देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने आम नागरिकों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि निर्धारित फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार (Right to Walk) केवल एक सामान्य सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों का 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Right) है। अदालत ने अपने फैसले में न केवल पैदल चलने वालों को मोटर वाहनों पर प्राथमिकता दी, बल्कि एक बड़ा कानूनी हथियार देते हुए फुटपाथ न होने या बदहाल होने पर जिम्मेदार अधिकारियों से सीधे 'मुआवजा' वसूलने तक का रास्ता साफ कर दिया है।
मौलिक अधिकार है फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार : उच्चतम न्यायालय (फाइल फोटो)
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गाड़ियों के मुकाबले पैदल यात्री सर्वोपरि
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदूरकर की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि फुटपाथ पर पैदल चलने का नागरिक का अधिकार सर्वोपरि है और इसे मोटर वाहनों की आवाजाही के मुकाबले हमेशा प्राथमिकता दी जाएगी। पीठ के अनुसार, यह अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत संरक्षित है। पीठ ने कहा, ’’पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) (डी) के तहत गारंटीकृत आने-जाने के अधिकार का एक अहम हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(ए), अनुच्छेद 19(1)(बी), अनुच्छेद 19(1)(सी) और अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। पैदल चलने के मौलिक अधिकार के अंतर्गत, निर्धारित फुटपाथ का अधिकार भी स्वतः ही शामिल होगा।’’
फुटपाथ खराब हुआ तो मिलेगा मुआवजा
इस ऐतिहासिक फैसले की सबसे बड़ी बात यह है कि अब सरकार या स्थानीय प्रशासन फुटपाथों की अनदेखी नहीं कर सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर सड़क है, तो यह सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है कि वहां पैदल यात्रियों के लिए चिह्नित और अच्छी तरह से बनाए गए फुटपाथ हों। इसने कहा कि निर्धारित फ़ुटपाथ पर पैदल चलने के मौलिक अधिकार के साथ एक संबंधित ज़िम्मेदारी भी जुड़ी है और ’’अगर सड़क है, तो यह सुनिश्चित करने का दायित्व बनता है कि पैदल चलने वालों के लिए चिह्नित और अच्छी तरह से बनाए गए फ़ुटपाथ हों’’। पीठ ने कहा कि इस कर्तव्य को निभाने की जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और यहां तक कि पंचायतों की है, जिनको फुटपाथ और अन्य आवश्यक पैदल यात्री बुनियादी ढांचे को चिह्नित करने, उनका निर्माण, रखरखाव करने और उन्हें सुरक्षित रखने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए, क्योंकि पैदल चलना जीवन का एक अभिन्न अंग है। इसने कहा कि निर्धारित फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होने पर, नागरिक ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ सुधार एवं मुआवज़े के लिए संवैधानिक और कानूनी उपाय अपना सकते हैं। यह उपाय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले उपायों से अलग है।
एक पिता के दर्द ने बदला कानून
सर्वोच्च अदालत की यह तल्ख और ऐतिहासिक टिप्पणी एक बेहद भावुक कर देने वाले मामले की सुनवाई के दौरान आई। एक पिता अपने 5 साल के मासूम बेटे को स्कूल ले जा रहा था, तभी एक सड़क हादसे में बच्चे की मौत हो गई। इस मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को कम कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह निरस्त कर दिया।
अदालत ने मृत बच्चे के पिता के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया और इसे दो महीने के भीतर भुगतान करने का सख्त आदेश दिया है। इसके साथ ही, पैदल यात्रियों के इस मौलिक अधिकार को देश भर में प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कोर्ट ने एक 'नियामक इकाई' (Regulatory Body) बनाने की भी पुरजोर पैरवी की है।
