एक ही तो हवस रही है हमें, अपनी हालत तबाह की जाए। ये शेर है जौन एलिया का। ये एक शेर उनकी जिंदगी बयां करने को काफी है। उर्दू शायरी की दुनिया में जौन एलिया एक ऐसा नाम थे, जिनकी शख्सियत जितनी रहस्यमयी थी, उतनी ही बागी भी। उनका मिजाज कभी किसी सीधी रेखा जैसा नहीं था। वह टूटा भी था, चुभता भी था, मुस्कुराता भी था और सवाल भी करता था। जौन एलिया को पढ़ेंगे तो आप खुद महसूस करेंगे कि आदमी सिर्फ कविता नहीं पढ़ रहा, बल्कि एक ऐसे शायर का हाल-ए-दिल सुन रहा है जो अंदर ही अंदर हर पल जलता और सुलगता रहता है।
जौन एलिया (Photo: Jaun Elia fan page)
मैं जो हूं 'जौन-एलिया' हूं जनाब
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा
जौन का मिजाज बुनियादी तौर पर नाराज था। ये नाराजगी थी समाज से, अपने दौर से, रिश्तों से और सबसे ज्यादा खुद से। जौन अकसर कहते भी थे कि मुझसे मेरी जिंदगी की कोई कीमत वसूल नहीं हो पाई। यह बात भले वह मजाक में कहते, लेकिन इसके भीतर गहरी तल्खी और आत्मव्यंग्य छुपा होता है। यही कड़वी-मीठी सच्चाई उनकी शायरी का असल रंग है।
हां ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूं
आख़िर मिरे मिज़ाज में क्यूं दख़्ल दे कोई
जौन एलिया (AI Image)
जौन एलिया के शख्सियत की बहुत सी परतें थीं। कहीं गुस्सा था, कहीं कुढ़न थी, कहीं गम था, कहीं झुंझलाहट तो कहीं बहुत नफरत थी। वह निहायत ही मुश्किल इंसान थे। जौन प्यार करते भी थे, तंग भी पड़ जाते थे और मोहब्बत को दुनिया का सबसे खूबसूरत जहर भी मानते थे। उनका प्यार सीधा नहीं था। वह उलझा हुआ, टेढ़ा, मगर बेहद सच्चा था। इसी लिए वह लिखते हैं-
कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
इस एक शेर में जौन की पूरी मोहब्बत, उसका दर्द और उसकी नाकामी बंद है। उन्हें धर्म, राजनीति, समाज की सड़ी हुई परंपराओं से घुटन होती थी। वह सवाल पूछते थे, बहस करते थे, और अपनी सोच किसी के आगे झुकने नहीं देते थे। उनकी बगावत शोर मचाने वाली नहीं थी। वह अंदर से उठने वाली आग थी, जो अल्फाज बनकर बाहर आती थी।
मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूं
कितना ख़ामोश हूं मैं अंदर से
किसी कार्यक्रम में दिलीप कुमार और दूसरे कलाकारों के साथ जौन एलिया (Photo: Jaun.elia.legend/fb)
जौन मनमौजी थे। उनके कुछ समकालीन शायर उन्हें नौटंकी भी कहते थे। जौन उनकी कुढ़न को और बढ़ाते। वह अकसर गर्मियों में कंबल लपेट कर मुशायरे में पहुंच जाते। रात में मंच पर धूप का चश्मा लगा लेना भी जौन के मनमौजीपने का एक आयाम था।
अपना ख़ाका लगता हूं, एक तमाशा लगता हूं
आईनों को ज़ंग लगा, अब मैं कैसा लगता हूं
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जितना वह बागी थे, उतने ही नर्म, अकेले और टूटे हुए भी थे। वह महफ़िलों में हंसते थे, पर वह हसी भीतर की उदासी छुपाने का तरीका थी। लोग कहते हैं कि जौन का असली मिजाज उनकी शायरी नहीं, बल्कि उनकी खामोशी समझाती है। वह खामोशी जिसे वह कभी जाहिर नहीं होने देते थे। वो तो बस ऐसे शेर कहते:
मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
जौन एलिया की शायरी (Photo: Jaun Elia fb)
जौन एलिया की पैदाइश उत्तर प्रदेश के अमरोहा की थी। 1947 में बंटवारा हुआ तो उन्होंने पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया। लेकिन करीब 9 साल उन्हें अपने महबूब वतन को छोड़ पाकिस्तान जाना पड़ा। वतन छूटने के गम से ह कभी उबर नहीं पाए। इस दर्द के बाद तो ना जाने कितने ही दर्द जौन ने देखे। दर्द मिलते गए और वह अपने दर्द को तरानों में तब्दील करते गए।
कौन इस घर की देखभाल करे
रोज एक चीज़ टूट जाती है
जौन को समझना इतना मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि वह खुद भी खुद को नहीं समझते थे। मगर इतना तय है कि उनकी बेचैनी, उनकी बगावत, उनकी मोहब्बत और उनकी तल्ख मुस्कान, इन्हीं चार चीजों ने उन्हें उर्दू शायरी का सबसे अनोखा, सबसे मकबूल और सबसे पसंदीदा शायर बना दिया।
