Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: धार्मिक रीति-रिवाजों पर सवाल उठाने से धर्म और सभ्यता के विघटन का खतरा होगा

Supreme Court: उच्चतम न्यायालय की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने धार्मिक प्रथाओं को लगातार अदालत में चुनौती दिए जाने पर गंभीर चिंता जताई।

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को टिप्पणी की कि यदि लोग धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों पर संवैधानिक अदालत में सवाल उठाने लगेंगे तो विभिन्न रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सवाल उठाने वाली सैकड़ों याचिकाएं दायर होंगी, जिससे धर्मों और सभ्यता के विघटन का खतरा पैदा हो जाएगा। नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ महिलाओं के साथ धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है। इनमें केरल के शबरिमला मंदिर से जुड़ा मामला भी शामिल है। साथ ही, यह पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है। पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो-PTI)

दाऊदी बोहरा समुदाय की मांग

दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर कर 1962 के उस फैसले को रद्द करने की मांग की थी जिसने बॉम्बे बहिष्कार निवारण अधिनियम, 1949 को निरस्त कर दिया था - इस कानून के तहत समुदाय के किसी भी सदस्य का बहिष्कार करना अवैध था।संविधान पीठ के 1962 के फैसले में कहा गया था, "दाऊदी बोहरा समुदाय की धार्मिक आस्था और सिद्धांतों से यह स्पष्ट है कि धार्मिक आधार पर इसके धार्मिक प्रमुख द्वारा बहिष्कार की शक्ति का प्रयोग धर्म संबंधी मामलों में इसके कामकाज के प्रबंधन का हिस्सा था और 1949 के अधिनियम ने ऐसे बहिष्कार को भी अमान्य घोषित करके संविधान के अनुच्छेद 26(ख) के तहत समुदाय के अधिकार का उल्लंघन किया।"

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