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NEET पेपर लीक विरोधी प्रदर्शन: SC बनाएगा हाई-पावर्ड कमेटी, छात्रों से जुड़ी FIR पर भी विचार

CJI सूर्यकांत ने बताया कि कमेटी में एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, एक पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस, एक पूर्व डीजी स्तर के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। कोर्ट ने बताया कि एक पूर्व CBI निदेशक और एक राज्य के पूर्व DGP की सहमति भी ली गई है।

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सुप्रीम कोर्ट।

Photo : PTI

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने NEET और अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर, बिहार और देश के दूसरे हिस्सों में हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने का फैसला किया है। कमेटी पुलिस कार्रवाई, प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा, प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों से जुड़े आरोपों समेत पूरे मामले के अलग-अलग पहलुओं की जांच करेगी। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कमेटी के सामने सभी पक्ष अपनी बात रख सकेंगे। कमेटी समय-समय पर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को देगी और रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट आगे जरूरी निर्देश जारी करेगा।

हाई-पावर्ड कमेटी में कौन होंगे सदस्य?

CJI सूर्यकांत ने बताया कि कमेटी में एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, एक पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस, एक पूर्व डीजी स्तर के अधिकारी को शामिल किया जाएगा। कोर्ट ने बताया कि एक पूर्व CBI निदेशक और एक राज्य के पूर्व DGP की सहमति भी ली गई है। दोनों को प्रतिष्ठित और अनुभवी अधिकारी बताते हुए CJI ने कहा कि कोर्ट दोनों के रिकॉर्ड और जांच संबंधी अनुभव से संतुष्ट है और जरूरत पड़ने पर दोनों को कमेटी में शामिल किया जा सकता है। वृंदा ग्रोवर ने सुझाव दिया कि महिलाओं से जुड़े गंभीर आरोपों को देखते हुए कमेटी में एक महिला सदस्य भी होनी चाहिए। कोर्ट ने सभी पक्षों से इस संबंध में सुझाव देने को कहा।

छात्रों की FIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संकेत

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने मांग की कि देशभर में छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR को सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत रद्द करे। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें छात्रों के खिलाफ FIR रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में कुछ ऐसे लोग भी शामिल हुए थे जिनका गंभीर आपराधिक इतिहास है। ऐसे लोगों के मामलों को छात्रों के मामलों के बराबर नहीं रखा जा सकता। CJI सूर्यकांत ने कहा कि राज्यों को ऐसी FIR की सूची देनी चाहिए जिनमें केवल छात्र शामिल हैं। जिन मामलों में सिर्फ छात्र हैं और कोई विवाद नहीं है, उनमें कोर्ट अनुच्छेद 142 की शक्ति का इस्तेमाल करके FIR रद्द करने पर विचार कर सकता है। वहीं, हत्या, हत्या की कोशिश, दुष्कर्म, POCSO और अपहरण जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को अलग से देखा जाएगा।

'छात्र शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे, उनके भविष्य का सवाल है'

CJI सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों के मामले को उन लोगों से अलग करके देखना होगा जो गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि छात्रों का उद्देश्य अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण और कानून के मुताबिक प्रदर्शन करना था। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत उनके अधिकारों को भी ध्यान में रखना होगा। CJI ने कहा कि यह छात्रों की जिंदगी और उनके भविष्य से जुड़ा मामला है। उनके माता-पिता अपनी मेहनत की कमाई से उनकी पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं और छात्रों की व्यवस्था से वैध अपेक्षाएं हैं।

संसद मार्च को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी

एयरफोर्स अधिकारी की ओर से पेश वकील ने कहा कि प्रदर्शन के दो ही रूप हो सकते हैं- वैध और अवैध। उन्होंने सवाल उठाया कि संसद की ओर मार्च करना क्या कानूनी था और क्या प्रदर्शनकारियों के पास इसकी अनुमति थी। इस पर CJI सूर्यकांत ने कहा कि सवाल का जवाब भी खुद ही दिया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि किसी प्रदर्शन की आपराधिकता को उसके उद्देश्य और मकसद के आधार पर देखना होगा। कोर्ट ने कहा कि जब तक कानून तोड़ने की मंशा नहीं है और लोग अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से आवाज उठाने के लिए एकत्र हुए हैं, तब तक ऐसे मामलों को गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की गतिविधियों से अलग रखना होगा।

