संघ @100: शाखा से राष्ट्रव्यापी शक्ति तक-संगठन, विचार और 100 साल की यात्रा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 में नागपुर से शुरुआत की और आज यह देशभर में शाखाओं और सामाजिक-सांस्कृतिक पहलों के माध्यम से एक मजबूत नेटवर्क बन चुका है। एक सदी में संघ ने संगठनात्मक दृढ़ता, अनुशासन और सेवा भाव के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक चेतना को बढ़ावा दिया। हालांकि इसकी विचारधारा और कार्यप्रणाली विवादों का केंद्र रही, संघ ने लगातार अपने उद्देश्यों और विस्तार के मार्ग पर कदम बढ़ाया। शाखाओं से लेकर शिक्षा, समाज सेवा और समुदायिक कार्यों तक, संघ ने देशव्यापी प्रभाव स्थापित किया और 21वीं सदी में भी सक्रिय रूप से राष्ट्र सेवा में योगदान दे रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सौ वर्ष पूरे होना केवल संगठन के इतिहास का नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के बदलते परिदृश्य का भी महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। 27 सितंबर 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में जो बीज बोया था, वह आज एक विराट वटवृक्ष बन चुका है। लाखों स्वयंसेवक और सैकड़ों सह-संगठन इसके विस्तार का प्रमाण हैं।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। तस्वीर-PTI

संघ ने भारतीय समाज में अनुशासन, संगठन और सेवा की जो संस्कृति विकसित की है, वह निस्संदेह प्रशंसनीय है। शाखा पद्धति के माध्यम से चरित्र निर्माण, आपदा की घड़ी में निस्वार्थ सेवा, और गांव-गांव तक शिक्षा व संस्कार पहुंचाने के प्रयास संघ की पहचान हैं। राजनीति से इतर सामाजिक जीवन में उसकी पैठ गहरी है। आज यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संघ ने भारतीय समाज को एक निश्चित दिशा देने का कार्य किया है। लेकिन इस यात्रा का दूसरा पहलू भी है। संघ को लेकर विवाद और आलोचनाएं बराबर बनी रही हैं। 1948 में लगे प्रतिबंध से लेकर आज तक, उसके आलोचक यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या संघ की विचारधारा समाज को जोड़ने से अधिक बांटने का काम करती है? उसके हिंदुत्व के आग्रह को कभी-कभी सांप्रदायिकता के चश्मे से भी देखा गया है। दलित-आदिवासी समाज में पैठ बनाने के उसके प्रयासों को भी कई बार “राजनीतिक विस्तार” के तौर पर समझा गया।

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