डोली और कहार की भूली दास्तान: जब बाबुल की दुआओं के साथ उठती थी डोली, बेटी कहार के कंधों पर होती थी विदा

मायके से विदा होकर डोली में बैठी दुल्हन जब ससुराल की ओर बढ़ती थी तो गली-चौराहों पर खड़े लोग कौतूहल से उसे देखते। गांव की महिलाएं और बच्चे डोली को रोककर कहारों को पानी पिलाते और अनाज, मिठाई या पैसों की शक्ल में आशीर्वाद देते।

भारत में जब भी शादियों का जिक्र आता है आंखों के सामने सबसे पहले बैंड-बाजे का शोर, नाचते-गाते बाराती और रंग बिरंगी सजावट का मंजर उभरता है। भारतीय शादी का सबसे भावुक पल होता है दुल्हन की विदाई। विदाई वह पल होता है जब किसी पिता की लाडली, किसी मां की आंखों का तारा या किसी भाई की मुस्कान अपना घर आंगन छोड़ किसी और घर को संवारने निकलती है। एक दौर था जब शादी के इस सबसे भावुक पल की साथी हुआ करती थी विदाई की डोली।

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भारतीय शादियों से डोली की खनक के साथ कहार की पुकार भी हो गई गुम (Photo: iStock)

डोली में विदा होती थी बेटी (Photo: Freepik)

डोली में बैठते ही दुल्हन एक नया रूप ले लेती थी। वह लड़की से औरत और बेटी से बहू बन जाती थी। विदाई के बाद का वो लम्हा जब उसे कंधों पर उठाकर ससुराल की ओर ले जाया जाता था, मानो उसका पूरा बचपन पीछे छूटता चला जाता। डोली भारतीय परिवारों की उस पारंपरिक सोच की भी प्रतीक थी जिसमें बेटी को पराया धन माना गया। लेकिन साथ ही डोली इस बात का भी संकेत है कि उसका सम्मान किसी राजकुमारी की तरह किया जा रहा है। शादियों की ये तस्वीर अब धुंधली पड़ चुकी है। अब ना तो विदाई में डोली नजर आती है और ना ही उसे उठाने वाले कहार। आधुनिकता की चकाचौंध और लग्जरी गाड़ियों ने इस खूबसूरत परंपरा को इतिहास के पन्नों तक सीमित कर दिया।

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