Kalbelia Dance: राजस्थान के किसी मेले, सांस्कृतिक उत्सव या पर्यटन स्थल पर काले घाघरे में कमर लचकाती, बल खाती और तेजी से गोल-गोल घूमती नर्तकियां क्या आपको भी कुछ देर के लिए रोक लेती हैं? बीन की आवाज, ढोलक की थाप और हवा में फैलता काले घाघरे का बड़ा-सा घेरा- इस पूरे दृश्य में ऐसा आकर्षण है कि नजर हटाना मुश्किल हो जाता है।
अगर आपके साथ भी ऐसा होता है तो आप भी मेरी तरह कालबेलिया नृत्य के प्रशंसक हैं। हो सकता है कि आपने इसे राजस्थान का ‘स्नेक डांस’ कहकर किसी मेले में देखा हो, किसी होटल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में इसका वीडियो बनाया हो या सोशल मीडिया पर नर्तकी की लचक देखकर हैरान हुए हों। लेकिन क्या कभी सोचा है कि रंगों के लिए मशहूर राजस्थान में इस नृत्य की पहचान काले घाघरे से क्यों बनी? इसकी चाल सांप जैसी क्यों है और सांपों के खेल से जुड़ी बीन आज लोकमंच की धुन कैसे बन गई?
इन सवालों के जवाब हमें नृत्य के मंच से पीछे, कालबेलिया समुदाय के जीवन तक ले जाते हैं।
कालबेलिया नृत्य नहीं, पहले एक समुदाय का नाम है
कालबेलिया को अक्सर केवल राजस्थान का एक लोकनृत्य समझ लिया जाता है, जबकि यह मूल रूप से एक घुमंतू समुदाय का नाम है। इसके लोगों को सपेरा, जोगी और जोगीरा जैसे नामों से भी जाना गया। वे स्थायी रूप से किसी एक गांव में रहने के बजाय अलग-अलग स्थानों पर अस्थायी डेरे लगाते और रोजी-रोटी की तलाश में घूमते थे।
राजस्थान की शान बना कालबेलिया नाच
कालबेलिया पुरुषों का पारंपरिक काम सांप पकड़ना, सांप का खेल दिखाना और घर या गांव में निकले सांप को सुरक्षित बाहर ले जाना था। उनके पास सांपों की प्रकृति, विष और स्थानीय जड़ी-बूटियों से जुड़ी जानकारी भी होती थी। बांस की पिटारी, बीन और सांप केवल उनके पेशे के साधन नहीं थे; इनके साथ उनकी पूरी सामाजिक पहचान जुड़ी थी।
ह्यूमन रिसर्चर मिरियम रॉबर्टसन ने अपनी पुस्तक Snake Charmers: The Jogi Nath Kalbelias of Rajasthan में इस समुदाय के घुमंतू जीवन, सांपों से जुड़े पेशे और सामाजिक संरचना का अध्ययन किया है। उनका काम बताता है कि सांप कालबेलिया जीवन में केवल लोगों का मनोरंजन करने का जरिया नहीं था। वह आजीविका, परंपरागत ज्ञान और समाज में इस समुदाय की उपयोगिता- तीनों से जुड़ा था।
यानी कालबेलिया को समझना है तो नर्तकी के काले घाघरे के पीछे खड़े उस समुदाय को भी देखना होगा जिसने लंबे समय तक सांपों के साथ रहते हुए अपना संसार बनाया।
क्या कालबेलिया सदियों से इसी रूप में नाचा जाता था
आम तौर पर कालबेलिया को सदियों पुराना नृत्य कहा जाता है। समुदाय में गीत, संगीत और उत्सवों के दौरान सहज नृत्य की परंपरा बेशक पुरानी है, लेकिन आज हम मंच पर जिस सजे-संवरे कालबेलिया नृत्य को देखते हैं, उसका स्वरूप अपेक्षाकृत नया माना जाता है।
