बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है। 26 नवंबर से 9 दिसंबर तक दो चरणों में चली लंबी समीक्षा बैठक के बाद पार्टी के भीतर चल रहे 'अंदरूनी खेल' का पर्दाफाश हुआ है। इस समीक्षा के दौरान पार्टी प्रत्याशियों और जिला पदाधिकारियों ने एक हजार से अधिक ऐसे नाम गिनाए हैं, जिन्होंने चुनाव में पार्टी के साथ गद्दारी की और विपक्षी खेमे को फायदा पहुंचाया।
पार्टी को प्राप्त शिकायतों के बाद लगभग 300 चेहरे सीधे तौर पर आरोपों के घेरे में पाए गए हैं। इन 'भीतरघातियों' की अंतिम सूची तैयार कर शीर्ष नेतृत्व यानी लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव को सौंप दी गई है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि इन लोगों ने चुनाव के दौरान पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ जाकर न केवल वोट काटे, बल्कि नियमों का भी जमकर उल्लंघन किया।
हालांकि, इस रिपोर्ट पर अमल करना शीर्ष नेतृत्व के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रही है। पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर दो विचारधाराएं उभरकर सामने आई हैं। आरजेडी की नई पीढ़ी का मानना है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए इन भितरघातियों के विरुद्ध कठोर से कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, पार्टी की पुरानी पीढ़ी का मानना है कि ये आरोप अक्सर आपसी रंजिश और बिना परिश्रम पद पाने की लालसा से प्रेरित होते हैं। अनुभवी नेताओं का तर्क है कि सजा देने से पहले आरोपितों का पक्ष जानना भी आवश्यक है।
समीक्षा में सीतामढ़ी के परिहार विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण सबसे ऊपर रहा, जहाँ महिला प्रकोष्ठ की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रितु जायसवाल की बगावत ने आरजेडी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। पार्टी अब रितु जैसे चेहरों को खोने पर मन मसोस रही है। इन तमाम पेंचों के बीच अब यह साफ है कि अनुशासन का डंडा चलेगा या नहीं, इसका अंतिम निर्णय केवल तेजस्वी यादव के जमीनी आकलन और लालू प्रसाद यादव के वर्षों पुराने राजनीतिक विवेक से ही तय होगा।
