यह एक ऐसी नाव है जिसमें पाल तो खुले होते हैं पर पतवार नहीं। अगर हवा सही हो तो मंजिल मिल सकती है, लेकिन अगर वक्त की लहरें तेज हों तो बच्चे दिशाहीन भी हो सकते हैं।

Passenger Parenting: जब बच्चे इस दुनिया में आते हैं और जीवन की गाड़ी में सवार होते हैं तो उनके माता-पिता उनके सबसे पहले सहयात्री होते हैं। बच्चों के शुरुआती सफर में कुछ पेरेंट्स ड्राइवर बनकर रास्ता दिखाते हैं, तो कुछ बच्चों को स्टीयरिंग थमा बगल की सीट पर बैठ जाते हैं। पेरेंटिंग के इसी दूसरे स्टाइल को इंटरनेट की भाषा में पैसेंजर पेरेंटिंग कहा जाता है। मतलब कि पैसेंजर पेरेंट्स वो माता-पिता होते हैं जो बच्चों के जीवन सफर में साथ तो होते हैं, लेकिन ना स्टीयरिंग संभालते हैं, ना ही संकेत देते हैं।

​Passenger Parenting

Passenger Parenting क्या है?

क्या है पैसेंजर पेरेंटिंग? (What is Passenger Parenting)

यह पेरेंटिंग की वह स्टाइल है जिसमें पेरेंट्स बच्चों को पूरी आजादी तो देते हैं, लेकिन खुद एक गाइड के किरदार में होते हैं। वे बच्चों के निर्णयों में दखल नहीं देते, सीमाओं की रेखा नहीं खींचते और भावनात्मक रूप से भी थोड़े दूर रहते हैं। यह लिबरल अप्रोच कई बार बच्चे के आत्मनिर्भर बनने और उसके मल्टी-डाइमेंशन डेवलपमेंट में मदद करती है। लेकिन हर आज़ादी की तरह यह भी एक तरह का संतुलन मांगती है।

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