2,873 अपराधियों की जांच का मुद्दा

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि दिल्ली पुलिस की ओर से गठित SIT उन लोगों की जांच करेगी जिनकी गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि है। उनके मुताबिक, 2,873 लोगों की पहचान ऐसे लोगों के तौर पर की गई है जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। उन्होंने कहा कि इनमें हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, दुष्कर्म और POCSO जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। SG ने कहा कि इन लोगों के अलावा अन्य प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जांच नहीं की जाएगी। हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि जिन FIR की जांच जारी रखनी है, उनके नंबर क्या हैं। CJI ने कहा कि सरकार को कम से कम उन FIR की पहचान करनी होगी जिनमें कार्रवाई जारी रखनी है। उन्होंने कहा कि जब तक सूची सामने नहीं आती, तब तक कोर्ट के सामने यह मुद्दा केवल सैद्धांतिक बना रहेगा। जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि 'अनडिजायरेबल एलिमेंट्स' जैसे सामान्य शब्दों से काम नहीं चलेगा। संबंधित लोगों की पहचान करनी होगी।

पुलिसकर्मियों के घायल होने का मुद्दा भी कमेटी के सामने

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। उन्होंने ऐसे वीडियो का भी हवाला दिया जिनमें प्रदर्शनकारियों द्वारा दीवारें तोड़ने, ईंटें निकालकर पुलिसकर्मियों पर हमला करने के दृश्य होने का दावा किया गया। उन्होंने घायल पुलिसकर्मियों के लिए मुआवजे की मांग भी उठाई। CJI ने कहा कि हाई-पावर्ड कमेटी पूरे मामले के सभी पहलुओं की जांच करेगी।

यौन उत्पीड़न, महिला प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी के आरोप

सुनवाई के दौरान प्रदर्शन के दौरान महिलाओं और अन्य संवेदनशील समूहों के खिलाफ यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और सोशल मीडिया पर ऑनलाइन उत्पीड़न के गंभीर आरोप भी उठाए गए। CJI सूर्यकांत ने कहा कि जो भी जिम्मेदार होगा, उसके लिए कोई बहाना या औचित्य स्वीकार नहीं किया जा सकता। मामले को गंभीरता से लेकर उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए। CJI ने कहा, 'जो भी पीड़ित है, हम उसके साथ हैं। एक सभ्य समाज में ऐसी चीजें कैसे होने दी जा सकती हैं?' कोर्ट ने कहा कि हाई-पावर्ड कमेटी इन सभी पहलुओं को देखेगी और जरूरत के मुताबिक अपनी रिपोर्ट देती रहेगी।

पीड़ितों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए जाने का आरोप

कोर्ट को बताया गया कि मामले पर ध्यान जाने के बाद कुछ पीड़ितों के सोशल मीडिया अकाउंट कथित तौर पर बंद या सीमित कर दिए गए, जबकि उन्हें गाली और धमकी देने वाले अकाउंट सक्रिय हैं। वकील ने एक वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि उसमें कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील सामग्री है। साथ ही एक पीड़िता का सोशल मीडिया अकाउंट बंद किए जाने की बात कही गई। वकील ने मांग की कि सभी राज्यों से रिपोर्ट मांगी जाए कि महिलाओं, बच्चों और यौन अल्पसंख्यकों के खिलाफ कितनी FIR और शिकायतें दर्ज हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट में ही शिकायतें दर्ज कराने की मांग

वकील ने कहा कि अलग-अलग पीड़ित अलग-अलग मंचों पर जा रहे हैं। इससे कोर्ट पर भी बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को ऐसी शिकायतें प्राप्त करने की अनुमति देने की मांग की। CJI ने कहा कि प्रस्तावित हाई-पावर्ड कमेटी पीड़ितों को तत्काल सुनवाई का मौका देगी और जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

