आज फ्रेंडशिप डे है। सुबह से सोशल मीडिया पर दोस्तों के साथ पुरानी तस्वीरें दिखाई दे रही हैं। स्कूल-कॉलेज के वॉट्सऐप ग्रुप में भी संदेशों की आवाजाही कुछ बढ़ गई है। इसी बीच एक परिचित ने हंसते हुए कहा - आज तो हर कोई दोस्ती की तस्वीर लगा रहा है, लेकिन सच बताऊं तो किसी दिन मन बहुत खराब हो तो समझ नहीं आता कि फोन किसे करूं।
यह बात सामान्य बातचीत में कही गई थी, मगर मन में अटक गई। क्या सचमुच हमारी फ्रेंड लिस्ट लंबी और करीबी दोस्तों की सूची छोटी होती जा रही है? इसी सवाल के साथ दोस्ती पर हुए कुछ हालिया अध्ययन पढ़ें तो एक आंकड़े पर नजर ठहर गई। 2021 के American Perspectives Survey के अनुसार, अमेरिका में 12 प्रतिशत वयस्कों ने कहा कि उनका एक भी करीबी दोस्त नहीं है। 1990 में ऐसे लोगों की संख्या केवल 3 प्रतिशत थी। यानी तीन दशक में बिना किसी पक्के दोस्त के रहने वालों का प्रतिशत चार गुना हो गया।
पहले तो इस आंकड़े पर भरोसा करना मुश्किल लगा। आखिर यह कैसे संभव है? जहां दुनिया लगातार छोटी हो रही है। स्कूल के बिछड़े दोस्त सोशल मीडिया पर मिल जाते हैं, कॉलेज का ग्रुप वॉट्सऐप पर मौजूद है और ऑफिस के लोग लिंक्डइन से जुड़े हैं। किसी का जन्मदिन भूल जाएं तो फेसबुक याद दिला देता है। फिर इतने ‘कनेक्शंस’ के बीच वह एक दोस्त क्यों कम होता जा रहा है, जिसे बिना समय देखे फोन किया जा सके? शायद कनेक्ट रहने और किसी के करीब होने के बीच बढ़ती दूरी ही आज की दोस्ती की सबसे बड़ी कहानी है।
जीवन में दोस्त बहुत जरूरी हैं
फिर मैंने अपने आसपास थोड़ा ध्यान से देखा। जवाब बहुत दूर नहीं था।
किसी को पुरानी सहेली से मिले छह महीने हो गए हैं। कोई दोस्त को फोन करना चाहता है, लेकिन हर बार यह सोचकर रुक जाता है कि वह व्यस्त होगा। किसी के पास स्कूल, ऑफिस, सोसाइटी और रिश्तेदारी के कई ग्रुप हैं, मगर मन खराब होने पर बात करने के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं। हम सब बहुत सारे लोगों के संपर्क में हैं, लेकिन शायद बहुत कम लोगों के करीब हैं।
यही है Friendship Recession यानी जानने वालों की भरमार, लेकिन करीबी दोस्तों की मंदी।
कम दोस्त या कम होती नजदीकी
Friendship Recession सुनते ही लगता है कि बात दोस्तों की संख्या कम होने की है। मगर असली संकट संख्या से कहीं अधिक गहरा है। हमारे पास दोस्त हो सकते हैं, लेकिन क्या हमारे पास दोस्ती के लिए समय है? हम लोगों से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन क्या किसी के सामने बिना अपने शब्दों को संपादित किए बात कर सकते हैं?
2024 में प्रकाशित American Friendship Project में 75 प्रतिशत से अधिक लोगों ने माना कि वे अपने दोस्तों की संख्या से संतुष्ट हैं। इसके बावजूद 40 प्रतिशत से ज्यादा लोगों ने कहा कि वे अपने दोस्तों के उतने करीब नहीं हैं, जितना होना चाहते हैं।
यह अंतर गौर करने लायक है। जो यह दिखाता है कि कमी शायद लोगों की नहीं, कमी उन संसाधनों की भी नहीं जो लोगों के बीच की दूरी को कम करते हैा - कमी भावनात्मक निकटता की है, कभी दूसरे को समय देने की है।
हमारे फोन में नाम बहुत हैं, लेकिन उनमें से कितनों को आधी रात फोन किया जा सकता है? कितनों के सामने यह कहा जा सकता है कि आज मैं ठीक नहीं हूं? कितने लोग हमारे जवाब ‘मैं ठीक हूं’ के पीछे छिपी थकान और निराशा को पहचान लेते हैं?
