Valentine Week 2026: दुनियाभर में वेलेंटाइन वीक की शुरुआत हो चुकी है। 7 से 14 फरवरी तक का यह सप्ताह मोहब्बत के नाम रहता है। इन दिनों ना जाने कितनी ही प्रेम कहानियां जन्म लेती हैं। बात अपने वतन की करें तो यहां हिंदुस्तान की मिट्टी में ही इश्क है। इस मिट्टी से निकले मोहब्बत के कई ऐसे अफसाने हैं जो हमेशा के लिए अमर हो चुके हैं।
शीरीं फरहाद, ढोला-मारू, हीर-रांझा और सोहनी-महिवाल के किस्से लोग सदियों से सुनते सुनाते आ रहे हैं। लेकिन भारत के दिल कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के बस्तर की माटी में एक ऐसी प्रेम कहानी दफ्न है जो प्यार में बलिदान का प्रतीक बन चुकी है। ये अमर प्रेम कहानी है झिटकू और मिटकी की। दोनों का प्रेम ऐसा था कि मौत के बाद वो देवता की तरह पूजे जाने लगे।
झिटकू-मिटकी की प्रेम कहानी
मिटकी का जन्म छत्तीसगढ़ में बस्तर के पेंड्रावन गांव में हुआ था। यह गांव आज कोंडागांव से 50-60 किमी दूर विशमपुरी रोड पर है। मिटकी अपने सात भाइयों में अकेली बहन थी। वह परिवार की जान थी। भाई उसकी कोई बात नहीं टालते थे।
Jhitku Mitki Love Story
एक दिन पास के मेले में उसकी मुलाकात झिटकू से हुई। झिटकू पड़ोस के ही गांव का रहने वाला था। दोनों की नजरें मिलीं और प्यार हो गया। धीरे-धीरे प्यार परवान चढ़ा तो बात शादी तक पहुंची। मिटकी ने साफ कह दिया कि अगर उसके भाई शादी के लिए मानेंगे तभी वह आगे बढ़ पाएगी। झिटकू ने मिटकी के भाइयों से उसका हाथ मांगा। भाइयों को झिटकू अपनी बहन के लायक नहीं लगा। फिर भी मिटकी की खुशी को देखते हुए उन्होंने शादी का मन बना लिया। लेकिन शादी के लिए झिटकू के सामने एक शर्त रख दी।
शादी के लिए रखी शर्त
शर्त ये थी कि झिटकू को घर जमाई बनकर रहना होगा। उस दौर और संस्कृति में घर जमाई बनना आसान ना था। लेकिन झिटकू ने अपनी मोहब्बत के लिए अपने परिवार को त्यागा और मिटकी के भाइयों की शर्त मान ली। दोनों की शादी हो गई।
शादी के बाद झिटकू मिटकी के भाइयों के साथ ही उनके खेत में काम करने लगा। खेतों के पास एक नाला बहता था। एक रोज सातों भाई और झिटकू ने पानी रोकने के लिए छोटा-सा बांध बनाने का काम शुरू किया। दिन में वे लोग बांध बनाते थे और शाम को घर चले जाते थे, लेकिन हर रात पानी बांध की मिट्टी को तोड़ देता और उनका प्रयास व्यर्थ हो जाता था।
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भाई को दिखा नरबलि का सपना
दिन में बांध बनाने और रात में टूट जाने का यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। तभी किसी रात मिटकी के एक भाई को सपना आया कि जब तक किसी बाहरी की नरबलि नहीं दी जायेगी, तब तक बांध पूरा नहीं बन पायेगा। नरबलि की बात को नजरअंदाज करके, सब कई दिनों तक बांध बनाने की कोशिश करते रहे। कई प्रयास के बाद भी वह सफल ना हो पाए। थक-हारकर भाइयों ने नरबलि के लिए आदमी ढूंढना शुरू कर दिया। वहां भी उन्हें असफलता ही हाथ लगी।