कालबेलिया समुदाय और उसके नृत्य पर शोध करने वाली बेल्जियम की मानवविज्ञानी आयला जॉनशीर ने अपने शोध-पत्र Kalbeliya Dance from Rajasthan: Invented Gypsy Form or Traditional Snake Charmers’ Folk Dance? में इस पर विस्तार से बताया है। उनके अध्ययन के मुताबिक कालबेलिया का व्यवस्थित मंचीय रूप 1980 के दशक के आसपास उभरा। पर्यटन, सांस्कृतिक मेलों, सरकारी आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हुई परफॉर्मेंस ने आज इसे इस तरह लोकप्रिय बना दिया है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि कालबेलिया की परंपरा बनावटी है। इसका मतलब इतना है कि समुदाय के पुराने गीत-संगीत, सांपों से जुड़े जीवन और महिलाओं की सहज नृत्य-भंगिमाओं ने बदलते समय में एक नया मंचीय रूप धारण किया। लोक परंपराएं अक्सर इसी तरह बनती हैं। वे अपनी जड़ें अतीत में रखती हैं लेकिन समय के साथ उनका रूप बदलता रहता है।
सांप की चाल कैसे बनी नृत्य की भाषा
जब कालबेलिया पुरुष बीन बजाकर सांप का खेल दिखाते थे, तब समुदाय की महिलाएं गीत गातीं और संगीत पर सहज रूप से थिरकती थीं। इस नृत्य को किसी विद्यालय में सीखा नहीं गया, न इसकी कदमताल किताब में लिखी थी और न ही मुद्राओं का कोई कोर्स था। बच्चियां अपनी मां, मौसी और समुदाय की दूसरी महिलाओं को देखकर लय तथा शरीर का संतुलन सीखती थीं।
इस तरह धीरे-धीरे सांपों से जुड़ा जीवन नृत्य की भाषा बन गया। अगर आप गौर से देखेंगे तो कमर का बल खाना, गर्दन को लहराते हुए घुमाना, हाथों से फन जैसी आकृति बनाना और जमीन के करीब झुकते चले जाना- इन सभी मुद्राओं में सांप की गति का आभास मिलता है।
कालबेलिया की प्रस्तुति प्रायः धीमी धुन से शुरू होती है। नर्तकी छोटे और नियंत्रित कदम रखती है। फिर बीन, ढोलक और खंजरी की गति बढ़ती है तो उसके चक्कर भी तेज हो जाते हैं। कुछ ही क्षणों में काला घाघरा पूरी तरह फैल जाता है और नर्तकी इतनी तेजी से घूमती है कि दर्शकों को रंगीन किनारियों का गोल घेरा दिखाई देने लगता है।
कई कलाकार पीछे की ओर इतना झुक जाती हैं कि उनका सिर जमीन के करीब पहुंच जाता है। कुछ नर्तकियां आंखों की पलकों से अंगूठी या नोट उठाने जैसे करतब भी दिखाती हैं। देखने वाले को यह सहज लग सकता है, लेकिन इसके पीछे वर्षों का अभ्यास और शरीर पर असाधारण नियंत्रण होता है।
रंगों के राजस्थान में काला घाघरा क्यों
राजस्थान और काला रंग- पहली नजर में यह मेल थोड़ा चौंकाता है। जिस प्रदेश की पहचान लाल पगड़ी, पीली ओढ़नी और गुलाबी घाघरे से हो, वहां एक लोकनृत्य की पहचान काले लिबास से कैसे बन गई?
कालबेलिया नर्तकी के परिधान में आमतौर पर काला घेरदार घाघरा, अंगरखी या चोली और काली ओढ़नी शामिल होती है। लेकिन यह काला पहनावा उदास या बेरंग नहीं होता। उस पर लाल, गुलाबी, हरे, पीले और सफेद रंग की पट्टियां, गोट, कढ़ाई, छोटे शीशे तथा चांदी जैसे चमकते धागे लगाए जाते हैं।
दरअसल काले रंग को सामान्यतः सांप, विशेष रूप से काले नाग की देह से जोड़कर देखा जाता है। घाघरे पर बनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं और चांदी-सफेद रंग की कढ़ाई सांप की त्वचा पर बने निशानों की याद दिलाती है। नर्तकी जब घूमती है तो फैलता हुआ घाघरा कभी नाग के फन जैसा दिखता है, कभी रेगिस्तान में लहराती किसी रहस्यमय छाया की तरह।
शोधकर्ता राजेंद्र वसंत खैरनार ने कालबेलिया नृत्य के विकास पर प्रकाशित अपने अध्ययन में भी काले परिधान, उस पर बने सफेद या चांदी के पैटर्न और सांप की देह के बीच दिखाई देने वाले दृश्य संबंध का उल्लेख किया है।
