New Face of Dowry: दीपिका नागर, अनु मीणा, पलक रजक .. इन बेटियों के दहलाने वाले केस के बहाने दहेज एक बार फिर चर्चा में है। वैसे कभी दहेज की पहचान बहुत आसान हुआ करती थी। शादी से पहले लड़के वालों की तरफ से मांगों की एक साफ लिस्ट सामने रख दी जाती थी। कहीं कार चाहिए होती थी, कहीं लाखों रुपये, कहीं फर्नीचर और गहनों का हिसाब तय होता था। लड़की वालों को पता होता था कि उन पर दहेज का दबाव है। समाज भी इसे गलत मानते हुए पहचान लेता था।
लेकिन नए जमाने के सभी ससुराल वाले इसी तरह अब दहेज नहीं मांगते। उसका तरीका बदल गया है। उसकी भाषा बदल गई है।
आज का दहेज उतना सीधा दिखाई नहीं देता। वह रिश्तों, जिम्मेदारियों, सहयोग और ‘पार्टनरशिप’ की भाषा में घरों के भीतर दाखिल होता है। कई बार लड़की को खुद भी देर से समझ आता है कि वह शादी नहीं, बल्कि एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था निभा रही है जिसमें उसकी कमाई, उसका त्याग और उसकी मानसिक शांति धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
सपोर्ट के रूप में आती है 'डिमांड'
अब कोई खुलकर नहीं कहता कि ‘हमें दहेज चाहिए।’
अब कहा जाता है- ‘थोड़ी मदद कर दो…’
‘अब ये घर तुम्हारा भी है…’
‘अगर तुम साथ दोगी तो लोन जल्दी खत्म हो जाएगा…’
सुनने में ये बातें सामान्य लगती हैं। रिश्तों में सहयोग जरूरी भी होता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह सहयोग बराबरी का न रहकर एकतरफा जिम्मेदारी बन जाता है।
शादी के बाद खुलती हैं 'डिमांड्स'
शादी के बाद शुरू होती है असली ‘पेमेंट’
आज कई शादियों में दहेज शादी वाले दिन खत्म नहीं होता, बल्कि वहीं से शुरू होता है। कहीं नई बहू से पति की एजुकेशन लोन की EMI भरवाई जा रही है। कहीं MBA या विदेश की पढ़ाई में खर्च हुए पैसों को धीरे-धीरे ‘रिकवर’ करने की उम्मीद रखी जाती है। कई घरों में लड़की की पहली सैलरी आते ही उसके पैसों का इस्तेमाल तय कर दिया जाता है।
Indirect Dowry में घर की किस्त, कार की EMI, बिजनेस में निवेश, छोटे भाई की फीस, ननद की शादी में मदद, सास-ससुर की बीमारी का खर्च, परिवार के खर्चे आदि धीरे-धीरे सब उसकी जिम्मेदारियों में शामिल कर दिए जाते हैं।
और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसे गलत भी नहीं माना जाता। सामाजिक मामलों के जानकार डॉ. अंबरीष सक्सेना (प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ आर्टस एंड डिजाइन, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी) कहते हैं कि ये पूरा खेल बड़ी समझदारी से चलता है। यहां उल्टा लड़की को यह एहसास कराया जाता है कि अगर वह इन सबमें सहयोग नहीं करेगी तो वह ‘अच्छी पत्नी’ या ‘अच्छी बहू’ नहीं कहलाएगी। रिश्तों की भावनात्मक भाषा में ऐसा दबाव बनाया जाता है कि कई महिलाएं खुद को मना भी नहीं कर पातीं।
आधुनिक दिखने वाले समाज की पुरानी सोच
यह समस्या सिर्फ छोटे शहरों या कम पढ़े-लिखे परिवारों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों, कॉरपोरेट नौकरियों और हाई-प्रोफाइल लाइफस्टाइल वाले घरों में भी दहेज की मानसिकता जिंदा है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उसका तरीका आधुनिक हो गया है।