पेलेट गन से घायल प्रदर्शनकारियों का मुद्दा

वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने पेलेट गन से घायल प्रदर्शनकारियों के लिए अंतरिम मुआवजे की मांग भी उठाई।उन्होंने बताया कि एक पीड़ित अभी भी गंभीर आंख की चोट के कारण अस्पताल में है, जबकि दूसरे कलाकार के दाहिने हाथ में पेलेट लगने से वह काम करने की स्थिति में नहीं है।

पुलिसकर्मियों की कार्रवाई पर भी जांच की मांग

वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि कुछ पुलिस अधिकारियों का आचरण सार्वजनिक वीडियो में दिखाई देता है और वह बेहद परेशान करने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वीडियो में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ लाठी से मारपीट और अन्य आपत्तिजनक हरकतें दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में कमेटी की जांच का इंतजार किए बिना भी राज्य को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। CJI ने कहा कि कमेटी केवल एक अंतिम रिपोर्ट नहीं देगी। वह मामले सामने आने के साथ समय-समय पर रिपोर्ट दे सकती है, ताकि सुप्रीम कोर्ट जरूरत पड़ने पर अंतरिम निर्देश भी जारी कर सके।

कमेटी को एक्सपर्ट की मदद लेने की छूट

CJI ने कहा कि कमेटी सभी पक्षों को सुनेगी और एकतरफा तरीके से आगे नहीं बढ़ेगी। जहां वैज्ञानिक या तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होगी, वहां कमेटी डोमेन एक्सपर्ट की मदद ले सकती है। कोर्ट कमेटी को जरूरी बुनियादी और अन्य सहायता उपलब्ध कराएगा।

फेशियल रिकग्निशन पर अलग संवैधानिक सवाल

सुनवाई में प्रदर्शन के दौरान फेसियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि यह केवल तथ्यात्मक मुद्दा नहीं बल्कि निजता और संविधान से जुड़ा सवाल है। उन्होंने कहा कि चेहरे से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने और उसके प्रोसेसिंग के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट को अलग से फैसला करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि निजी कंपनियों की मदद से फेसियल रिकग्निशन डेटा प्रोसेस किए जाने का मुद्दा भी है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस मुद्दे को निजता के बजाय अनुपातिकता के नजरिए से भी देखना होगा। CJI ने स्पष्ट किया कि हाई-पावर्ड कमेटी मुख्य रूप से तथ्यात्मक पहलुओं की जांच करेगी, जबकि कानून और संवैधानिक सवालों पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट खुद करेगा।

पुलिस का दावा- हर व्यक्ति की पहचान नहीं की जा रही

फेसियल रिकग्निशन को लेकर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस सिस्टम को लेकर गलतफहमी है। उनके मुताबिक, सिस्टम हर व्यक्ति की पहचान नहीं करता। उनका कहना था कि चेहरे का मिलान नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के गंभीर आपराधिक मामलों वाले लोगों के रिकॉर्ड से किया जाता है। संभावित मिलान सामने आने के बाद पुलिस मौके पर उस व्यक्ति की मौजूदगी, लोकेशन और गतिविधियों की अलग से पुष्टि करती है। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि सवाल सिर्फ मिलान का नहीं है, बल्कि चेहरे की तस्वीरें एकत्र करने और उनका डेटा प्रोसेस करने की संवैधानिक वैधता का भी है। CJI ने कहा कि कमेटी तथ्यात्मक पहलुओं की जांच कर सकती है और इसके बाद फेसियल रिकग्निशन से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगा।

नोडल अफसर नियुक्त करने का सुझाव

वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने सुझाव दिया कि प्रदर्शनकारियों और अभियोजन पक्ष की ओर से एक-एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। इससे शिकायतों और मुद्दों को एक जगह व्यवस्थित तरीके से कोर्ट के सामने रखा जा सकेगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह सुझाव सही है। CJI ने पक्षकारों को यह स्वतंत्रता भी दी कि वे अपनी समस्याएं सीधे सुप्रीम कोर्ट के सामने रखें या हाई-पावर्ड कमेटी के सामने पेश करें। कमेटी इन मुद्दों की भी जांच करेगी।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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