Prashant Kishor: चुनावी रणनीतिकार के रूप में नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल समेत कई नेताओं को जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गढ़ बांकीपुर में जीत दर्ज कर बिहार विधानसभा में अपनी पार्टी जन सुराज का खाता खोल दिया। सभी 32 राउंड की मतगणना पूरी होने के बाद प्रशांत किशोर, बीजेपी के उम्मीदवार नीरज कुमार से 19,324 से अधिक वोटों से जीत गए। उन्हें कुल 64151 वोट मिले जबकि बीजेपी उम्मीदवार नीरज सिन्हा को 44827 वोट मिले।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव (Bankipur By Election Result) में किशोर की जीत लगभग दो वर्षों के राजनीतिक अभियान का परिणाम है, जिसके तहत उन्होंने जन सुराज की शुरुआत की और पूरे बिहार का व्यापक दौरा किया। हालांकि, पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुल पाया था।
'विश्वसनीय विपक्ष' की बात लगातार उठाते रहे
किशोर लगातार यह कहते रहे हैं कि ऐसे देश में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए संघर्ष कर रहा है, वहां एक विश्वसनीय विपक्ष के लिए हमेशा जगह रहेगी। 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (आई-पैक) के संस्थापक किशोर का एक चर्चित कथन रहा है, "इस देश में विपक्ष नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीतिक दल कमजोर हैं।"
उन्होंने चुनावी रणनीतिकार के रूप में नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी, उद्धव ठाकरे और एम.के. स्टालिन जैसे अलग-अलग विचारधाराओं के नेताओं के लिए काम किया है।
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीते प्रशांत किशोर।
नीतीश कुमार के करीबी से राजनीतिक अलगाव तक
उम्र उनके पक्ष में है और बिहार में विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहा है। ऐसे में जन सुराज पार्टी के लिए अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का अवसर मौजूद है। हालांकि, जन सुराज पहला राजनीतिक संगठन नहीं है, जिसमें किशोर ने नेता के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई हो। चुनावी प्रबंधन में उनकी दक्षता से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वर्ष 2015 में सत्ता में लौटने के बाद उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए अपना सलाहकार नियुक्त किया था।
करीब तीन वर्ष बाद किशोर जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हुए और शीघ्र ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए। इससे अटकलें लगने लगी थीं कि नीतीश कुमार उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी मान रहे हैं। लेकिन नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पर नीतीश कुमार के रुख की सार्वजनिक आलोचना करने के कारण उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
बीजेपी के प्रत्याशी नीरज सिन्हा को प्रशांत किशोर ने दी मात।
'बात बिहार की' से 'जन सुराज' तक
पार्टी से निष्कासन के बाद किशोर ने 'बात बिहार की' अभियान शुरू किया, लेकिन यह पहल अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। वर्ष 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की लगातार तीसरी जीत के बाद उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के सामने पार्टी के पुनर्गठन का खाका भी रखा था, लेकिन वह योजना अमल में नहीं आ सकी।
कितनी है प्रशांत किशोर की संपत्ति?
उपचुनाव के लिए दाखिल शपथपत्र के अनुसार, प्रशांत किशोर के पास 22.19 करोड़ रुपये की चल और 73.87 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। उनकी पत्नी के पास 89.51 करोड़ रुपये की चल और 12.42 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। शपथपत्र के अनुसार, एक निजी कंपनी में उनकी 100 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसी कंपनी ने वर्ष 2024-25 में जन सुराज पार्टी को 85 करोड़ रुपये और जन सुराज फाउंडेशन को 50 लाख रुपये का चंदा दिया।
शिक्षा और प्रोफेशनल बैकग्राउंड
प्रशांत किशोर ने वर्ष 1991 में बक्सर के एम.पी. हाई स्कूल से दसवीं और 1993 में पटना साइंस कॉलेज से बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने 1996 से 1999 के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) की डिग्री हासिल की।
वर्ष 2001 से 2003 के दौरान उन्होंने हैदराबाद स्थित एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया (ASCI) में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी (अमेरिका) और हिंदूजा अस्पताल के सहयोग से संचालित कार्यक्रम के तहत मास्टर ऑफ हेल्थकेयर एडमिनिस्ट्रेशन (MHA) किया। इसके अलावा वर्ष 2010 में उन्होंने फ्रांस के क्लेरमों-फेरां विश्वविद्यालय से संबद्ध कैविलाम, विची में फ्रांसीसी भाषा का गहन पाठ्यक्रम भी पूरा किया।
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की सीट पर जनसुराज सुप्रीमो का दिखा जलवा।
बांकीपुर में कैसे मिली पहली बड़ी जीत?