एक बड़ी आईटी कंपनी में जॉब करने वाली इनाया ठाकुर ने हमसे वाकया शेयर किया कि उनकी लव मैरिज अच्छे लेन देन के साथ हुई थी। लेकिन चार साल के रिश्ते में भी वह अपने पति को फ्लैट के किराये का आधा पैसा देती हैं। ग्रॉसरी खर्च उनकी सैलरी से निकलता है। इसके अलावा, दोनों तरफ की रिश्तेदारी का पूरा लेन-देन उनकी जिम्मेदारी है। इसके बावजूद उनकी सास उनसे हर महीने किसी न किसी बहाने 5 से 10 हजार रुपये निकलवाती हैं। ये हाल तब है- जब उन्होंने शादी से पहले कार पति के नाम खरीदी और 4 साल बाद भी उसकी सारी EMI वही भर रही हैं।
इनाया का मामला एक छोटा सा उदाहरण भर है जो शादी में लड़के वालों की मन की बात सामने लेकर आ रहा है।
सोशियॉलजी की प्रफेसर डॉ. रीना शर्मा कहती हैं कि अब वैसे शादी में अब कोई खुलकर मांग नहीं रखता। कहा यही जाता है कि हमें कुछ नहीं चाहिए। आप अपनी बेटी का देख लें। लेकिन इसी के साथ कुछ बातें घुमाकर भी कही जाती हैं, जैसे
‘हमने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचाने में बहुत खर्च किया है…’
‘दोनों मिलकर संभाल लेंगे…’
‘आजकल पार्टनरशिप ऐसे ही चलती है…’
लेकिन यह पार्टनरशिप कई बार बराबरी वाली नहीं होती क्योंकि आर्थिक दबाव और त्याग ज्यादातर एक ही तरफ से आता है। आज भी समाज के एक बड़े हिस्से में लड़के की डिग्री, नौकरी और पैकेज को उसकी ‘मार्केट वैल्यू’ की तरह देखा जाता है। जितनी बड़ी नौकरी, उतनी बड़ी उम्मीदें। बस अब उन उम्मीदों का तरीका बदल गया है।
क्या ये जिम्मेदारी ही तय करती है अच्छी बहू का पैमाना!
लड़की की नौकरी को क्यों मान लिया जाता है परिवार की कमाई
हमारे समाज में शादी के बाद लड़की की पहचान अचानक बदल जाती है। उसकी नौकरी, उसकी सैलरी और उसकी मेहनत को अक्सर उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि ससुराल की ‘संपत्ति’ की तरह देखा जाने लगता है। शादी से पहले ही अक्सर दबी जुबां में यह तय हो जाता है कि लड़की अपनी सैलरी मायके में नहीं देगी।
या वैसे ही ये अघोषित तरीके से तय हो जाता है कि अगर वह कमाती है, तो उसकी आय अब ससुराल पक्ष के पूरे घर की जरूरतें पूरी करने के लिए है। लेकिन वही अधिकार उसे अपने फैसलों में नहीं मिलता।
वह अपनी पसंद से पैसे खर्च करे, अपने माता-पिता की मदद करे या अपनी सेविंग बनाए- आज भी अधिकतर घरों में यह आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। यहीं से समस्या गहरी होने लगती है।
धीरे-धीरे लड़की खुद को ऐसे रिश्ते में फंसा हुआ महसूस करने लगती है, जहां प्यार से ज्यादा उसकी आर्थिक उपयोगिता मायने रखने लगती है। कई महिलाएं बाहर से सामान्य दिखती हैं, लेकिन अंदर ही अंदर लगातार आर्थिक और भावनात्मक दबाव झेल रही होती हैं।
इन बातों से लड़की इमोशनल दबाव में पिसती है
भावनात्मक दबाव सबसे खतरनाक होता है
आज का दहेज हमेशा धमकी, हिंसा या मारपीट के रूप में सामने नहीं आता। कई बार वह भावनात्मक दबाव की शक्ल में आता है। भले ही ससुराल वाले लड़की के ऑफिस से आने के बाद उसे एक गिलास पानी तक ना पूछें लेकिन इमोशनल ब्लैकमेल पूरा होता है, जैसे कि
‘तुम इतना भी नहीं कर सकती?’
