FIFA 2026: फुटबॉल का विश्वकप चल रहा है। फीफा वर्ल्ड कप 2026 में फैंस की दीवानगी चरम पर है। भारत भले इस विश्वकप का हिस्सा ना हो लेकिन इसके दीवाने यहां भी बड़ी तादाद में हैं। भारत में फुटबॉल ने कोलकाता से लेकर केरल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों तक, लंबा सफर तय किया है। लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि भारत में फुटबॉल को फेमस करने में हमारे राजाओं और रियासतों का भी बड़ा योगदान रहा है।
शाही परिवारों ने अंग्रेजों से सीखा फुटबॉल
उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रिटिश सैनिक और अधिकारी फुटबॉल को भारत लेकर आए। शुरुआत में यह खेल सेना की छावनियों और अंग्रेजी स्कूलों तक सीमित था। धीरे-धीरे भारतीय राजघरानों की नजर इस नए खेल पर पड़ी। उन्हें इसमें अनुशासन, रणनीति और टीम भावना का अनोखा मेल दिखाई दिया।
उस दौर में कई भारतीय शासक पश्चिमी शिक्षा और खेलों में रुचि लेने लगे थे। उनके लिए फुटबॉल केवल मनोरंजन के साथ ही आधुनिक सोच और फिजिकल फिटनेस का सिंबल भी था। इसलिए उन्होंने अपने महलों और रियासतों में फुटबॉल के मैदान बनवाने शुरू किए।
देश की कई रियासतों ने फुटबॉल क्लब्स बनाए। खिलाड़ियों को आर्थिक मदद दी गई, मैदान उपलब्ध कराए गए और स्थानीय युवाओं को भी खेल में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस संरक्षण ने फुटबॉल को अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरुष फुटबॉल प्रतियोगिताओं में से एक संतोष ट्रॉफी का नाम संतोष (जो अब बांग्लादेश में है) के महाराजा सर मन्मथ नाथ रॉय चौधरी (1883-1939) के नाम पर रखा गया है। संतोष वर्तमान में बांग्लादेश में स्थित है। भारतीय फुटबॉल के संरक्षण और विकास में उनके योगदान को सम्मान देने के लिए वर्ष 1941 में संतोष ट्रॉफी की शुरुआत की गई थी। तब से यह टूर्नामेंट देश में राज्य स्तरीय फुटबॉल प्रतिभाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण मंचों में से एक माना जाता है।
कोचबिहार और बड़ौदा राजघरानों की अहम भूमिका
कई इतिहासकार मानते हैं कि पूर्वी भारत की रियासतों, विशेषकर कोचबिहार और बड़ौदा, ने फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन रियासतों के शासक खेलों के बड़े समर्थक थे और वे चाहते थे कि युवा शारीरिक रूप से मजबूत और अनुशासित बनें।
ओलंपिक्स की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, महाराजा सर मन्मथ नाथ रॉय चौधरी प्रतिष्ठित East Bengal FC के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उन्होंने कई वर्षों तक Indian Football Association (आईएफए) के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। भारतीय फुटबॉल के शुरुआती दौर में वे इसके सबसे बड़े संरक्षकों और समर्थकों में गिने जाते थे।
मोहन बागान की ऐतिहासिक जीत ने बदली तस्वीर
1911 में मोहन बागान की टीम ने ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को हराकर आईएफए शील्ड जीती। इस जीत ने फुटबॉल को राष्ट्रीय गर्व और स्वाभिमान से जोड़ दिया। हालांकि यह जीत खिलाड़ियों के दम पर हासिल हुई थी, लेकिन खेल के लिए पहले से तैयार सामाजिक माहौल बनाने में राजघरानों और रियासतों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
महलों से मोहल्लों तक पहुंचा खेल
राजाओं के संरक्षण में शुरू हुआ फुटबॉल धीरे-धीरे स्कूलों, कॉलेजों और स्थानीय क्लबों तक पहुंच गया। बीसवीं सदी की शुरुआत तक यह खेल भारत के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो चुका था। कोलकाता, गोवा, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में फुटबॉल कल्चर की जड़ें इसी दौर में मजबूत हुईं।
आज भले ही फुटबॉल के बड़े मंचों पर राजाओं और रियासतों की चर्चा कम होती हो, लेकिन भारत में इस खेल के शुरुआती इतिहास में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण है।