परेशानी और नरबलि की बात बढ़ती गई। गांव के कुछ लोगों ने मिटकी के भाइयों को भड़का दिया कि क्यों ना झिटकू की बलि दे दी जाए। भाइयों को लगा कि यही तरीका है। बांध भी बन जाएगा और इस तरह से वह झिटकू को अपनी बहन से हमेशा के लिए दूर भी कर देंगे। फिर एक रात मिटकी के भाइयों ने छल से झिटकू की नरबलि दे दी और उसे वहीं बांध के पास गाड़ दिया।
जब मिटकी ने देखी झिटकू की सिर कटी लाश
बलि देने के कुछ देर बाद ही तेज बारिश होने लगी। सातों भाई खुश थे। उधर मिटकी अपने झिटकू का इंतजार करते-करते थक गई। भाइयों से पूछने पर भी कुछ पता ना चला तो वह तेज बारिश में अपनी बांस की बनी टोकरी नुमा गप्पा लेकर खोजने निकल गई। खोजते-खोजते मिटकी बांध के पास पहुंची। बारिश से बांध की मिट्टी हट गई थी। मिट्टी हटी तो झिटकू का सिर कटा धड़ ऊपर आ गया। मिटकी समझ गई कि ये सब उसके भाइयों ने ही किया है।
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मिटकी ने झिटकू से वादा किया था कि जियेंगे तो साथ जियेंगे और मरेंगे तो साथ मरेंगे। अपनी मोहब्बत से किये इस वादे को पूरा करने के लिए मिटकी ने भी वहीं अपने अपने प्राण त्याग दिये। वह उसी बांध में कूद गई। इस तरह झिटकू और मिटकी की प्रेम कहानी का अंत हो गया। लेकिन ये अंत एक नई शुरुआत बन गई।
मर कर अमर हो गए झिटकू और मिटकी
दोनों के प्यार और बलिदान की कहानी जंगल में आग की तरह फैल गई। झिटकू और मिटकी की प्रेम कहानी ने बस्तर के आदिवासी समाज को झकझोर कर रख दिया। इससे पहले प्यार की ऐसी मिसाल उन आदिवासियों ने कभी नहीं देखी थी। लोगों की नजर में झिटकू और मिटकी दैवीय बन गए। लोग उन्हें देवी-देवता की तरह पूजने लगे। आज भी ये आदिवासी समाज प्रेम की सफलता के लिए झिटकू-मिटकी की पूजा करते हैं। लोग इन देवताओं से वैवाहिक सुख और रिश्तों की रक्षा की कामना भी करते हैं।
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आदिवासियो के आर्ट में जिंदा हैं झिटकू और मिटकी
बस्तर के झिटकू-मिटकी का अमर प्रेम सिर्फ वहां की लोककथाओं में ही नहीं, बल्कि शिल्प परंपरा में भी जिंदा है। काष्ठ और धातु से बनी उनकी मूर्तियां स्थानीय संस्कृति की पहचान बन चुकी हैं और देश-विदेश तक पसंद की जाती हैं। बस्तर के कई इलाकों में आज भी कारीगर इस प्रेमी जोड़े को अपनी कला के जरिए आकार देते हैं।
हर साल दिल्ली में लगने वाली कला प्रदर्शनी में बेलमेटल से बनी झिटकू-मिटकी की प्रतिमाएं खास आकर्षण का केंद्र रहती हैं। बस्तर में दूर-दराज से आने वाले लोग इन झिटकू और मिटकी की इन प्रतिमाओं को प्रेम और सौभाग्य के प्रतीक के रूप में खरीदते हैं।
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लोगों को आज भी रुलाती है झिटकू-मिटकी की प्रेम कहानी
झिटकू और मिटकी की प्रेम कहानी को कई साहित्यकारों ने अपनी कलम से सजाकर किताब की शक्ल में लोगों तक पहुंचाया। दो आदिवासियों के प्यार और बलिदान की इस अमर गाथा ने फिल्मों को भी अपनी तरफ खींचा। फिल्मी पर्दे पर दोनों की प्रेम कहानी आज भी लोगों की आंखों में आंसू ला देती है।