इन सवालों के उत्तर ही बताते हैं कि हमारी सामाजिक दुनिया सचमुच कितनी बड़ी है।
कभी मिलते हैं - हमारे समय का सबसे अधूरा वादा
जब भी पुराने दोस्तों से बात होती है तो दोनों तरफ के शब्द यही होते हैं - बहुत समय हो गया, अब जल्दी मिलते हैं। लेकिन इसके लिए कोई तारीख तय नहीं होती। बस हवा में बात हो जाती है। कुछ सप्ताह बाद उसकी कोई तस्वीर दिखती है। हम लाइक कर देते हैं। वह हमारी स्टोरी देख लेता है। रिश्ता औपचारिक रूप से जीवित रहता है, लेकिन इमोशनल कनेक्शन का जीवन धीरे-धीरे समाप्त होता जाता है।
थोड़ा ध्यान से सोचेंगे तो पाएंगे कि दोस्तियां अक्सर किसी बड़े झगड़े से नहीं टूटतीं। वे टलती हुई मुलाकातों, जवाब न मिले गए कॉल्स व मेसेज और अभी बिजी हूं- बाद में बात करते हैं - के बीच चुपचाप कमजोर होती हैं।
दोस्तों को दिल के हाल सुनाते रहना चाहिए
विडंबना देखिए कि व्यस्त हम पहले भी थे। घर, नौकरी, बच्चे और जिम्मेदारियां पिछली पीढ़ियों के पास भी थीं। फर्क यह है कि उस समय मेलजोल दिनचर्या का हिस्सा था। पड़ोसी के घर चाय पीने के लिए कैलेंडर मिलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। दोस्त रास्ते में मिल जाता था तो दस मिनट तो ऐसे ही बातचीत हो जाती थी। किसी के घर जाने से पहले लंबी अनुमति नहीं लेनी पड़ती थी।
लेकिन अब मुलाकात एक आयोजन है। पहले तारीख मैच होगी, फिर समय, फिर जगह। अक्सर कार्यक्रम बनने तक मिलने की इच्छा ही खत्म होने लगती है क्योंकि इसमें बहुत औपचारिकता जुड़ती जाती है।
दोस्ती को सोशल मीडिया ने बचाया भी, कमजोर भी किया
वैसे कमजोर होती दोस्ती के मामले में तकनीक को पूरी तरह दोष देना आसान है, लेकिन सही नहीं है। क्योंकि इसी तकनीक ने वर्षों पुराने दोस्तों को दोबारा मिलाया भी है। दूर रहने वाले लोगों को जोड़े रखा है। महामारी के दिनों में यही डिजिटल संपर्क बहुतों का सहारा बना था।
लेकिन समस्या वहां से शुरू होती है, जहां हम संपर्क को संवाद समझ लेते हैं। किसी की तस्वीर देख लेना, उसके जीवन को जान लेना नहीं है। स्टोरी पर हार्ट भेजना हालचाल पूछना नहीं है। जन्मदिन पर तैयार संदेश भेजना उस व्यक्ति के जीवन में मौजूद रहना नहीं है।
सोशल मीडिया हमें यह भ्रम देता है कि हम अपने दोस्तों के बारे में सब जानते हैं। हमने उसकी छुट्टियों की तस्वीर देखी, बच्चे का रिजल्ट देखा, नई नौकरी की पोस्ट पढ़ी- इसलिए फोन करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। मगर तस्वीरों में शायद उसकी बीमार मां, नौकरी का तनाव, आर्थिक परेशानी या मन का खालीपन दिखाई नहीं देता। हम लोगों की खबर रखते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उनका हाल भी जानते हों।
जिंदगी की जिम्मेदारियां दोस्ती की जगह खा रही हैं
उम्र बढ़ने के साथ दोस्ती निभाना कठिन क्यों होता जाता है? शायद इसलिए कि वयस्क जीवन में हर रिश्ते के लिए एक तय भूमिका है। माता-पिता की देखभाल करनी है, बच्चे की पढ़ाई देखनी है, जीवनसाथी को समय देना है और काम में लगातार स्वयं को साबित करना है। दोस्ती अकेला ऐसा रिश्ता है, जिसकी कोई औपचारिक जिम्मेदारी तय नहीं होती। इसलिए समय की कमी होने पर सबसे पहले वही टलता है।
कोई महिला अपनी सहेली से इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि छुट्टी वाले दिन भी घर के काम खत्म नहीं होते। कोई पुरुष अपने दोस्त को परेशानी इसलिए नहीं बताता क्योंकि उसे हमेशा मजबूत दिखाई देना सिखाया गया है। कोई व्यक्ति शहर बदलने के बाद पुराने दोस्तों से दूर हो गया और नए शहर में रिश्ते बनाने की ऊर्जा नहीं जुटा पाया।
