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Kerala Pulikali: पेट पर बाघ बनाकर क्यों नाचते हैं लोग? 200 साल पुरानी इस परंपरा की कहानी है बेहद दिलचस्प

केरल का पुलिकली कोई साधारण डांस नहीं, बल्कि ऐसा लोक उत्सव है जिसमें कलाकार शरीर पर बाघ की पेंटिंग बनाकर ढोल की धुन पर सड़क पर उतरते हैं। ओणम के चौथे दिन त्रिशूर में इसका रंग सबसे ज्यादा दिखता है।

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पेट पर बाघ बनाकर ओणम में क्यों नाचते हैं केरल के लोग

Onam Tiger Dance, Kerala Pulikali History: सोचिए, आप गॉड्स ओन कंट्री के नाम से मशहूर केरल की सड़क पर घूम रहे हैं और अचानक सामने से बाघों की पूरी टोली ढोल की तेज आवाज के साथ आपकी तरफ आती दिखे। डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ये असली बाघ नहीं, बल्कि पुलिकली के कलाकार हैं। यहां इंसान ही कुछ घंटों के लिए बाघ बन जाते हैं और फिर सड़क को अपना डांस फ्लोर बना लेते हैं।

200 साल पुराना टाइगर डांस

200 साल पुराना टाइगर डांस

शरीर पर पीले, लाल और काले रंग की धारियां, चेहरे पर बाघ जैसा मेकअप, कमर में घंटियां और सामने जोरदार ढोल, पुलिकली का नजारा किसी फिल्म के सीन से कम नहीं लगता। केरल की इस लोक कला की सबसे खास पहचान त्रिशूर है, जहां इसकी परंपरा करीब 200 साल पुरानी मानी जाती है। यह सिर्फ देखने में मजेदार उत्सव नहीं है, इसके पीछे कलाकारों की मेहनत, ट्रेनिंग, लोकल इतिहास और ओणम की खुशी भी जुड़ी है।

आखिर पुलिकली है क्या?

‘पुलिकली’ का सीधा अर्थ समझें तो यह बाघों का खेल या बाघ नृत्य है। इसे कुछ जगहों पर कडुवकली भी कहा जाता है। यह केरल की पारंपरिक लोक कला है, जिसमें ट्रेन्ड कलाकार बाघ या चीते का रूप धारण करके नाचते हैं।

इसमें कोई मंच और पर्दा जरूरी नहीं होता है। शहर की सड़कें ही मंच बन जाती हैं और आसपास खड़ी भीड़ दर्शक। कलाकार ढोल की लय पर बाघ की तरह चलते, उछलते और अलग-अलग हावभावों का प्रदर्शन करते हैं। प्रदर्शन का पारंपरिक विषय बाघ और शिकारी के बीच का खेल भी होता है।

पेट पर बाघ बनाना इतना आसान नहीं

पुलिकली को देखकर पहली नजर में लग सकता है कि कलाकार ने बस कुछ रंग शरीर पर लगा लिए और तैयार हो गया। असल में कहानी इतनी आसान नहीं है। कलाकारों के शरीर पर बाघ या चीते जैसा पैटर्न बनाने में काफी समय लगता है। पीले, काले और लाल जैसे रंगों से धारियां और पैटर्न तैयार किए जाते हैं। कुछ कलाकारों के लिए मास्क भी इस्तेमाल किए जाते हैं। यह पूरा मेकअप घंटों का इंतजार और क्रिएटिविटी मांगता है।

पेट पर बाघ बनाना इतना आसान नहीं

पेट पर बाघ बनाना इतना आसान नहीं

और मजेदार बात? पुलिकली में कलाकारों का पेट भी डिजाइन का हिस्सा बन जाता है। इसलिए जब वे ढोल की ताल पर शरीर और पेट को हिलाते हुए डांस करते हैं, तो ऐसा प्रतित होता है, मानो असली का बाघ की ढोल की लय पर थिरक रहा हो। इसे आप ‘बेली डांस’ का अपना देसी और टाइगर वाला वर्जन भी समझ सकते हैं।

