सुप्रीम कोर्ट ने करीब 12 साल से जेल में बंद कथित इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) के ऑपरेटिव मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर को जमानत दे दी है। अदालत ने इसके लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया। फैसला देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे में असाधारण देरी और लंबे समय तक हिरासत में रखा जाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट
2014 से हिरासत में हैं आरोपी
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 27 जुलाई को पारित अपने आदेश में कहा कि दोनों आरोपी साल 2014 से हिरासत में हैं । तबसे मामले की सुनवाई बेहद धीमी गति से चल रही है। ऐसे में निकट भविष्य में मुकदमे के पूरा होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। ऐसे में किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक मुकदमे के लंबित रहने के कारण जेल में रखना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि इसी मामले के एक सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दोनों आरोपियों की उस याचिका पर आया जिसमें उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। बता दें कि यह मामला नवंबर 2011 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज किए गए आतंकवाद से जुड़े एक मामले से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को दिया निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर के खिलाफ दिल्ली और राजस्थान में कुल तीन एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें आरोप काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वहीं राजस्थान के एक मामले में दोनों को मार्च 2021 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था,लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा दी। वहीं राजस्थान के दूसरे मामले में दोनों पहले से ही जमानत पर हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में दोनों की लगातार हिरासत अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का "गंभीर उल्लंघन" है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट को उचित शर्तों के साथ दोनों को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया,बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
सुनवाई में आरोपियों को करना होगा सहयोग
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों आरोपियों को मुकदमे की सुनवाई में पूरा सहयोग करना होगा। यदि वे सुनवाई में देरी करने, अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करने या जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने के दोषी पाए जाते हैं, तो अभियोजन पक्ष जमानत रद्द कराने के लिए अदालत का रुख कर सकता है।पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत देते समय की गई टिप्पणियां केवल जमानत याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और इन्हें मामले के गुण-दोष पर अदालत की अंतिम राय नहीं माना जाएगा।
क्या है मामला?
यह मामला नवंबर 2011 का है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कथित इंडियन मुजाहिदीन सदस्य मोहम्मद कतील सिद्दीकी को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों के अनुसार पूछताछ में उसने राजस्थान में संगठन के एक मॉड्यूल के जरिए दिल्ली और आसपास के इलाकों में आतंकी गतिविधियों की साजिश का खुलासा किया था। इसके बाद पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया और बड़ी मात्रा में विस्फोटक तथा हथियार बरामद करने का दावा किया।