भाजपा के तत्कालीन विधायक और वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देने पर बांकीपुर सीट खाली हुई थी। भाजपा ने लगभग तीन दशक से अपने कब्जे वाली इस सीट को बचाने के लिए युवा नेता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया, लेकिन पार्टी अपनी पकड़ बरकरार नहीं रख सकी।
प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भाजपा के इस मजबूत गढ़ में जीत दर्ज कर न सिर्फ विधानसभा में प्रवेश किया, बल्कि बिहार की राजनीति में खुद को एक नए राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने का मजबूत संदेश भी दे दिया।
पीके की जीत के 5 बड़े फैक्टर
1. नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद मैदान में सबसे पहले उतरे प्रशांत किशोर
बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई। उपचुनाव की घोषणा होते ही प्रशांत किशोर ने क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क शुरू कर दिया। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात की, स्थानीय समस्याओं को सुना और रोजगार, शिक्षा व पलायन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। लंबे समय तक जनता के बीच सक्रिय रहने का उन्हें सीधा फायदा मिला।
2. युवाओं का भरोसा जीतने में रहे सफल
इस चुनाव में प्रशांत किशोर को सबसे बड़ा समर्थन युवा मतदाताओं से मिला। माना जा रहा है कि बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और NEET जैसे मुद्दों पर उनका रुख युवाओं को प्रभावित करने में सफल रहा। कई परिवारों में देखने को मिला कि जहां बुजुर्गों ने भाजपा का समर्थन किया, वहीं युवा मतदाताओं ने प्रशांत किशोर के पक्ष में मतदान किया।
3. सत्ता पक्ष के खिलाफ नाराजगी का मिला लाभ
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और नेतृत्व को लेकर कुछ वर्गों में असंतोष था। खासकर कुछ जातीय समूहों और युवा मतदाताओं के बीच नाराजगी की चर्चा रही। माना जा रहा है कि इस असंतोष का लाभ प्रशांत किशोर को मिला और इसका असर बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों में भी दिखाई दिया।
4. कम मतदान, लेकिन युवा वोटरों की ज्यादा भागीदारी
पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में इस उपचुनाव में मतदान प्रतिशत कम रहा। हालांकि, चुनावी विश्लेषकों के अनुसार युवाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक रही, जबकि मध्यम आयु और बुजुर्ग मतदाताओं की मतदान में हिस्सेदारी कम रही। इस मतदान पैटर्न ने भी प्रशांत किशोर के पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
5. सभी वर्गों में बनाई मजबूत पकड़
प्रशांत किशोर ने सिर्फ विपक्षी वोट बैंक तक ही सीमित रहने के बजाय भाजपा के पारंपरिक वोटरों में भी सेंध लगाने की कोशिश की। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार उन्हें विभिन्न सामाजिक वर्गों का समर्थन मिला। साथ ही, मुस्लिम और यादव समुदाय के एक हिस्से तथा अन्य जातीय समूहों के युवाओं का भी उन्हें अच्छा समर्थन मिलने की बात कही जा रही है। इसी व्यापक सामाजिक समर्थन ने उनकी जीत का अंतर बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