हालांकि काले रंग को लेकर समुदाय में एक ही सर्वमान्य कथा नहीं मिलती। इसलिए यह दावा करना ठीक नहीं होगा कि पोशाक शुरू से बिल्कुल इसी रूप में थी। कालबेलिया के आज के स्वरूप को पहचान दिलाने वाली गुलाबो सपेरा ने भी काले घाघरे, चोली, ओढ़नी और रंगीन किनारियों वाली पोशाक को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
कालबेलिया का घाघरा केवल इसलिए आकर्षक नहीं है कि वह काला है। उसकी खासियत यह है कि समुदाय ने उस काले कपड़े पर अपने जीवन के सारे रंग टांक दिए हैं।
बीन अकेली नहीं, पूरा संगीत संसार चलता है साथ
कालबेलिया नर्तकी के चक्कर और घाघरे की चमक इतनी प्रभावशाली होती है कि कई बार उसके पीछे चल रहा संगीत ध्यान से छूट जाता है। लेकिन जरा बीन की आवाज हटा दीजिए, नृत्य का आधा जादू उसी क्षण कम हो जाएगा।
इसमें पुरुष कलाकार पुंगी या बीन, खंजरी, ढोलक, डफली और मोरचंग जैसे वाद्य बजाते हैं। बीन वही वाद्य है जो परंपरागत रूप से सांपों के खेल से जुड़ा था। अब सांप सामने नहीं होता, लेकिन उसकी कल्पना जरूर नर्तकी की देह रचती है।
वहीं कालबेलिया गीतों में भी जीवन के हर रंग शामिल होते हैं। इनमें प्रेम, बिछोह, विवाह, त्योहार से लेकर लोककथाएं और समुदाय के जीवन से जुड़े प्रसंग भी मिलते हैं। इनकी एक खासियत तुरंत से गीतों के बोलों को गढ़ लेने की कला भी है। कलाकार तुरंत ही सामने बैठे व्यक्ति, आयोजन या स्थान को गीत में शामिल कर सकते हैं।
यूनेस्को भी कालबेलिया के गीतों और नृत्य को ऐसी मौखिक परंपरा बताता है जिसके लिए कुछ लिखित में नहीं है और न हीं कहीं कोई न औपचारिक प्रशिक्षण पुस्तक है। इसका ज्ञान बस एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक देखकर, सुनकर और साथ प्रदर्शन करते हुए पहुंचता है।
सांपों का खेल छूटा तो कला बनी आजीविका
वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 लागू होने के बाद जंगली जीवों को पकड़ने, रखने और उनका सार्वजनिक प्रदर्शन करने पर कानूनी रोक लगी। सांपों के संरक्षण के लिए यह जरूरी कदम था, लेकिन कालबेलिया समुदाय के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया। जिस ज्ञान और पेशे पर उसका जीवन टिका था, उसकी जगह कोई तैयार विकल्प मौजूद नहीं था।
यहीं गीत और नृत्य ने नया रास्ता खोला। सांप पिटारी से चला गया, लेकिन उसकी चाल नर्तकी की देह में जीवित रही। बीन बंद नहीं हुई, उसका श्रोता बदल गया। अब उसके सामने सांप के बजाय मेलों, होटलों और सांस्कृतिक उत्सवों में बैठे दर्शक थे।
आज पर्यटन स्थलों पर कालबेलिया की लोकप्रियता को देखते हुए यह बदलाव सहज लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक समुदाय का कठिन पुनर्गठन छिपा है। यह नृत्य केवल विरासत नहीं, बदली हुई आर्थिक परिस्थितियों के बीच जीवित रहने का माध्यम भी बना है।
गुलाबो सपेरा ने कालबेलिया को दुनिया तक पहुंचाया
कालबेलिया को देश-दुनिया में पहचान दिलाने की बात हो और गुलाबो सपेरा का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। सपेरा परिवार में जन्मीं गुलाबो ने बचपन से अपने आसपास सांपों की चाल और बीन की धुन देखी-सुनी। उन्होंने इसी अनुभव को अपनी असाधारण लचक और नृत्य-कौशल में उतारा।
कालबेलिया का मान हैं गुलाबो सपेरा
राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्कर मेले में उनकी प्रतिभा पर सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की नजर पड़ी। इसके बाद उन्हें बड़े मंच मिलने लगे। गुलाबो ने भारत के साथ कई देशों में कालबेलिया की प्रस्तुतियां दीं। उनके नृत्य, काले लिबास और मंचीय शैली ने इसकी वह दृश्य पहचान गढ़ी जिसे आज दुनिया जानती है।
गुलाबो का योगदान केवल इतना नहीं था कि वह इस कला में माहिर हैं। उन्होंने कालबेलिया महिलाओं के लिए डेरे और समुदाय की सीमाओं से बाहर मंच, आमदनी और पहचान के रास्ते खोले। उनके इस उल्लेखनीय योगदान की वजह से वर्ष 2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
यूनेस्को की सूची में पहुंची जीवित विरासत
वर्ष 2010 में ‘राजस्थान के कालबेलिया लोकगीत और नृत्य’ को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। हालांकि सूची में जगह मिलना किसी विरासत के हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाने की गारंटी नहीं है। पर्यटन की जरूरत के हिसाब से कई प्रस्तुतियां छोटी, तेज और करतब प्रधान हो गई हैं। दर्शक लचक और चक्कर देखकर तालियां बजाते हैं, लेकिन उनके पीछे के गीत, बोली और सामुदायिक इतिहास कई बार मंच से गायब रहता है।
यही कालबेलिया के सामने आज की बड़ी चुनौती है कि दर्शकों को आकर्षित करने वाला ‘स्नेक डांस’ तो बचा रहे, लेकिन उसे जन्म देने वाला समुदाय कहानी से बाहर न हो जाए।
घूमर और कालबेलिया में क्या अंतर है
घेरदार घाघरे और गोल चक्कर देखकर कई लोग कालबेलिया को घूमर जैसा समझ लेते हैं। दोनों राजस्थान के प्रसिद्ध लोकनृत्य जरूर हैं, लेकिन इनकी प्रकृति अलग है।
राजस्थान की दो परंपराएं कैसे हैं अलग
घूमर मुख्य रूप से समूह में किया जाने वाला उत्सवी नृत्य है। इसमें महिलाएं घेरा बनाकर संतुलित चाल में घूमती हैं। विवाह, तीज और दूसरे मांगलिक अवसरों से इसका गहरा संबंध है। इसकी सुंदरता सामूहिक लय और एक साथ घूमते रंगीन परिधानों में दिखाई देती है।
इसके विपरीत कालबेलिया सपेरा समुदाय के जीवन से निकला प्रदर्शन है। इसमें नर्तकी की लचक, तेजी और व्यक्तिगत कौशल प्रमुख होता है। वह जमीन तक झुकती है, सांप की तरह बल खाती है और संगीत की गति के साथ तेज चक्कर लगाती है। घूमर के परिधान चटख रंगों में दिखाई देते हैं, जबकि काला घाघरा कालबेलिया की पहचान है।
सीधे शब्दों में कहें तो घूमर में समूह और रंगों की लय है, जबकि कालबेलिया में लचक, रहस्य और रोमांच।
अगली बार कालबेलिया देखें तो केवल चक्कर मत गिनिएगा
अगली बार राजस्थान के किसी मेले में काला घाघरा लहराता दिखाई दे तो कुछ क्षण रुकिएगा। नर्तकी की लचक के साथ बीन की आवाज भी सुनिएगा। उसके घाघरे पर बने छोटे-छोटे पैटर्न देखिएगा और याद रखिएगा कि मंच पर दिखाई देने वाला यह नृत्य किसी एक दिन तैयार नहीं हुआ।
इसमें सपेरों के पुराने डेरे, सांपों के साथ अर्जित पारंपरिक ज्ञान, कानून बदलने के बाद पैदा हुआ रोजी-रोटी का संकट और अपने हुनर को नए रूप में बचा लेने वाली महिलाओं की हिम्मत शामिल है।
काला घाघरा राजस्थान की पहचान केवल इसलिए नहीं बना कि वह सुंदर था। वह इसलिए याद रह गया क्योंकि उसमें एक पूरे समुदाय ने अपना अतीत, संघर्ष और भविष्य समेट लिया। सांप अब पिटारी में नहीं है, लेकिन उसकी लचक नृत्य में मौजूद है। पुराना पेशा पीछे छूट चुका है, लेकिन बीन अब भी बजती है- और उसकी धुन पर कालबेलिया अपनी कहानी दुनिया को सुनाता रहता है।