‘हमने तुम्हें बेटी माना…’
‘घर की जिम्मेदारियां मिलकर उठानी पड़ती हैं…’
साइकॉलजिस्ट युक्ति सक्सेना का मानना है कि इससे महिलाओं पर दोहरी मानसिक मार पड़ती है। ऐसी बातें सुन-सुनकर कई महिलाएं अपराधबोध में जीने लगती हैं। उन्हें लगने लगता है कि शायद वही रिश्ते निभाने में कमी कर रही हैं। यहीं से मानसिक थकान शुरू होती है।
धीरे-धीरे महिला अपनी जरूरतों, इच्छाओं और आर्थिक स्वतंत्रता को पीछे छोड़ देती है। कई बार वह सिर्फ इसलिए चुप रहती है क्योंकि उसे लगता है कि हर शादी में ऐसा ही होता होगा।
कानून से बचने का नया रास्ता बन गया है ‘भावनात्मक दहेज’
आज दहेज की यह नई व्यवस्था कानून से बच निकलने का एक आसान तरीका भी बनती जा रही है। गाजियाबाद के एक कॉलेज की एक्स प्रिंसिपल कमलेश जी का कहना है कि पहले जब सीधी मांगें होती थीं, तब उन्हें साबित करना आसान था। लेकिन अब आर्थिक दबाव को ‘म्यूचुअल सपोर्ट’ और ‘फैमिली हेल्प’ का नाम दे दिया जाता है। इससे बहू का पैसा भी मिल जाता है और दहेज मांगने को लेकर कानून का खतरा भी टल जाता है।
इस बात को ऐसे समझें कि अगर कोई ससुराल खुलकर पैसे नहीं मांगता, लेकिन लगातार यह उम्मीद बनाए रखता है कि बहू घर की EMI भरे, पति का लोन चुकाए या परिवार के बड़े खर्च उठाए तो इसे साबित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। क्योंकि बाहर से यह सब सहमति जैसा दिखाई देता है।
यही वजह है कि कई महिलाएं शिकायत तक नहीं कर पातीं। उन्हें खुद भी समझ नहीं आता कि वे रिश्ते निभा रही हैं या आर्थिक शोषण का हिस्सा बन चुकी हैं। आधुनिक दहेज का सबसे खतरनाक रूप यही है। इसमें चोट शरीर पर नहीं, मानसिक संतुलन और आत्मसम्मान पर होती है।
समाज को दहेज की नई परिभाषा समझनी होगी
समस्या सिर्फ नकद या गाड़ी की मांग नहीं है। समस्या वह सोच है जिसमें शादी को बराबरी का रिश्ता नहीं, बल्कि फायदे का सौदा मान लिया जाता है।
अगर किसी लड़की से यह उम्मीद की जाए कि वह शादी के बाद पति और उसके परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां बिना सवाल उठाए निभाती रहे, तो यह भी दहेज की मानसिकता ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसे आधुनिक रिश्तों की भाषा में छिपा दिया गया है।
जब त्याग सिर्फ एक तरफ से आने लगे, जब आर्थिक योगदान को प्रेम का प्रमाण बना दिया जाए और जब लड़की की कमाई को अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी मान लिया जाए- तब समझ लेना चाहिए कि दहेज अभी खत्म नहीं हुआ है।
शादी सौदा नहीं रिश्ता है... इसी सोच से आएगा फर्क
भविष्य का समाधान सिर्फ कानून नहीं, सोच में बदलाव है
दहेज की इस बदलती तस्वीर से लड़ने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं होगा। समाज को रिश्तों और आर्थिक बराबरी की नई समझ विकसित करनी होगी।
सबसे पहले जरूरत है कि शादी को ‘इन्वेस्टमेंट रिकवरी मॉडल’ की तरह देखना बंद किया जाए। बेटे की पढ़ाई, नौकरी या विदेश की डिग्री पर खर्च किया गया पैसा किसी लड़की से वसूलने की चीज नहीं है। शादी साझेदारी है, भुगतान व्यवस्था नहीं।
परिवारों को यह समझना होगा कि लड़की की कमाई उसका अधिकार है, उसकी जिम्मेदारी नहीं। अगर वह घर चलाने में सहयोग करती है तो वह प्रेम और बराबरी के आधार पर होना चाहिए, सामाजिक दबाव में नहीं।
उसे अपने माता-पिता की मदद करने, अपनी सेविंग रखने और अपने आर्थिक फैसले लेने की बराबर आजादी मिलनी चाहिए। इसके साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में रिश्तों, आर्थिक सम्मान और वैवाहिक समानता पर बातचीत शुरू होनी चाहिए। आज बच्चों को करियर बनाना सिखाया जाता है, लेकिन बराबरी वाला रिश्ता निभाना नहीं सिखाया जाता।
और सबसे जरूरी बात- मां-बाप को बेटियों को यह भरोसा देना होगा कि शादी कोई ऐसी जगह नहीं जहां हर हाल में सहना ही पड़े। अगर किसी रिश्ते में सम्मान खत्म हो जाए और आर्थिक या मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जाए, तो सवाल उठाना गलत नहीं है।
जिस दिन समाज ‘अच्छी बहू’ की परिभाषा बदल देगा और त्याग की जगह बराबरी को महत्व देना शुरू कर देगा, उसी दिन दहेज सच में कमजोर पड़ना शुरू होगा। क्योंकि सच यही है कि दहेज खत्म नहीं हुआ। उसने बस अपना चेहरा बदल लिया है।
