Ocean Tides: समुद्र में ज्वार-भाटा आना एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इसकी तीव्रता एक जैसी नहीं होती। कुछ स्थानों पर उच्च और निम्न ज्वार के बीच अंतर बहुत कम होता है, जबकि कुछ तटीय क्षेत्रों में यह अंतर कई मीटर तक पहुंच जाता है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के किम्बर्ली तट पर यह अंतर 10 मीटर से भी अधिक हो सकता है, जो तकरीबन तीन मंजिला इमारत की ऊंचाई के बराबर है।
ज्वार भाटा की बदलती कहानी (फोटो साभार: AI Image/Verified by Newsroom)
समुद्री ज्वार-भाटा तटरेखाओं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देता है, तटीय समुदायों को प्रभावित करता है और यहां तक कि अंटार्कटिका की बर्फीली चट्टानों के पिघलने में भी भूमिका निभाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि कुछ स्थानों पर ज्वार इतना अधिक और कुछ जगहों पर इतना कम क्यों होता है और समुद्रों में बदलाव के साथ क्या ज्वार-भाटे में भी बदलाव आ रहा है ?
चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के लुवेई यांग एवं कैलम शेक्सपीयर ने ज्वार-भाटा के विषय की गहराई से पड़ताल की और सवालों के जवाब खोजने का प्रयास किया। द कन्वरसेशन में प्रकाशित लुवेई यांग एवं कैलम शेक्सपीयर की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रमा और सूर्य दोनों अपने गुरुत्वाकर्षण बल के जरिये पृथ्वी पर ज्वार पैदा करते हैं। सूर्य अधिक विशाल है, लेकिन चंद्रमा पृथ्वी के काफी करीब है, इसलिए समुद्री ज्वार पर उसका प्रभाव अधिक होता है।
समुद्र में ज्यादा दिखाई देता है असर
चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण उसकी दूरी बढ़ने के साथ कम होता जाता है। पृथ्वी का जो हिस्सा चंद्रमा के सबसे करीब है, वहां इसका प्रभाव सबसे अधिक और दूर वाले हिस्से में सबसे कम होता है। यह अंतर पृथ्वी की ठोस सतह और महासागरों को खींचता है। पानी चट्टानों की तुलना में अधिक आसानी से गति करता है, इसलिए इसका प्रभाव समुद्र में ज्यादा दिखाई देता है।
आसान शब्दों में समझें तो इससे समुद्र में ज्वार के दो उभार बनते हैं- एक चंद्रमा की ओर वाले हिस्से में और दूसरा पृथ्वी के विपरीत हिस्से में। पृथ्वी के घूमने के साथ अलग-अलग स्थान इन उभारों के क्षेत्र में आते-जाते हैं। यही कारण है कि कई जगहों पर रोज दो बार उच्च ज्वार और दो बार निम्न ज्वार आता है।
क्या होता है स्प्रिंग टाइड?
सूर्य भी इसी तरह, हालांकि अपेक्षाकृत कमजोर, प्रभाव डालता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं तो दोनों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव मिल जाते हैं और ज्वार का अंतर सामान्य से अधिक हो जाता है। इसे 'स्प्रिंग टाइड' कहा जाता है।
क्या है नीप टाइड?
जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी से देखने पर समकोण पर होते हैं तो उनके प्रभाव आंशिक रूप से एक-दूसरे को कम करते हैं और ज्वार का अंतर घट जाता है, जिसे 'नीप टाइड' कहा जाता है।
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क्या गुरुत्वाकर्षण ही है जिम्मेदार?