इनमें से किसी ने जानबूझकर दोस्ती नहीं छोड़ी। जिंदगी धीरे-धीरे बीच में आ गई।
हर असुविधाजनक रिश्ता ‘टॉक्सिक’ नहीं होता
दोस्ती की मंदी का एक कारण रिश्तों को लेकर बढ़ी हमारी कठोरता भी है। सोशल मीडिया हमें लगातार बताता रहता है- जो आपकी ऊर्जा कम करे, उसे छोड़ दें; जो आपके लिए उपस्थित न रहे, उससे दूरी बना लें; जो आपकी उम्मीद पूरी न करे, उसे जीवन से बाहर कर दें।
निजी सीमाएं जरूरी हैं। अपमानजनक या शोषण करने वाले रिश्ते से निकलना भी जरूरी है। लेकिन हर मतभेद को ‘टॉक्सिसिटी’ और हर भूल को ‘रेड फ्लैग’ कह देना मानवीय रिश्तों के साथ न्याय नहीं है।
दोस्त कभी देर से जवाब देगा। कभी वह हमारी खुशी में उतना उत्साहित नहीं दिखेगा, जितनी हमें उम्मीद थी। कभी वह अपनी समस्या में इतना उलझा होगा कि हमारी परेशानी नहीं समझ पाएगा। हम भी उसके साथ ऐसा कर सकते हैं।
लंबी दोस्ती परफेक्ट लोगों के बीच नहीं बनती। वह दो ऐसे लोगों के बीच बनती है, जो एक-दूसरे की कमियों के बावजूद संवाद करना नहीं छोड़ते।
दोस्त बनाने की इच्छा है, पहल कौन करे
बचपन में दोस्ती बहुत सहज थी। बगल में बैठने वाला बच्चा टिफिन साझा करता था और दोस्त बन जाता था। पार्क में दो मुलाकातों के बाद घर आने-जाने का सिलसिला शुरू हो जाता था। वयस्क होने पर हम दोस्ती को लेकर जरूरत से ज्यादा सजग हो जाते हैं।
किसी नए व्यक्ति से मिलने के बाद मन में आता है कि दोबारा बात करनी चाहिए। सेकंड थॉट पर लगता है कि कहीं हम इस तरह जरूरतमंद तो नहीं लगने वाले। क्या सामने वाला भी दोस्ती चाहता है? कहीं उसे मेरा संदेश पर्सनल स्पेस में दखल जैसा न लगे?
हो सकता है, ठीक इसी समय सामने वाला भी यही सोच रहा हो जो आप सोच रहे हैं। लेकिन पहल कोई नहीं कर पा रहा है। जान लें कि नई दोस्ती में रोमांटिक रिश्तों जैसी कोई स्पष्ट भाषा नहीं होती। कोई यह नहीं पूछता कि अब हम दोस्त हैं या नहीं? इसलिए कई संभावित दोस्तियां दोनों ओर की झिझक के बीच समाप्त हो जाती हैं।
अकेलापन केवल मन का मामला नहीं
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का हर छठा व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव कर रहा है। किशोरों और युवा वयस्कों में यह अनुपात लगभग हर पांच में से एक है। WHO ने सामाजिक जुड़ाव को बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जोड़ा है।
यहां एक अंतर समझना जरूरी है। अकेले रहना और अकेला महसूस करना - कहीं से भी एक बात नहीं है। कोई व्यक्ति एकांत में संतुष्ट हो सकता है। दूसरी तरफ परिवार, सहकर्मियों और सोशल मीडिया के बीच मौजूद व्यक्ति भी भीतर से अकेला हो सकता है। इसलिए इसका समाधान हर शाम लोगों की भीड़ में बैठना नहीं है। समाधान है ऐसे रिश्ते बनाना, जिनमें हमें देखा, सुना और समझा जाए।
क्या कम दोस्त होना बुरी बात है
बिल्कुल नहीं। उम्र के साथ दोस्तों की सूची छोटी होना स्वाभाविक भी है। अनुभव हमें पहचानना सिखाता है कि कौन केवल परिस्थितियों का साथी है और कौन जीवन का। दस सतही रिश्तों के बजाय दो गहरी दोस्तियां कहीं अधिक संतोष दे सकती हैं।
अच्छे दोस्त हमें मानसिक संबल भी देते हैं
वहीं मुझे किसी की जरूरत नहीं, मैं अपने आप में संपूर्ण हूं- कहना भी हमेशा आत्मनिर्भरता नहीं होता। कई बार यह पुराने अनुभवों से पैदा हुआ बचाव भी हो सकता है। यदि हम बार-बार निराश हुए हैं, तो संबंधों से उम्मीद रखना बंद कर देते हैं। इससे चोट से बचाव तो हो जाता है, लेकिन अपनापन भी जीवन से बाहर चला जाता है।
इसलिए मुद्दा यह नहीं कि हमारे कितने दोस्त हैं। मुद्दा यह है कि जो हैं, क्या उनके साथ रिश्ता जीवित है?
