Thane Court Acquits Man Rape Case Marriage Promise: ठाणे की एक अदालत ने शादी का झांसा देकर एक महिला से दुष्कर्म करने और उसे धमकाने के आरोपी 35 वर्षीय व्यक्ति को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जी. टी. पवार ने मंगलवार को पारित आदेश में उच्चतम न्यायालय के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक आपसी सहमति से बने संबंध को शादी का झूठा वादा करके दुष्कर्म करने का मामला नहीं माना जा सकता।
विधवा महिला से दुष्कर्म का आरोपी सजा से बचा, अदालत ने क्या पकड़ी बात और कर दिया सभी आरोपों से बरी? जानें
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला की आरोपी से इंस्टाग्राम के जरिए जान-पहचान हुई थी। महिला विधवा है और उसकी एक बेटी है। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उससे शादी करने और उसकी बेटी की देखभाल करने का वादा कर 12 नवंबर, 2022 को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के मुंब्रा इलाके में एक घर में उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए।
'बार-बार यौन शोषण किया, पैसे और सोने के आभूषण उधार लिए'
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि आरोपी ने बार-बार उसका यौन शोषण किया, अपने कारोबार के लिए उससे पैसे और सोने के आभूषण उधार लिए तथा जब उसने शादी करने को लेकर जोर दिया तब उसके साथ मारपीट की और निजी तस्वीरें सार्वजनिक करने की धमकी दी। हालांकि, बचाव पक्ष ने दलील दी कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे और आरोपी को झूठे मामले में फंसाया गया है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश ने कहा कि पीड़िता ने अपनी गवाही में आरोपी के साथ पहली बार यौन संबंध को जबरन बताया था, लेकिन चिकित्सक को दी जानकारी में उसने इन्हें सहमति से बने संबंध बताया था।
अदालत ने बरी करते हुए क्या कहा?
अदालत ने कहा, 'यदि पहली घटना उसकी सहमति के बिना और उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन हुई थी, तो वह इसकी शिकायत कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के अवलोकन से पता चलता है कि आरोपी और पीड़िता के बीच यौन संबंध सहमति से बने थे।' अदालत ने पीड़िता की गवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी पहले शादी हो चुकी थी और उसकी एक बेटी थी। इसके बावजूद वह आरोपी के साथ किसी अज्ञात स्थान पर गई और वहां रातभर रुकी।
अदालत ने कहा, 'आरोपी ने उसके साथ यौन संबंध बनाए और इसके बाद उससे कहा कि ’चिंता मत करो, मैं तुमसे शादी कर लूंगा।’ इसका मतलब है कि शादी का वादा यौन संबंध बनाने के बाद किया गया था। इसलिए इसे शादी का झूठा वादा नहीं कहा जा सकता।'
उच्चतम न्यायालय के उस फैसले का हवाला देते हुए, जिसमें कहा गया था कि लंबे समय तक चले सहमति से बने संबंधों को शादी के झूठे वादे के आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, सत्र अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा। इसके परिणामस्वरूप अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
