केमिस्ट्री की दुनिया में पिछले 60 सालों से एक ऐसी गुत्थी उलझी हुई थी, जिसे नामुमकिन मान लिया गया था। लगातार कोशिशों के बाद भी केवल नाकामी हाथ लगने के बाद एक दिन कुदरत के नियमों के खिलाफ मानी जानी वाली ये पहेली अचानक सुलझ गई। ये कहानी है ऑक्सोबोरेन (Oxoborane) नाम के मॉलिक्यूल की। 1960 के दशक से ही दुनिया भर के केमिस्ट्स इस अणु को प्रयोगशाला में बनाकर अलग यानी Isolate करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन यह अणु इतना अस्थिर होता था कि बनते ही खत्म हो जाता था।
अब, 6 दशकों के लंबे इंतजार के बाद यह तिलस्म टूट गया है। जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग (University of Wurzburg) और भारत की तेजपुर यूनिवर्सिटी (असम) के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम ने इस अनस्टेबल अणु को न केवल सफलतापूर्वक बनाकर दिखाया है, बल्कि इसे अलग करके इसका अध्ययन भी किया है। इससे जुड़ा पेपर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर केमिस्ट्री' (Nature Chemistry) में प्रकाशित हुआ है।
आसान भाषा में समझें: क्या है यह बॉन्डिंग की पहेली?
इस खोज की गहराई को समझने के लिए हमें केमिस्ट्री के एक बेहद बुनियादी नियम को आसान भाषा में समझना होगा। जब दो परमाणु आपस में जुड़ते हैं, तो वे अपने इलेक्ट्रॉनों का साझा करते हैं। इसे हम केमिकल बॉन्ड कहते हैं और ये तीन तरह के होते हैं। आसान उदाहरण से कहें तो ऐसे समझ सकते हैं किए कि दो दोस्त एक-एक हाथ मिलाकर हाथ पकड़ें तो इसे सिंगल बॉन्ड कह सकेत हैं, दो दोस्त अपने दोनों हाथ आपस में पकड़ लें तो इसे डबल बॉन्ड समझ सकते हैं और ट्रिपल बॉन्ड ऐसा है जैसे दो दोस्त अपने दोनों हाथ भी पकड़ लें और दोनों पैर भी आपस में जोड़ लें, यानी बेहद मजबूत और जटिल कनेक्शन।
ऑक्सोबोरेन का स्ट्रक्चर (चित्र साभार: वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय के Lukas Lubczyk, Christian Markl, Dr. Thomas Kupfer और Dr. Rian Dewhurst)
अब जानते हैं बोरोन को, पिरियॉडिक टेबल का यह एक खास तत्व है जो बहुत कम मौकों पर ट्रिपल बॉन्ड बनाता है। खासकर जब बात बोरोन और ऑक्सीजन के बीच ट्रिपल बॉन्ड की आती है, तो ये दोनों तत्व एक-दूसरे के साथ टिकते ही नहीं थे। इसी बोरोन-ऑक्सीजन ट्रिपल बॉन्ड वाले कार्बनिक यौगिकों को ऑक्सोबोरेन कहा जाता है। 1960 के दशक से वैज्ञानिक जानते थे कि गणितीय रूप से या कागजों पर ऑक्सोबोरेन का होना संभव है। एक्सट्रीम कंडीशन्स इसके होने के कुछ अप्रत्यक्ष सबूत भी मिले, लेकिन सामान्य लैब स्थितियों में इसे बनाकर कांच की शीशी में रखना पानी पर नाम लिखना जैसा था।
15 साल की मेहनत और 'गलती' से मिला रास्ता
वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर होल्गर ब्रौनश्वेग पिछले 15 सालों से बोरोन के इस अनस्टेबल मिजाज को बदलने में लगे थे। 2012 में उनकी टीम ने इतिहास में पहली बार दो बोरोन परमाणुओं के बीच ट्रिपल बॉन्ड बनाकर दुनिया को चौंकाया। 2025 में उन्होंने बोरोन और कार्बन के बीच ट्रिपल बॉन्ड वाला पहला न्यूट्रल मॉलिक्यूल तैयार किया। लेकिन बोरोन और ऑक्सीजन (Oxoborane) अब भी बाकी था।
किसी और प्रयोग के दौरान बन गया ऑक्सोबोरेन (सांकेतिक चित्र)
वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी के दो पीएचडी छात्र, लुकास लबजिक (Lukas Lubczyk) और क्रिश्चियन मार्कल (Christian Markl) लैब में 'डिबोराकुमुलीन' (Diboracumulene) नाम के एक कंपाउंड की अलग-अलग कीटोन (Ketones) के साथ रिएक्शन करा रहे थे। उनका मकसद कुछ और ही ढूंढना था। लेकिन प्रयोग के दौरान उन्होंने देखा कि टेस्टट्यूब के पेंदे में अचानक कुछ अजीब नारंगी और पीले रंग के ठोस पदार्थ जमने लगे। जब इन ठोस पदार्थों की जांच की गई, तो पता चला कि यह और कुछ नहीं, बल्कि वही बहुप्रतीक्षित ऑक्सोबोरेन था, जो बिना किसी उपद्रव के बिल्कुल स्थिर हालत में उनके सामने मौजूद था।
भारत का भी महत्वपूर्ण योगदान
इस ऐतिहासिक खोज की रीढ़ केवल प्रयोगशाला के प्रयोग ही नहीं थे, बल्कि इसके पीछे की गई जटिल गणितीय और कम्प्यूटेशनल गणनाएं (Computational Modeling) भी थीं और यहीं पर भारत का नाम जुड़ता है। असम की तेजपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अश्विनी के. फुकन और उनकी शोध टीम ने इस पूरे प्रोजेक्ट में कम्प्यूटेशनल सपोर्ट प्रदान किया। उन्होंने सुपरकंप्यूटर की मदद से यह साबित किया कि अणुओं के अंदर इलेक्ट्रॉन किस तरह व्यवहार कर रहे हैं और यह ट्रिपल बॉन्ड किस तरह स्थिर बना हुआ है। इस अंतरराष्ट्रीय रिसर्च को जर्मन रिसर्च फाउंडेशन (DFG), जर्मन एकेडमिक एक्सचेंज सर्विस (DAAD) और भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा फंडिंग प्रदान की गई थी।
भविष्य के लिए इसका क्या मतलब है?
वैज्ञानिकों ने इस नए तरीके का इस्तेमाल करके एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग प्रकार के ऑक्सोबोरेन का निर्माण किया है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि यह कोई 'तुक्का' नहीं था, बल्कि एक ऐसा नया रासायनिक रास्ता है, जिससे आने वाले समय में ऐसे कई अनगिनत दुर्लभ अणु बनाए जा सकते हैं जिन्हें अब तक नामुमकिन समझा जाता था। यह खोज न केवल 60 साल पुरानी पहेली का अंत करती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि विज्ञान में अक्सर सबसे बड़ी सफलताएं वहीं छिपी होती हैं, जहां हमारी नजर नहीं जाती।