Friendship Recession से निकलने की शुरुआत कहां से हो
जीवन में अच्छे और करीबी दोस्तों की कमी दूर करने के लिए किसी बड़े सामाजिक अभियान में नहीं लगता है। बस पहले अपनी कॉन्टैक्ट लिस्ट खोलनी है। उस व्यक्ति का नाम खोजना है जिससे बात करने का मन लंबे समय से है। अब उसको फोन करना है। इस दौरान यह मत सोचिए कि उसने पहले फोन क्यों नहीं किया। दोस्ती में हर पहल का हिसाब रखने लगेंगे तो रिश्ता बैंक का खाता बन जाएगा।
बेहतर होगा कि आप मुलाकात को आसान बनाइए। हर बार रेस्तरां, लंबी ड्राइव या छुट्टी की जरूरत नहीं। साथ टहलना, घर पर चाय पीना, बाजार तक जाना या 20 मिनट की ऐसे ही मिलकर बातचीत भी दोस्ती को जिंदा रख सकती है। याद रखें कि दोस्ती को समय चाहिए, आयोजन नहीं।
किसी परिचित में अपनापन महसूस हो तो उसे दोबारा मिलने के लिए कहना भी गलत नहीं। वयस्क जीवन में दोस्त अपने आप नहीं बनते। रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए बार-बार मिलने और छोटी बातें साझा करने की जरूरत होती है। यही बात धीरे-धीरे भरोसा बढ़ाती है और साथ ही रिश्ते भी।
कभी-कभी दोस्तों और करीबियों से बिना मतलब के सीधे पूछ लेना चाहिए- तुम सच में कैसे हो? हो सकता है कि खुद से खुलने की बजाय सामने वाला इसी सवाल का लंबे समय से इंतजार कर रहा हो।
दोस्ती पर कुछ बातें मुझे हमेशा सच लगती हैं। कई बार इंटरनेट पर इससे जुड़ी फ्रेजेज पढ़ी हैं। जैसे कि
- भीड़ हमारी तस्वीर भर सकती है, खालीपन नहीं।
- अच्छा दोस्त समस्या हल न कर पाए, फिर भी समस्या में आपको अकेला नहीं छोड़ता।
- दोस्ती रोज बात करने का नाम नहीं, जरूरत पर बिना झिझक बात कर सकने का भरोसा है।
- दस परिचितों से बेहतर वह एक दोस्त है, जिसके सामने हमें ठीक होने का अभिनय न करना पड़े।
- रिश्ता पुराना होने से नहीं बचता, उसे समय देते रहने से बचता है।
दुनिया सचमुच छोटी हुई है। शहरों की दूरियां घटी हैं, संदेश पहुंचने की गति बढ़ी है और लोगों को खोज लेना आसान हुआ है। फिर भी दिलों के बीच का रास्ता तकनीक तय नहीं कर सकती। वह रास्ता समय, संवेदना, भरोसे और थोड़ी-सी पहल से बनता है।
शायद Friendship Recession की सबसे बड़ी वजह यह नहीं कि अच्छे लोग कम हो गए हैं। वजह यह है कि हम सभी किसी दूसरे व्यक्ति के पहले फोन, पहले संदेश और पहली कोशिश का इंतजार कर रहे हैं।
आज वह पहला फोन हम भी कर सकते हैं। शुरुआत बस इतनी है कि - बहुत दिन हो गए। तुम याद आए तो सोचा बात कर लूं।