तटीय क्षेत्रों में ज्वार मापने वाले उपकरणों और उपग्रहों से मिले आंकड़े ज्वार की सरल तस्वीर से काफी अलग हैं। महाद्वीप महासागरों को अलग-अलग बेसिन में बांट देते हैं, जिससे समुद्री जल इन बेसिनों के भीतर आगे-पीछे होता है।
कई महासागरीय बेसिन में ज्वार ऐसे बिंदुओं के आसपास घूमता है जहां जलस्तर में बदलाव लगभग नहीं होता। इन्हें 'एम्फिड्रोमिक पॉइंट' कहा जाता है। आम तौर पर इन बिंदुओं से दूरी बढ़ने के साथ ज्वार का अंतर बढ़ता जाता है।
तटरेखा का आकार भी ज्वार को बढ़ा सकता है। इसे 'रेजोनेंस' कहा जाता है। प्रत्येक खाड़ी में पानी के आगे-पीछे हिलने की एक प्राकृतिक लय होती है, जो उसके आकार और गहराई पर निर्भर करती है। जब यह लय स्थानीय ज्वार की लय से मेल खाती है तो हर अगली हलचल पिछली हलचल को और मजबूत करती है।
बे ऑफ फंडी में ज्वार का अंतर ज्यादा
इसी प्रक्रिया से किम्बर्ली तट और कनाडा की बे ऑफ फंडी में असाधारण रूप से बड़े ज्वार देखने को मिलते हैं। बे ऑफ फंडी में ज्वार का अंतर 16 मीटर तक पहुंच सकता है।
इंटरनल टाइड्स
समुद्र के नीचे मौजूद पहाड़ और पर्वत श्रृंखलाएं भी ज्वार को प्रभावित करती हैं। जब ज्वार का पानी असमतल समुद्री तल के ऊपर से गुजरता है तो उसकी कुछ ऊर्जा समुद्र के भीतर बनने वाली तरंगों में बदल जाती है, जिन्हें 'इंटरनल टाइड्स' कहा जाता है।
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इंडोनेशियाई द्वीपसमूह का जटिल समुद्री तल शक्तिशाली आंतरिक ज्वार पैदा करता है। जब ये आंतरिक ज्वार टूटते हैं तो घर्षण से समुद्र में हलचल तेज हो सकती है जिससे गर्मी और पोषक तत्वों के वितरण में मदद मिलती है।
वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, इन आंतरिक ज्वारों के प्रभाव को मॉडलों में शामिल करने से वास्तविक ज्वार का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है और इसके लिए आंतरिक ज्वारों का सीधे अनुकरण करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे कंप्यूटिंग संसाधनों की बचत हो सकती है और अतीत तथा भविष्य के ज्वार के अधिक विश्वसनीय मॉडल तैयार किए जा सकते हैं।
बदलते महासागर में ज्वार भी बदल रहा
सर आइजैक न्यूटन ने 1687 में गुरुत्वाकर्षण के जरिए ज्वार-भाटे की व्याख्या की थी। तीन सदियों से अधिक समय बाद भी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि बदलते महासागरों के साथ ज्वार कैसे बदल रहा है।
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और तटरेखाएं बदल रही हैं। समुद्र की ऊपरी परत गर्म हो रही है और पानी में परतों के बीच अंतर भी बढ़ रहा है। इन बदलावों का ज्वार के आकार पर असर पड़ सकता है।
माप से पहले ही संकेत मिल रहे हैं कि ज्वार में बदलाव हो रहा है। समुद्र के स्तर में बदलाव और समुद्री जल के अधिक स्तरीकृत होने को इसके कुछ कारणों से जोड़ा जा रहा है। बेहतर महासागरीय मॉडल अब आंतरिक ज्वारों को अधिक विस्तार से दर्ज कर रहे हैं और नए उपग्रह जटिल तटीय क्षेत्रों में ज्वार को मापने में मदद कर रहे हैं।
तटीय समुदायों के लिए ज्वार में इन बदलावों को समझना महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भविष्य में ज्वार में होने वाले बदलावों का बेहतर अनुमान लगाने से तटीय समुदायों को बाढ़ के लिए तैयारी करने, नुकसान कम करने और तटीय विकास की अधिक सुरक्षित योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