200 साल पुरानी है ये कहानी

केरल के त्रिशूर की पुलिकली परंपरा को करीब 200 साल पुराना माना जाता है। इसके इतिहास को कोचीन के महाराजा राम वर्मा शक्तन थंपुरान के दौर से जोड़ा जाता है। केरल टूरिज्म के अनुसार, त्रिशूर का पुलिकली इस लोक कला का सबसे पुराना और लोकप्रिय रूप माना जाता है।

शाही गलियों से है पुलिकली का ताल्लुक

शाही गलियों से है पुलिकली का ताल्लुक

समय के साथ यह राजसी दौर से निकलकर अलग-अलग स्थानीय समुदायों और कलाकारों के साथ मिला। आज पुलिकली त्रिशूर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है।यही इसकी खूबसूरती है, इतने साल बाद भी यह किसी म्युजियम में बंद ट्रेडिशन नहीं, बल्कि सड़क पर लोगों के बीच जिंदा आर्ट का हिस्सा है।

ओणम में कब होता है पुलिकली?

पुलिकली मुख्य रूप से ओणम के चौथे दिन, यानी नालाम ओणम पर त्रिशूर में किया जाता है। 2026 के लिए केरल पर्यटन के कैलेंडर में पुलिकली की तारीख 29 अगस्त 2026 दी गई है और आयोजन स्थल स्वराज राउंड, त्रिशूर है। यानी ओणम की खुशियों के बीच कुछ ही दिनों बाद त्रिशूर की सड़कों पर बाघों की यह अनोखी टोली नजर आएगी।

पुलिकली में सिर्फ डांस नहीं, पूरा माहौल होता है

पुलिकली का मजा सिर्फ कलाकारों को देखने में नहीं है। इसके साथ पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जोरदार आवाज माहौल को पूरी तरह बदल देती है। चेंडा, तकिल और उडुक्कु जैसे इंस्ट्रुमेंट्स की लय पर कलाकार अपने कदम मिलाते हैं। त्रिशूर में खास पुलिमेलम की लय भी इस प्रदर्शन से जुड़ी है। कमर में बंधी घंटियों की आवाज और ढोल की ताल मिलकर ऐसा माहौल बनाती है कि दर्शक खुद तालियां बजाने और लय में झूमने लगते हैं।

अगर पुलिकली देखना है तो कहां जाएं?

अगर आप इसे अपने सामने देखना चाहते हैं, तो त्रिशूर का Swaraj Round सबसे खास जगह है। यहीं ओणम के चौथे दिन अलग-अलग पुलिकली समूह जुटते हैं और प्रदर्शन करते हैं। केरल पर्यटन के अनुसार, त्रिशूर का आयोजन इस कला का सबसे प्रसिद्ध रूप है। त्रिशूर रेलवे स्टेशन से आयोजन स्थल लगभग 1 किलोमीटर दूर बताया गया है। नजदीकी बड़ा हवाई अड्डा कोच्चि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो त्रिशूर से करीब 58 किलोमीटर दूर है।

अगर आप 2026 में इसे एक्सप्लोर करने का प्लान बना रहे हैं, तो 29 अगस्त के आसपास त्रिशूर पहुंचना दिलचस्प रहेगा। लेकिन सिर्फ कार्यक्रम देखकर वापस न लौटें। आसपास के ओणम समारोह, पारंपरिक खाना, पुक्कलम और स्थानीय संस्कृति को भी अनुभव करें। इस साल केरल पर्यटन 24 से 30 अगस्त तक ओणम टूरिज्म वीक भी आयोजित कर रहा है, जिसमें कई सांस्कृतिक अनुभव शामिल हैं।

Avni Bagrola
अवनी बागरोलाauthor

अवनी बागरोला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के लाइफस्टाइल सेक्शन में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। फैशन, ब्यूटी, ट्रेंड्स, पर्सनल स्टाइलिंग और मॉडर्न लाइफस्टाइल से जुड़े कंटेंट पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें जेन Z और स्टाइल-सेवी ऑडियंस के बीच खास पहचान दिलाती है। अवनी की लेखन शैली सरल, ट्रेंडी और यूज़र-फ्रेंडली है, जो पाठकों को तेजी से बदलते फैशन व लाइफस्टाइल ट्रेंड्स को समझने में मदद करती है। अब तक 3000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुकी अवनी क्रिएटिव अप्रोच, अपडेटेड नॉलेज और रियल-टाइम ट्रेंड सेंस के लिए जानी जाती हैं।

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